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डीआर कांगो में इबोला: मृत्यु दर 48.3%, समुदाय में 75% मौतें — WHO ने खतरा 'बहुत उच्च' घोषित किया

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डीआर कांगो में इबोला: मृत्यु दर 48.3%, समुदाय में 75% मौतें — WHO ने खतरा 'बहुत उच्च' घोषित किया

सारांश

डीआर कांगो का इबोला प्रकोप अब देश के इतिहास की सबसे बड़ी और घातक महामारी बन चुका है। 6,686 पुष्टि मामलों और 48.3% मृत्यु दर के साथ, सबसे बड़ी चिंता यह है कि 75% मौतें अब अस्पताल नहीं, बल्कि समुदाय के भीतर हो रही हैं — जो नियंत्रण प्रयासों की सीमाओं को उजागर करता है।

मुख्य बातें

6 सितंबर 2026 तक डीआरसी में इबोला के 6,686 पुष्टि मामले और 3,226 पुष्टि मौतें दर्ज; मृत्यु दर 48.3% ।
31 अगस्त से 6 सितंबर के बीच 75% मौतें समुदाय के भीतर हुईं — इस रिपोर्टिंग अवधि का सर्वाधिक साप्ताहिक अनुपात; दो सप्ताह पहले यह 56.6% था।
167 स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित, जिनमें से 47 की मौत।
27 अगस्त से विशेष मानवीय व्यवस्था के तहत टीकाकरण शुरू; 6 सितंबर तक 2,007 अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को वैक्सीन लगी।
WHO ने डीआरसी के भीतर खतरा 'बहुत उच्च' , पड़ोसी देशों के लिए 'उच्च' घोषित किया।
यह प्रकोप डीआरसी का सबसे बड़ा और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इबोला प्रकोप है — पहला 2014-2016 का पश्चिम अफ्रीकी प्रकोप था।

कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में फैला इबोला संक्रमण अब एक जटिल और असमान रूप लेता जा रहा है — जहाँ कुछ प्रांतों में मामले घट रहे हैं, वहीं अन्य क्षेत्रों में संक्रमण तेज़ी से नए इलाकों तक पहुँच रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ताज़ा बाह्य स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, 6 सितंबर 2026 तक कुल 6,686 पुष्टि किए गए मामले सामने आ चुके हैं और 3,226 लोगों की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है। पुष्टि और संभावित मामलों को मिलाकर मृत्यु दर 48.3 प्रतिशत दर्ज की गई है।

महामारी का बदलता स्वरूप

WHO की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह प्रकोप अब भौगोलिक रूप से एकरूप नहीं रहा। रिपोर्ट के अनुसार, 'महामारी अब अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रुख अपना रही है — कुछ जगहों पर संक्रमण कम हो रहा है, लेकिन दूसरी जगहों पर यह तेज़ी से बढ़ रहा है और नए इलाकों में फैल रहा है।' यह विषमता राहत और नियंत्रण दोनों कार्यों को एक साथ चुनौती दे रही है।

समुदाय में मौतों का बढ़ता अनुपात

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब अधिक मरीज़ स्वास्थ्य केंद्र पहुँचने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं। 31 अगस्त से 6 सितंबर के बीच पुष्टि किए गए कुल मौतों में से 75 प्रतिशत मौतें समुदाय के भीतर हुईं — जो इस रिपोर्टिंग अवधि का सर्वाधिक साप्ताहिक अनुपात है। दो सप्ताह पहले यह आँकड़ा 56.6 प्रतिशत था।

WHO ने इस प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए कहा, 'इलाज केंद्रों में होने वाली मौतों में कमी जारी रहने के बावजूद समुदाय में मौतों की संख्या बढ़ रही है, जिससे पता चलता है कि कुल मृत्यु दर में पहले जो गिरावट देखी गई थी, वह अब बरकरार नहीं रह पाई है।'

समुदाय में मौतों के पीछे कारण

WHO के अनुसार, समुदाय में अधिक मौतों के पीछे कई कारण हो सकते हैं — बीमारी की देर से पहचान, मामलों की जानकारी समय पर न मिलना, मरीज़ों को इलाज केंद्रों तक न पहुँचा पाना, बीमारी की गंभीरता के प्रति जागरूकता की कमी, दूरदराज़ के इलाकों में परिवहन की समस्याएँ, औपचारिक स्वास्थ्य सेवाओं की बजाय अनौपचारिक स्थानों पर इलाज कराना, और स्वास्थ्य तंत्र पर घटता भरोसा।

