4 अक्टूबर 2026
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पितृपक्ष मेला 2026: गयाजी में 48 विदेशी श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान-तर्पण, रूस से ब्राजील तक पहुँची आस्था

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पितृपक्ष मेला 2026: गयाजी में 48 विदेशी श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान-तर्पण, रूस से ब्राजील तक पहुँची आस्था

सारांश

रूस से ब्राजील तक — इस बार पितृपक्ष मेला केवल भारतीय आस्था का उत्सव नहीं रहा। गयाजी में 48 विदेशी पिंडदानियों ने अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया और भारत की प्राचीन श्राद्ध परंपरा को अपने देशों तक ले जाने का संकल्प लिया।

मुख्य बातें

पितृपक्ष मेला 2026 में गयाजी, बिहार में रूस, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्राजील और यूक्रेन सहित कई देशों के 48 विदेशी श्रद्धालुओं ने पिंडदान एवं तर्पण किया।
विदेशी पिंडदानियों ने विष्णुपद मंदिर, प्रेतशिला और अक्षयवट पर जाकर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए।
4 अक्टूबर 2026 को श्रद्धालुओं ने जिला प्रशासन के साथ अनुभव साझा किए और भीड़ प्रबंधन, स्वच्छता व यातायात व्यवस्था की सराहना की।
सहायक समाहर्ता नितेश गोयल ने बताया कि 15 दिवसीय पितृपक्ष मेले में राज्य सरकार द्वारा व्यवस्थाओं की निरंतर निगरानी की जा रही है।
विदेशी श्रद्धालुओं को गया-बोधगया की सांस्कृतिक विरासत दर्शाने वाली कॉफी टेबल बुक और गंगाजल भेंट किया गया।

पितृपक्ष मेला 2026 में बिहार के गयाजी की सदियों पुरानी आध्यात्मिक विरासत इस बार अंतरराष्ट्रीय श्रद्धालुओं को भी अपनी ओर खींच रही है। रूस, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्राजील और यूक्रेन सहित विभिन्न देशों से आए 48 विदेशी पिंडदानियों ने गयाजी में अपने पूर्वजों की आत्मशांति के लिए पिंडदान एवं तर्पण संपन्न किया। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि भारत की प्राचीन श्राद्ध परंपरा अब केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं रही।

मुख्य घटनाक्रम

विदेशी श्रद्धालुओं ने विष्णुपद मंदिर, प्रेतशिला और अक्षयवट सहित गयाजी के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर जाकर अपने पितरों के लिए विधिवत पिंडदान एवं तर्पण किया। पिंडदान के पश्चात रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को इन श्रद्धालुओं ने जिला प्रशासन के पदाधिकारियों के साथ अपने अनुभव साझा किए।

श्रद्धालुओं ने बताया कि बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों की उपस्थिति के बावजूद धार्मिक स्थलों पर व्यवस्थाएँ सुचारू रूप से संचालित हो रही हैं। उन्होंने भीड़ प्रबंधन, यातायात व्यवस्था और स्वच्छता को विशेष रूप से सराहा।

आध्यात्मिक अनुभव और सांस्कृतिक प्रभाव

विदेशी पिंडदानियों ने गयाजी की पूजा-पद्धति, मंदिरों की प्राचीनता और स्थानीय जनमानस की अटूट श्रद्धा को भारतीय संस्कृति की गहराई से जोड़ते हुए इस यात्रा को यादगार आध्यात्मिक अनुभव बताया। उनके अनुसार यहाँ की धार्मिक परंपराओं को निकट से देखना उनके लिए सर्वथा अनूठा रहा।

श्रद्धालुओं ने कहा कि गयाजी में उन्हें आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का गहरा अनुभव हुआ। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय संस्कृति और स्थानीय लोगों के आतिथ्य-भाव को करीब से समझने का यह दुर्लभ अवसर था।

प्रशासनिक व्यवस्था की सराहना

सहायक समाहर्ता नितेश गोयल ने बताया कि करीब 15 दिनों तक चलने वाला पितृपक्ष मेला देश-विदेश के तीर्थयात्रियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री द्वारा मेला व्यवस्थाओं की लगातार समीक्षा एवं निगरानी की जा रही है।

