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महाराष्ट्र की 138 फास्ट ट्रैक अदालतों में से केवल 58 सक्रिय, फडणवीस बोले — हाईकोर्ट से जारी है संवाद

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महाराष्ट्र की 138 फास्ट ट्रैक अदालतों में से केवल 58 सक्रिय, फडणवीस बोले — हाईकोर्ट से जारी है संवाद

सारांश

महाराष्ट्र की 138 स्वीकृत फास्ट ट्रैक अदालतों में से केवल 58 चालू हैं — और इसकी वजह न बजट है, न इच्छाशक्ति, बल्कि न्यायाधीशों की कमी। CM फडणवीस ने विधानसभा में माना कि नियुक्ति न्यायपालिका के हाथ में है, और सरकार हाईकोर्ट से संवाद कर रही है।

मुख्य बातें

महाराष्ट्र में स्वीकृत 138 फास्ट ट्रैक अदालतों में से अभी केवल 58 कार्यरत हैं।
CM देवेंद्र फडणवीस ने 7 जुलाई को विधानसभा में बताया कि न्यायाधीश नियुक्ति के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट से पिछले एक वर्ष से संपर्क जारी है।
हाईकोर्ट ने सरकार को आश्वस्त किया है कि नए न्यायाधीशों की भर्ती और पदोन्नति प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने पुणे की मकोका अदालत सहित निचली अदालतों में वर्षों से लंबित मामलों पर गंभीर चिंता जताई।
मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि मुख्य न्यायाधीश के साथ अगली बैठक में रिक्तियाँ भरने का मुद्दा प्राथमिकता से उठाया जाएगा।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार, 7 जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में स्वीकार किया कि राज्य में स्वीकृत 138 फास्ट ट्रैक अदालतों में से अभी केवल 58 ही कार्यरत हैं। शेष अदालतों के लिए न्यायाधीश उपलब्ध कराने को लेकर राज्य सरकार पिछले एक वर्ष से बॉम्बे हाईकोर्ट के साथ लगातार पत्राचार और संयुक्त बैठकें कर रही है।

विधानसभा में क्या बोले मुख्यमंत्री

विधायक राहुल कुल के प्रश्न का उत्तर देते हुए फडणवीस ने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति पूर्णतः न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आती है, इसलिए सरकार सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती। उन्होंने बताया कि सरकार मुख्य न्यायाधीश के साथ नियमित बैठकों के ज़रिये रिक्त पदों को भरने का अनुरोध करती रही है।

मुख्यमंत्री ने यह भी जानकारी दी कि हाईकोर्ट ने सरकार को आश्वस्त किया है कि नए न्यायाधीशों की भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। प्रक्रिया पूरी होते ही सभी 138 स्वीकृत फास्ट ट्रैक अदालतों में न्यायाधीश नियुक्त कर दिए जाएंगे।

डिजिग्नेटेड अदालतों की सीमाएँ

फडणवीस ने बताया कि जब तक सभी रिक्तियाँ नहीं भरी जातीं, तब तक कुछ अदालतों को विशेष मामलों की सुनवाई के लिए 'डिजिग्नेटेड' दर्जा दिया गया है। हालाँकि इन अदालतों को सामान्य मामलों की सुनवाई भी करनी पड़ती है, जिससे उनकी विशेष क्षमता सीमित हो जाती है।

गौरतलब है कि पिछले 10 से 12 वर्षों में महाराष्ट्र में सत्र न्यायालयों और अतिरिक्त जिला न्यायालयों का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि न्यायिक ढाँचे को मजबूत करने के लिए सरकार आवश्यक धन और सुविधाएं उपलब्ध कराती रहेगी।

विधानसभा अध्यक्ष की चिंता और निर्देश

इस चर्चा के दौरान विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि निचली अदालतों में बड़ी संख्या में रिक्त पद होने के कारण न्याय मिलने में गंभीर देरी हो रही है। उन्होंने विशेष रूप से पुणे की मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट) अदालत का उल्लेख किया, जहाँ कई आपराधिक मामले वर्षों से लंबित हैं।

