सैम मानेकशॉ पुण्यतिथि: डॉक्टर बनने से इनकार, फिर बने भारत के पहले फील्ड मार्शल
सारांश
मुख्य बातें
भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम होर्मूसजी फ्रैमजी जमशेदजी मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर के एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता एक चिकित्सक थे और चाहते थे कि सैम भी लंदन जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई करें। लेकिन युवा सैम ने पिता की इस इच्छा के विरुद्ध जाकर जुलाई 1932 में नवस्थापित भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) के प्रथम बैच — जिसे 'द पायनियर्स' कहा गया — में दाखिला लिया और एक ऐसे सैन्य जीवन की नींव रखी जो भारतीय इतिहास में अमर हो गई।
निजी जीवन और गोरखा सैनिकों से प्रेम
22 अप्रैल 1939 को सैम मानेकशॉ का विवाह सिलू बोडे से हुआ। सेना में उनकी पहचान केवल एक कुशल रणनीतिकार के रूप में नहीं, बल्कि एक बेबाक और मानवीय अधिकारी के रूप में भी थी। गोरखा सैनिकों की वीरता के वे प्रशंसक थे और उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी सेना में दोहराया जाता है — 'यदि कोई कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।' गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने ही उन्हें स्नेह और सम्मान से 'सैम बहादुर' की उपाधि दी थी।
1971 युद्ध: इतिहास की सबसे बड़ी परीक्षा
सैम मानेकशॉ के नेतृत्व की असली कसौटी 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सामने आई। अप्रैल 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान में बढ़ते मानवीय संकट को देखते हुए तत्काल सैन्य हस्तक्षेप का दबाव बनाया। जनरल सैम ने दृढ़तापूर्वक इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि मानसून की भारी वर्षा में सेना की गति अवरुद्ध हो जाएगी और हार का जोखिम बढ़ेगा। उन्होंने सरकार से कुछ महीनों की तैयारी का समय माँगा और 100 प्रतिशत सफलता का भरोसा दिया। यह साहसिक निर्णय बाद में उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण बना।
जब 3 दिसंबर 1971 की शाम पाकिस्तान ने भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया, तो सैम ने अपनी बहुआयामी और तीव्र सैन्य योजना को क्रियान्वित किया। युद्ध आरंभ होने से पूर्व उन्होंने अपने जवानों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि स्थानीय महिलाओं की गरिमा का पूर्ण सम्मान किया जाए। केवल 13 दिनों में भारत ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की — 90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया और इसी के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का उदय हुआ।
फील्ड मार्शल का सम्मान और बकाया पेंशन विवाद
सैम मानेकशॉ 15 जनवरी 1973 को सेना से सेवानिवृत्त हुए। फील्ड मार्शल का पद आजीवन होता है और इस पद का अधिकारी कभी औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त नहीं होता, इसलिए वे पूर्ण वेतन के हकदार थे। कथित तौर पर नौकरशाही बाधाओं के चलते उन्हें लंबे समय तक केवल आधी पेंशन ही मिलती रही।
राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हस्तक्षेप के बाद अप्रैल 2007 में तत्कालीन रक्षा सचिव शेखर दत्त स्वयं अस्पताल पहुँचे और उन्हें ₹1.16 करोड़ के बकाये का चेक सौंपा। यह प्रसंग भारतीय नौकरशाही और उसके सैन्य नायकों के प्रति व्यवहार पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
अंतिम विदाई
27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन में फेफड़ों के संक्रमण के कारण 94 वर्ष की आयु में इस महान सैन्य नायक ने अंतिम साँस ली। उनकी पुण्यतिथि पर देश उस अद्वितीय सेनापति को नमन करता है जिसने डॉक्टर बनने की पारिवारिक इच्छा को दरकिनार कर भारतीय सेना को एक नई पहचान दी — और एक युद्ध में ऐसी विजय दिलाई जो इतिहास में दर्ज हो गई।