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रास बिहारी बोस: गदर क्रांति से आजाद हिंद फौज तक, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी

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रास बिहारी बोस: गदर क्रांति से आजाद हिंद फौज तक, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी

सारांश

गदर क्रांति की आग और दिल्ली बम कांड से लेकर जापान में आजाद हिंद फौज की नींव रखने तक — रास बिहारी बोस वह क्रांतिकारी थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को दो महाद्वीपों पर चुनौती दी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को एक तैयार मंच सौंपा।

मुख्य बातें

रास बिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल के एक कायस्थ परिवार में हुआ था।
23 दिसंबर 1912 को उन्होंने चांदनी चौक, दिल्ली में गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग पर बम हमले की योजना बनाई; हार्डिंग घायल हुआ।
गिरफ्तारी से बचने के लिए वह जापान चले गए और वहाँ इंडियन इंडिपेंडेंस लीग को सुदृढ़ किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने आजाद हिंद फौज (INA) की बुनियाद रखी; 1943 में कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंपी।
जापान सरकार ने उन्हें दूसरे सर्वोच्च सम्मान 'ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन' से सम्मानित किया।
21 जनवरी 1945 को उनका निधन हुआ।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक रास बिहारी बोस उन विरले क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने गदर क्रांति की आग जलाने से लेकर आजाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) की बुनियाद रखने तक, अपना संपूर्ण जीवन ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने में झोंक दिया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों ने अंग्रेजी हुकूमत को इस कदर भयभीत किया कि वह दशकों तक उनका पीछा करती रही।

प्रारंभिक जीवन और क्रांति की राह

25 मई 1886 को बंगाल के एक कायस्थ परिवार में जन्मे रास बिहारी बोस के मन में बाल्यकाल से ही देशभक्ति की गहरी भावना थी। 1905 के आसपास वह क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए और धीरे-धीरे ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों की अग्रिम पंक्ति में आ गए। यह वह दौर था जब देशभर में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध युवाओं का आक्रोश चरम पर था।

दिल्ली बम कांड: हार्डिंग पर हमले की योजना

रास बिहारी बोस का नाम इतिहास में सबसे अधिक 23 दिसंबर 1912 की उस घटना के लिए अमर है, जब उन्होंने तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग पर बम हमले की योजना बनाई। दिल्ली के चांदनी चौक में हार्डिंग की भव्य सवारी के दौरान युवा क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास को बम फेंकने की जिम्मेदारी सौंपी गई। जैसे ही जुलूस चांदनी चौक पहुँचा, बम फेंका गया और जोरदार विस्फोट हुआ। इस हमले में हार्डिंग घायल हो गया और उसका हाथी मारा गया, हालाँकि वह स्वयं बच निकला। इस घटना ने ब्रिटिश प्रशासन को हिलाकर रख दिया और अंग्रेजों की रातों की नींद उड़ा दी।

बौखलाई ब्रिटिश सरकार ने इसके बाद भारतीय क्रांतिकारियों के विरुद्ध व्यापक दमन अभियान छेड़ दिया। गिरफ्तारी से बचने के लिए रास बिहारी बोस देहरादून लौट आए, जहाँ वह फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। परंतु अंग्रेज लगातार उनकी तलाश में जुटे रहे और बढ़ते खतरे को भाँपते हुए वह जापान चले गए।

जापान में क्रांति की अलख: इंडियन इंडिपेंडेंस लीग

जापान पहुँचने के बाद भी रास बिहारी बोस ने भारत की आजादी की लड़ाई से मुँह नहीं मोड़ा। उन्होंने वहाँ रहकर विदेशों में बसे भारतीयों को संगठित किया और 'इंडियन इंडिपेंडेंस लीग' को सुदृढ़ बनाया। उनका लक्ष्य प्रवासी भारतीयों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना और आर्थिक व राजनीतिक समर्थन जुटाना था। यह ऐसे समय में आया जब भारत में अंग्रेजी दमन अपने चरम पर था।

