फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की 18वीं पुण्यतिथि: तीनों सेनाओं ने ऊटी में दी श्रद्धांजलि
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सशस्त्र बलों ने 27 जून 2025 को देश के पहले फील्ड मार्शल सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ की 18वीं पुण्यतिथि पर उदगमंडलम (ऊटी) स्थित पारसी जोरोस्ट्रियन कब्रिस्तान में एक गरिमामय श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया। थल सेना, नौसेना और वायु सेना के प्रतिनिधियों ने एकजुट होकर उस महान सैन्य नायक को नमन किया, जिनकी रणनीतिक प्रतिभा ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इतिहास रचा था।
समारोह का आयोजन और उपस्थित गणमान्य
मद्रास रेजिमेंटल सेंटर (MRC) और डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज (DSSC) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस समारोह में सैन्य अधिकारी, पूर्व सैनिक, स्थानीय नागरिक और पारसी समुदाय के सदस्य शामिल हुए। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ तथा तीनों सेनाओं के प्रमुखों की ओर से पुष्पचक्र अर्पित किए गए।
समारोह में DSSC के कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल मनीष मोहन एरी, 8 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट के कर्नल मेजर जनरल कार्तिक सी. शेषाद्री और वेलिंगटन के स्टेशन कमांडर एवं MRC के कमांडेंट ब्रिगेडियर कृष्णेंदु दास सहित अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। सभी ने फील्ड मार्शल के चित्र और समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की।
सैन्य परंपराओं के साथ हुआ श्रद्धांजलि समारोह
मद्रास रेजिमेंट के जवानों ने 'गार्ड ऑफ ऑनर' प्रस्तुत किया। बिगुल वादकों ने 'लास्ट पोस्ट' की धुन बजाई, जिसके बाद दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत फील्ड मार्शल को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। उपस्थित लोगों ने उन्हें भारतीय सैन्य इतिहास की अमूल्य धरोहर बताया।
सैम बहादुर की अमर विरासत
'सैम बहादुर' के नाम से प्रसिद्ध मानेकशॉ ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। उनकी दूरदर्शी रणनीति के परिणामस्वरूप 93,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश का उदय हुआ — यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी एकल युद्ध में सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था। इस असाधारण उपलब्धि के सम्मान में उन्हें जनवरी 1973 में भारत के पहले फील्ड मार्शल की उपाधि से विभूषित किया गया।
कुन्नूर से ऊटी तक — एक राष्ट्रनायक की यात्रा
करीब चार दशक की अदम्य सेवा के बाद मानेकशॉ ने तमिलनाडु के कुन्नूर को अपना स्थायी निवास बनाया। 27 जून 2008 को उनके निधन के बाद से ऊटी स्थित उनकी समाधि भारतीय सैनिकों और देशवासियों के लिए प्रेरणा का तीर्थस्थल बन चुकी है। भारतीय सशस्त्र बलों ने इस अवसर पर उनकी विरासत को आगे बढ़ाने और उनके आदर्शों का पालन करने का संकल्प पुनः दोहराया।