स्वास्थ्यकर्मी और टीकाकरण अभियान

स्वास्थ्यकर्मियों में संक्रमण भी गंभीर चिंता बना हुआ है। अब तक 167 स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित पाए गए हैं, जिनमें से 47 की मृत्यु हो चुकी है। टीकाकरण के मोर्चे पर, जेरे इबोला वायरस के विरुद्ध लाइसेंस प्राप्त 'एर्वेबो' वैक्सीन का अध्ययन किया जा रहा है ताकि यह जाँचा जा सके कि क्या यह मौजूदा बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के विरुद्ध भी सुरक्षा प्रदान कर सकती है। विशेष मानवीय उपयोग की व्यवस्था के तहत 27 अगस्त से अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों और जोखिम वाले लोगों का टीकाकरण शुरू किया जा चुका है। 6 सितंबर तक 2,007 स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को वैक्सीन दी जा चुकी थी।

वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल और ऐतिहासिक संदर्भ

WHO ने डीआरसी के भीतर संक्रमण के और फैलने का खतरा 'बहुत उच्च' और पड़ोसी देशों के लिए 'उच्च' घोषित किया है। 18 अगस्त को हुई अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम (IHR) आपात समिति की दूसरी बैठक में यह रेखांकित किया गया कि 'यह प्रकोप अभी नियंत्रण से बहुत दूर है' और यह अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बना हुआ है।

गौरतलब है कि मई 2026 में घोषित यह प्रकोप अब डीआरसी के इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे घातक इबोला महामारी बन चुका है। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इबोला प्रकोप है — इससे बड़ा केवल 2014-2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में फैला इबोला प्रकोप था। यह ऐसे समय में आया है जब डीआरसी पहले से ही कई मानवीय संकटों से जूझ रहा है, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव और बढ़ गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह स्वास्थ्य तंत्र और सामुदायिक विश्वास दोनों की विफलता का संकेत है। WHO की रिपोर्ट जो कारण गिनाती है — देर से पहचान, परिवहन की कमी, अनौपचारिक इलाज — ये समस्याएँ डीआरसी में दशकों पुरानी हैं और पिछले कई प्रकोपों में भी सामने आ चुकी हैं। एर्वेबो वैक्सीन की बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के विरुद्ध प्रभावशीलता अभी अनिश्चित है, जो टीकाकरण अभियान की नींव को ही कमज़ोर करती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा के बावजूद वैश्विक समुदाय की प्रतिक्रिया उस पैमाने पर क्यों नहीं है जो 2014-16 के पश्चिम अफ्रीकी प्रकोप में देखी गई थी।
RashtraPress
9 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डीआर कांगो में इबोला प्रकोप की मौजूदा स्थिति क्या है?
6 सितंबर 2026 तक डीआरसी में इबोला के 6,686 पुष्टि मामले और 3,226 पुष्टि मौतें दर्ज हो चुकी हैं, जबकि पुष्टि और संभावित मामलों को मिलाकर मृत्यु दर 48.3% है। WHO ने डीआरसी के भीतर खतरे को 'बहुत उच्च' और पड़ोसी देशों के लिए 'उच्च' बताया है।
समुदाय में इबोला से मौतें क्यों बढ़ रही हैं?
31 अगस्त से 6 सितंबर के बीच 75% मौतें समुदाय के भीतर हुईं, क्योंकि मरीज़ स्वास्थ्य केंद्र पहुँचने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं। WHO के अनुसार इसके पीछे बीमारी की देर से पहचान, परिवहन की समस्याएँ, अनौपचारिक इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं पर घटता भरोसा जैसे कारण हैं।
इबोला के खिलाफ कौन-सी वैक्सीन इस्तेमाल की जा रही है?
जेरे इबोला वायरस के विरुद्ध लाइसेंस प्राप्त 'एर्वेबो' वैक्सीन का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन इसका अध्ययन जारी है कि यह मौजूदा बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ भी प्रभावी है या नहीं। 27 अगस्त से विशेष मानवीय उपयोग व्यवस्था के तहत अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को यह वैक्सीन दी जा रही है।
यह इबोला प्रकोप ऐतिहासिक रूप से कितना बड़ा है?
मई 2026 में घोषित यह प्रकोप डीआरसी के इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे घातक इबोला महामारी है। वैश्विक स्तर पर यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इबोला प्रकोप है — इससे बड़ा केवल 2014-2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में फैला प्रकोप था।
स्वास्थ्यकर्मियों पर इस प्रकोप का क्या असर पड़ा है?
अब तक 167 स्वास्थ्यकर्मी इबोला से संक्रमित पाए गए हैं और उनमें से 47 की मृत्यु हो चुकी है। इसके बावजूद 6 सितंबर तक 2,007 अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है।
राष्ट्र प्रेस
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