आजाद हिंद फौज की नींव और नेताजी को नेतृत्व सौंपना

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रास बिहारी बोस ने भारतीय सैनिकों को एकजुट कर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की तैयारी की। इसी दृष्टि से आजाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) की बुनियाद रखी गई। गौरतलब है कि बाद में इस फौज को नई पहचान और व्यापक शक्ति नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में मिली, परंतु इसकी नींव तैयार करने में रास बिहारी बोस की भूमिका सर्वोपरि थी।

1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जापान पहुँचे, तब रास बिहारी बोस ने — जो उस समय इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के अध्यक्ष थे — उनका उत्साहपूर्ण स्वागत किया। उन्होंने लीग और आजाद हिंद फौज दोनों की कमान नेताजी को सौंप दी और स्वयं सलाहकार की भूमिका में रहते हुए आंदोलन को मजबूत करते रहे।

जापान का सर्वोच्च सम्मान और विरासत

रास बिहारी बोस के अतुलनीय संघर्ष और योगदान को देखते हुए जापान सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े सम्मान 'ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन' से नवाजा — एक ऐसा सम्मान जो किसी विदेशी नागरिक को अत्यंत विरले ही प्रदान किया जाता था। 21 जनवरी 1945 को उनका निधन हो गया, किंतु गदर क्रांति से आजाद हिंद फौज तक की उनकी यात्रा भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में एक अमिट अध्याय बनी हुई है। उनकी विरासत आज भी उन सभी को प्रेरणा देती है जो स्वतंत्रता और न्याय के लिए संघर्षरत हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है — आजाद हिंद फौज की पूरी श्रेय-गाथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस को मिलती है, जबकि उसकी वास्तुकला रास बिहारी बोस ने तैयार की थी। यह विडंबना है कि जिस व्यक्ति ने दो महाद्वीपों पर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी और जापान जैसे विदेशी राष्ट्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान अर्जित किया, वह स्वतंत्र भारत की सामूहिक स्मृति में हाशिये पर रहा। उनकी कहानी यह भी रेखांकित करती है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल एक भूगोल तक सीमित नहीं था — वह एशिया के कई देशों में एक साथ लड़ा जा रहा था।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रास बिहारी बोस कौन थे और उनका स्वतंत्रता संग्राम में क्या योगदान था?
रास बिहारी बोस भारत के प्रमुख क्रांतिकारी थे जिन्होंने गदर क्रांति, दिल्ली बम कांड और आजाद हिंद फौज की स्थापना में केंद्रीय भूमिका निभाई। उन्होंने जापान में रहकर इंडियन इंडिपेंडेंस लीग को संगठित किया और 1943 में इसकी कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंपी।
दिल्ली बम कांड 1912 क्या था?
23 दिसंबर 1912 को रास बिहारी बोस की योजना के तहत चांदनी चौक, दिल्ली में गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग की सवारी पर बम फेंका गया था। इस हमले में हार्डिंग घायल हो गया और उसका हाथी मारा गया, हालाँकि हार्डिंग बच निकला।
रास बिहारी बोस जापान क्यों गए?
दिल्ली बम कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने रास बिहारी बोस की गिरफ्तारी के लिए व्यापक अभियान चलाया। बढ़ते खतरे को देखते हुए वह जापान चले गए, जहाँ उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग को मजबूत किया और आजाद हिंद फौज की नींव रखी।
आजाद हिंद फौज की स्थापना में रास बिहारी बोस की क्या भूमिका थी?
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रास बिहारी बोस ने जापान में भारतीय सैनिकों को एकजुट कर आजाद हिंद फौज की बुनियाद रखी। 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जापान आगमन पर उन्होंने लीग और फौज दोनों की कमान नेताजी को सौंप दी।
रास बिहारी बोस को जापान का 'ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन' सम्मान क्यों मिला?
जापान सरकार ने रास बिहारी बोस के असाधारण संघर्ष और भारत-जापान सहयोग में योगदान को देखते हुए उन्हें अपने दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन' से नवाजा। यह सम्मान किसी विदेशी नागरिक को अत्यंत विरले ही दिया जाता था।
राष्ट्र प्रेस
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