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सैम मानेकशॉ पुण्यतिथि: डॉक्टर बनने से इनकार, फिर बने भारत के पहले फील्ड मार्शल

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सैम मानेकशॉ पुण्यतिथि: डॉक्टर बनने से इनकार, फिर बने भारत के पहले फील्ड मार्शल

सारांश

डॉक्टर बनने की पिता की इच्छा ठुकराकर IMA के पहले बैच में शामिल हुए सैम मानेकशॉ ने 1971 में महज 13 दिनों में 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण कराया और बांग्लादेश का निर्माण सुनिश्चित किया। भारत के पहले फील्ड मार्शल की पुण्यतिथि पर उनकी असाधारण विरासत को याद करता है राष्ट्र प्रेस।

मुख्य बातें

सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर के एक पारसी परिवार में हुआ था।
पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर जुलाई 1932 में भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) के प्रथम बैच 'द पायनियर्स' में प्रवेश लिया।
1971 युद्ध में केवल 13 दिनों में 90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया, जिससे बांग्लादेश का उदय हुआ।
नौकरशाही अड़चनों के कारण लंबे समय तक केवल आधी पेंशन मिली; अप्रैल 2007 में ₹1.16 करोड़ का बकाया चेक सौंपा गया।
27 जून 2008 को वेलिंगटन, तमिलनाडु में 94 वर्ष की आयु में निधन।

भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम होर्मूसजी फ्रैमजी जमशेदजी मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर के एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता एक चिकित्सक थे और चाहते थे कि सैम भी लंदन जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई करें। लेकिन युवा सैम ने पिता की इस इच्छा के विरुद्ध जाकर जुलाई 1932 में नवस्थापित भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) के प्रथम बैच — जिसे 'द पायनियर्स' कहा गया — में दाखिला लिया और एक ऐसे सैन्य जीवन की नींव रखी जो भारतीय इतिहास में अमर हो गई।

निजी जीवन और गोरखा सैनिकों से प्रेम

22 अप्रैल 1939 को सैम मानेकशॉ का विवाह सिलू बोडे से हुआ। सेना में उनकी पहचान केवल एक कुशल रणनीतिकार के रूप में नहीं, बल्कि एक बेबाक और मानवीय अधिकारी के रूप में भी थी। गोरखा सैनिकों की वीरता के वे प्रशंसक थे और उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी सेना में दोहराया जाता है — 'यदि कोई कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।' गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने ही उन्हें स्नेह और सम्मान से 'सैम बहादुर' की उपाधि दी थी।

1971 युद्ध: इतिहास की सबसे बड़ी परीक्षा

सैम मानेकशॉ के नेतृत्व की असली कसौटी 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सामने आई। अप्रैल 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान में बढ़ते मानवीय संकट को देखते हुए तत्काल सैन्य हस्तक्षेप का दबाव बनाया। जनरल सैम ने दृढ़तापूर्वक इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि मानसून की भारी वर्षा में सेना की गति अवरुद्ध हो जाएगी और हार का जोखिम बढ़ेगा। उन्होंने सरकार से कुछ महीनों की तैयारी का समय माँगा और 100 प्रतिशत सफलता का भरोसा दिया। यह साहसिक निर्णय बाद में उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण बना।

जब 3 दिसंबर 1971 की शाम पाकिस्तान ने भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया, तो सैम ने अपनी बहुआयामी और तीव्र सैन्य योजना को क्रियान्वित किया। युद्ध आरंभ होने से पूर्व उन्होंने अपने जवानों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि स्थानीय महिलाओं की गरिमा का पूर्ण सम्मान किया जाए। केवल 13 दिनों में भारत ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की — 90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया और इसी के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का उदय हुआ।