अध्यक्ष नार्वेकर ने निर्देश दिया कि खाली पड़े न्यायाधीशों के पदों को तत्काल भरा जाए और मुख्य न्यायाधीश के साथ समन्वय कर इस प्रक्रिया में तेज़ी लाई जाए। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में पहुँच चुकी है।

नई अदालतों की मंजूरी की प्रक्रिया

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अतिरिक्त अदालतों की आवश्यकता का निर्धारण हाईकोर्ट की एक समिति लंबित मामलों की संख्या के आधार पर करती है। पुणे या किसी अन्य स्थान से नई अदालतों की माँग आने पर लंबित मामलों का आकलन कर आवश्यकतानुसार मंजूरी दी जाएगी।

आगे की राह

अध्यक्ष के निर्देशों पर फडणवीस ने आश्वासन दिया कि मुख्य न्यायाधीश के साथ होने वाली अगली बैठक में न्यायाधीशों की रिक्तियों का मुद्दा प्राथमिकता से उठाया जाएगा। जिन क्षेत्रों में न्यायाधीशों की भारी कमी है, वहाँ भर्ती प्रक्रिया तेज़ करने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास करेगी। न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच यह समन्वय महाराष्ट्र की न्यायिक क्षमता को वास्तविक रूप से बढ़ाने की दिशा में निर्णायक साबित होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह सवाल बना रहता है कि एक वर्ष के 'पत्राचार और बैठकों' के बाद भी ठोस नतीजा क्यों नहीं आया। पुणे की मकोका अदालत जैसे मामले बताते हैं कि न्यायिक विलंब केवल संख्याओं का नहीं, बल्कि आम नागरिकों के न्याय तक पहुँच का संकट है — और इसके लिए कार्यपालिका व न्यायपालिका दोनों को जवाबदेह होना होगा।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र में कितनी फास्ट ट्रैक अदालतें स्वीकृत हैं और कितनी चालू हैं?
महाराष्ट्र में कुल 138 फास्ट ट्रैक अदालतें स्वीकृत हैं, लेकिन अभी केवल 58 ही कार्यरत हैं। शेष अदालतों के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति अभी लंबित है।
बाकी फास्ट ट्रैक अदालतें क्यों शुरू नहीं हो पाई हैं?
न्यायाधीशों की नियुक्ति पूर्णतः न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में होती है। CM फडणवीस के अनुसार, सरकार बॉम्बे हाईकोर्ट से लगातार संपर्क में है और हाईकोर्ट ने बताया है कि भर्ती प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
डिजिग्नेटेड अदालतें क्या होती हैं और इनकी क्या सीमाएँ हैं?
डिजिग्नेटेड अदालतें वे अदालतें हैं जिन्हें विशेष श्रेणी के मामलों की सुनवाई के लिए नामित किया गया है। हालाँकि इन्हें सामान्य मामले भी सुनने पड़ते हैं, जिससे इनकी विशेष क्षमता सीमित हो जाती है।
पुणे की मकोका अदालत को लेकर क्या चिंता जताई गई?
विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने बताया कि पुणे की मकोका अदालत सहित कई अदालतों में आपराधिक मामले वर्षों से लंबित हैं। न्यायाधीशों के रिक्त पदों के कारण आम नागरिकों को न्याय मिलने में गंभीर देरी हो रही है।
नई अदालतों की मंजूरी कैसे मिलती है और आगे क्या होगा?
नई अदालतों की आवश्यकता का निर्धारण हाईकोर्ट की एक समिति लंबित मामलों की संख्या के आधार पर करती है। CM फडणवीस ने आश्वासन दिया है कि मुख्य न्यायाधीश के साथ अगली बैठक में रिक्तियाँ भरने का मुद्दा प्राथमिकता से उठाया जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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