असम यूसीसी बिल 2026: भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया बोले — महिला अधिकारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम
सारांश
मुख्य बातें
असम भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने 30 मई 2026 को गुवाहाटी में कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) देश में महिलाओं को न्याय दिलाने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि असम विधानसभा में यूसीसी पारित होने से पहले सभी राजनीतिक दलों को अपनी राय रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया था।
भाजपा का चुनावी वादा और विधानसभा में पारित बिल
भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने असम में सत्ता में वापसी पर यूसीसी लागू करने का वादा किया था। सैकिया ने कहा कि उचित चर्चा और विचार-विमर्श के बाद असम विधानसभा में यूसीसी बिल, 2026 पारित किया गया। उन्होंने कहा, 'यूसीसी का अर्थ है — सभी धर्मों और समुदायों के लिए एक राष्ट्र, एक कानून और एक पहचान। हम पूरे देश में अपनी विविध संस्कृति और परंपराओं को बनाए रखेंगे।'
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों का संदर्भ
सैकिया ने भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस कथन का उल्लेख किया कि 'एक देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और दो झंडे नहीं हो सकते।' उन्होंने कहा कि इसी भावना के अनुरूप अब देश में केवल एक समान पर्सनल लॉ (निजी कानून) लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
बिल के मुख्य प्रावधान
प्रस्तावित कानून का उद्देश्य धर्म की परवाह किए बिना विवाह, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों पर एक समान नागरिक ढाँचा स्थापित करना है। बिल में बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने और लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने का भी प्रस्ताव है। हालाँकि विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने इसके कुछ प्रावधानों और छूटों पर चिंता जताई है।
केंद्रीय मंत्री सोनोवाल का स्वागत
केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने यूसीसी बिल, 2026 के पारित होने का स्वागत करते हुए कहा था कि यह असम में सामाजिक न्याय, समानता और सुशासन का एक नया युग लाएगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश में यूसीसी को लेकर राष्ट्रीय बहस तेज़ हो रही है।
विपक्ष की आपत्तियाँ और आगे की राह
गौरतलब है कि विपक्षी पार्टियों और कुछ अल्पसंख्यक संगठनों ने बिल के कुछ प्रावधानों — विशेषकर आदिवासी समुदायों को दी गई छूटों की सीमा — पर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि बिल में धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता की पर्याप्त रक्षा नहीं की गई है। अब यह देखना होगा कि क्रियान्वयन के स्तर पर यह कानून किस रूप में सामने आता है।