पितृ पक्ष 2026: गया के देवघाट पर 6 देशों के 48 विदेशी श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के गया स्थित देवघाट पर इस वर्ष पितृ पक्ष 2026 के अवसर पर आस्था की एक अनूठी तस्वीर उभरी — रूस, जर्मनी, इटली, स्पेन, पुर्तगाल और नीदरलैंड समेत कई देशों से आए कुल 48 विदेशी तीर्थयात्रियों ने 2 अक्टूबर 2026 को अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के लिए पूरे हिंदू विधि-विधान के साथ पिंडदान संपन्न किया। मोक्षधाम के रूप में सदियों से विख्यात गया में विदेशी श्रद्धालुओं की यह उपस्थिति इस तीर्थस्थल की वैश्विक आध्यात्मिक पहुँच को रेखांकित करती है।
तीन समूहों में बाँटकर संपन्न हुई पिंडदान की प्रक्रिया
विदेशी तीर्थयात्रियों के साथ आए पुरोहित ने बताया कि एक साथ 48 श्रद्धालुओं का पिंडदान कराना संभव नहीं था, इसलिए उन्हें तीन समूहों में विभाजित किया गया। पहले दिन 22 लोगों ने, दूसरे दिन 8 लोगों ने पिंडदान किया, और शेष श्रद्धालु तीसरे दिन यह अनुष्ठान संपन्न करेंगे। इन तीर्थयात्रियों में वे लोग शामिल हैं जिन्होंने अपने पति, बच्चों, माँ या बहन को खोया है — सभी अपने-अपने दुःख और श्रद्धा लेकर इस मोक्षभूमि पर आए हैं।
श्रद्धालुओं के अनुभव: आस्था और भावुकता का संगम
रूस से आई श्रद्धालु क्सेनिया ने कहा, 'मैं इस विशेष अनुभव के लिए गया आई हूँ। मुझे पूरी उम्मीद है कि यह अनुष्ठान मेरे दिवंगत माता-पिता, दादी और दादाजी की आत्मा के लिए बहुत फलदायी होगा। गया में यह मेरा पहला अनुभव है और मुझे विश्वास है कि सब कुछ बहुत अच्छा होगा।' यह उनकी गया की पहली यात्रा है।
जर्मनी के बर्लिन में रहने वाली एलेक्जेंड्रा के लिए यह दूसरी गया यात्रा है। वह तीन वर्ष पूर्व भी पिंडदान के लिए आई थीं और इस बार अन्य रुचि रखने वाले लोगों को भी साथ लेकर आई हैं। उन्होंने कहा, 'यहाँ आकर बहुत अच्छा लग रहा है। हम देखते हैं कि यहाँ लोग अपनी परंपराओं का कितना सम्मान करते हैं। हमें यहाँ बहुत ही स्वागत और सुरक्षित महसूस हो रहा है।'
एलेक्जेंड्रा ने यह भी कहा, 'लोग समझते हैं कि पितरों को सम्मान देने से न केवल उनके जीवन में, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन में भी सकारात्मक लाभ होता है। दुनिया में बहुत से लोग हर जगह घूमते हैं, लेकिन गया की इस पवित्र भूमि पर आने का सौभाग्य बहुत कम समूहों को ही मिलता है।'
प्रशासन और व्यवस्था पर संतोष
पुरोहित ने बताया कि विदेशी श्रद्धालु गया के वातावरण और यहाँ की व्यवस्थाओं से अत्यंत संतुष्ट हैं। सरकार और प्रशासन की ओर से सुरक्षा और सहयोग की जो व्यवस्था की गई है, उसकी भी सराहना हो रही है। एलेक्जेंड्रा ने कहा कि यद्यपि शुरुआत में यह उनके लिए एक अलग संस्कृति थी और वे थोड़ा असहज थीं, लेकिन यहाँ के लोगों का आत्मीय व्यवहार — मुस्कुराना, उत्सुकता से सवाल पूछना — उन्हें शीघ्र ही सहज बना गया।
आगे अफ्रीका से भी आ सकते हैं श्रद्धालु
गौरतलब है कि पितृ पक्ष का यह मेला केवल भारत तक सीमित नहीं रहा है — हर वर्ष विदेशी श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है। पुरोहित ने बताया कि आने वाले समय में अफ्रीका से भी श्रद्धालुओं के जत्थे के गया आने की उम्मीद है, जो इस तीर्थस्थल की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएँ संचालित कर रहा है।