जिला प्रशासन ने मेडिकल सुविधा, भीड़ प्रबंधन, यातायात, स्वच्छता, सुरक्षा, खोया-पाया केंद्र और श्रद्धालु सहायता समेत सभी प्रमुख क्षेत्रों में पर्याप्त इंतजाम किए हैं। मेला क्षेत्र के विभिन्न सेक्टरों में तैनात अधिकारी और कर्मचारी लगातार निगरानी में जुटे हैं।

विदेशी श्रद्धालुओं ने मेला परिसर में सामाजिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा तीर्थयात्रियों की सहायता के लिए किए जा रहे कार्यों की भी प्रशंसा की।

गया-बोधगया की विरासत का वैश्विक संदेश

इस अवसर पर सहायक समाहर्ता नितेश गोयल ने विदेशी पिंडदानियों को गंगाजल तथा गया-बोधगया की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को दर्शाने वाली कॉफी टेबल बुक भेंट की। विदेशी श्रद्धालुओं ने आश्वस्त किया कि वे गयाजी में मिले अनुभवों को अपने-अपने देशों में साझा करेंगे और वहाँ के लोगों को भारत की आध्यात्मिक परंपरा तथा संस्कृति से अवगत कराएँगे।

गौरतलब है कि पितृपक्ष मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का माध्यम भी है। इस वर्ष की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी यह संकेत देती है कि गयाजी की आस्था की परिधि निरंतर विस्तृत होती जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन केवल 48 श्रद्धालुओं की संख्या से 'वैश्विक आकर्षण' का दावा सीमित लगता है — असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह अनुभव उन्हें और उनके देशवासियों को भारत की ओर बारंबार खींचता है। प्रशासनिक व्यवस्था की प्रशंसा सकारात्मक है, परंतु यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले वर्षों में विदेशी भागीदारी की संख्या में सार्थक वृद्धि होती है या नहीं। गया-बोधगया का यह संयुक्त आध्यात्मिक गलियारा — हिंदू और बौद्ध दोनों परंपराओं का केंद्र — भारत के सॉफ्ट पावर के लिए एक अनछुई संभावना है, जिसे केंद्र और राज्य सरकार मिलकर और सुनियोजित तरीके से भुना सकती हैं।
RashtraPress
4 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पितृपक्ष मेला 2026 में गयाजी में कितने विदेशी श्रद्धालु आए?
पितृपक्ष मेला 2026 में रूस, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्राजील और यूक्रेन सहित विभिन्न देशों से 48 विदेशी पिंडदानी गयाजी पहुँचे। इन्होंने विष्णुपद मंदिर, प्रेतशिला और अक्षयवट सहित प्रमुख धार्मिक स्थलों पर पिंडदान एवं तर्पण किया।
गयाजी में पिंडदान के लिए कौन-से प्रमुख धार्मिक स्थल हैं?
गयाजी में पिंडदान के लिए विष्णुपद मंदिर, प्रेतशिला और अक्षयवट प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। इन्हें हिंदू परंपरा में पितरों की मुक्ति के लिए सर्वाधिक पवित्र माना जाता है।
पितृपक्ष मेला कितने दिनों तक चलता है और इसका प्रबंधन कौन करता है?
पितृपक्ष मेला करीब 15 दिनों तक चलता है। सहायक समाहर्ता नितेश गोयल के अनुसार, जिला प्रशासन मेडिकल सुविधा, भीड़ प्रबंधन, यातायात, स्वच्छता, सुरक्षा और खोया-पाया केंद्र समेत सभी व्यवस्थाओं की निगरानी करता है, और राज्य सरकार द्वारा लगातार समीक्षा की जाती है।
विदेशी श्रद्धालुओं ने गयाजी के अनुभव के बारे में क्या कहा?
विदेशी श्रद्धालुओं ने गयाजी को यादगार आध्यात्मिक यात्रा बताया। उन्होंने कहा कि यहाँ उन्हें आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव हुआ, और वे इन अनुभवों को अपने-अपने देशों में साझा करेंगे।
गया-बोधगया का धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व क्या है?
गया हिंदू परंपरा में पितृ-तर्पण का सर्वोच्च केंद्र है, जबकि बोधगया बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र स्थल — जहाँ भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह क्षेत्र भारत की दो महान आध्यात्मिक परंपराओं का संगम बिंदु है, जो इसे वैश्विक तीर्थयात्रियों के लिए विशेष रूप से आकर्षक बनाता है।
राष्ट्र प्रेस
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