फील्ड मार्शल का सम्मान और बकाया पेंशन विवाद

सैम मानेकशॉ 15 जनवरी 1973 को सेना से सेवानिवृत्त हुए। फील्ड मार्शल का पद आजीवन होता है और इस पद का अधिकारी कभी औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त नहीं होता, इसलिए वे पूर्ण वेतन के हकदार थे। कथित तौर पर नौकरशाही बाधाओं के चलते उन्हें लंबे समय तक केवल आधी पेंशन ही मिलती रही।

राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हस्तक्षेप के बाद अप्रैल 2007 में तत्कालीन रक्षा सचिव शेखर दत्त स्वयं अस्पताल पहुँचे और उन्हें ₹1.16 करोड़ के बकाये का चेक सौंपा। यह प्रसंग भारतीय नौकरशाही और उसके सैन्य नायकों के प्रति व्यवहार पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

अंतिम विदाई

27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन में फेफड़ों के संक्रमण के कारण 94 वर्ष की आयु में इस महान सैन्य नायक ने अंतिम साँस ली। उनकी पुण्यतिथि पर देश उस अद्वितीय सेनापति को नमन करता है जिसने डॉक्टर बनने की पारिवारिक इच्छा को दरकिनार कर भारतीय सेना को एक नई पहचान दी — और एक युद्ध में ऐसी विजय दिलाई जो इतिहास में दर्ज हो गई।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसे अपने ही देश की नौकरशाही से न्याय के लिए राष्ट्रपति के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा करनी पड़ी। उनकी विरासत यह भी याद दिलाती है कि सैन्य नेतृत्व में राजनीतिक साहस और व्यावसायिक दूरदर्शिता का संयोग कितना दुर्लभ और निर्णायक होता है।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सैम मानेकशॉ भारत के पहले फील्ड मार्शल कैसे बने?
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में ऐतिहासिक विजय दिलाने के बाद सैम मानेकशॉ को भारत के पहले फील्ड मार्शल के पद से सम्मानित किया गया। यह पद आजीवन होता है और इसका अधिकारी कभी औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त नहीं होता।
1971 युद्ध में सैम मानेकशॉ ने तत्काल सैन्य कार्रवाई से क्यों मना किया था?
अप्रैल 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तत्काल सैन्य हस्तक्षेप के दबाव पर जनरल सैम ने कहा कि मानसून की भारी बारिश में सेना की गति रुक जाएगी और हार का जोखिम बढ़ेगा। उन्होंने कुछ महीनों की तैयारी माँगी और 100 प्रतिशत सफलता का आश्वासन दिया, जो बाद में सही साबित हुआ।
सैम मानेकशॉ को 'सैम बहादुर' क्यों कहा जाता है?
गोरखा रेजिमेंट के सैनिकों ने उन्हें स्नेह और सम्मान से 'सैम बहादुर' की उपाधि दी थी। सैम गोरखा सैनिकों की निडरता के प्रबल प्रशंसक थे और उनका प्रसिद्ध कथन — 'जो कहता है उसे मौत से डर नहीं, वह या तो झूठा है या गोरखा' — आज भी सेना में दोहराया जाता है।
सैम मानेकशॉ की पेंशन विवाद क्या था?
फील्ड मार्शल का पद आजीवन होने के बावजूद कथित तौर पर नौकरशाही अड़चनों के चलते उन्हें लंबे समय तक केवल आधी पेंशन मिलती रही। राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हस्तक्षेप के बाद अप्रैल 2007 में तत्कालीन रक्षा सचिव शेखर दत्त ने अस्पताल जाकर उन्हें ₹1.16 करोड़ के बकाये का चेक सौंपा।
सैम मानेकशॉ का निधन कब और कहाँ हुआ?
27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन में फेफड़ों के संक्रमण के कारण 94 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। वे जुलाई 1932 में IMA के पहले बैच से अपनी यात्रा शुरू करने वाले उस सैनिक थे जिन्होंने भारतीय सैन्य इतिहास को नई ऊँचाई दी।
राष्ट्र प्रेस
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