27 सितंबर 2026
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थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ: 'रुक-रुक कर होने वाले युद्धों' के दौर में आत्मनिर्भरता की सोच बदलनी होगी

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थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ: 'रुक-रुक कर होने वाले युद्धों' के दौर में आत्मनिर्भरता की सोच बदलनी होगी

सारांश

थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने आधुनिक युद्ध को 'रुक-रुक कर होने वाले संघर्ष' बताते हुए कहा कि कुछ सौ डॉलर का ड्रोन लाखों डॉलर के सैन्य प्लेटफार्म को चुनौती दे सकता है। उनका संदेश साफ है — असली आत्मनिर्भरता तकनीक हासिल करने में नहीं, बल्कि विरोधी से तेज बदलाव की क्षमता विकसित करने में है।

मुख्य बातें

थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने 27 सितंबर 2026 को आधुनिक युद्ध को 'रुक-रुक कर होने वाले युद्ध' की संज्ञा दी।
रक्षा आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल स्वदेशी हथियार निर्माण नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संघर्ष में सैन्य ताकत बनाए रखने की क्षमता है।
'कुछ सौ डॉलर का ड्रोन लाखों डॉलर के सैन्य प्लेटफार्म के लिए खतरा बन सकता है' — जनरल सेठ।
भारतीय रक्षा उत्पाद 80 से अधिक देशों तक पहुँचे; 175 में से 159 प्रकार के गोला-बारूद का स्वदेशीकरण पूर्ण।
रक्षा उत्पादन में करीब 16,000 MSME की भागीदारी; 'समर्थ' अवधारणा के केंद्र में योद्धा।
पुरानी सैन्य प्रणालियों को नई तकनीक से जोड़कर प्रभावी बनाने पर जोर; जल्दबाजी में उन्हें बेकार न मानने की चेतावनी।

थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने 27 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में स्पष्ट किया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल स्वदेशी हथियार बनाना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संघर्षों में सैन्य ताकत को निरंतर बनाए रखने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढालने की क्षमता विकसित करना है। 'बदलते युद्ध के दौर में आत्मनिर्भरता' विषय पर संबोधित करते हुए उन्होंने आधुनिक युद्ध को 'रुक-रुक कर होने वाले युद्ध' की संज्ञा दी।

आधुनिक युद्ध का बदलता स्वरूप

जनरल सेठ ने 1971 के ढाका में हुए ऐतिहासिक आत्मसमर्पण का उल्लेख करते हुए कहा, 'पिछली सदी के युद्धों की एक स्पष्ट समाप्ति होती थी। 1971 की वह तस्वीर ऐसा ही एक क्षण थी, जब यह साफ था कि युद्ध समाप्त हो गया है। लेकिन आज के युद्धों में ऐसी स्पष्ट समाप्ति दिखाई नहीं देती।' उन्होंने कहा कि आज संघर्ष लंबे समय तक चलते हैं और बीच-बीच में भीषण लड़ाई होती रहती है।

उनके अनुसार, तकनीक लड़ाइयों की अवधि कम कर सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह युद्धों की अवधि भी कम करे। यह अंतर महत्वपूर्ण है और सैन्य नियोजन की पूरी रणनीति को प्रभावित करता है।

तकनीक और सैन्य क्षमता की चुनौती

जनरल सेठ ने रेखांकित किया कि सैन्य क्षमता को तैयार करने, विकसित करने, परखने और सेना में शामिल करने में कई वर्ष लगते हैं, जबकि तकनीक बहुत कम समय में बदल जाती है। उन्होंने कहा, 'कुछ सौ डॉलर की कीमत वाला ड्रोन लाखों डॉलर की कीमत वाले सैन्य प्लेटफार्म के लिए खतरा बन सकता है। कम कीमत वाली, स्मार्ट और बड़े पैमाने पर उपलब्ध तकनीक अब बेहद महंगे सैन्य हथियारों और उपकरणों के लिए भी खतरा बन सकती है।'

उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक अब कुछ देशों या संस्थाओं तक सीमित नहीं रही। जो तकनीक हमारे पास है, वही हमारे विरोधी के पास भी हो सकती है। इसलिए असली बढ़त केवल नई तकनीक हासिल करने में नहीं, बल्कि विरोधी से तेजी से नए समाधान खोजने और खुद को बदलने में है।

पुरानी प्रणालियों की प्रासंगिकता

थल सेनाध्यक्ष ने पुरानी सैन्य प्रणालियों को जल्दबाजी में बेकार मान लेने के प्रति भी आगाह किया। उन्होंने कहा, 'दशकों पहले विकसित की गई एयर डिफेंस तोपें आधुनिक सेंसर और अग्नि नियंत्रण प्रणाली के साथ ड्रोन और ड्रोन समूहों के खिलाफ प्रभावी हो सकती हैं।' उनके अनुसार, भविष्य की सैन्य क्षमता का अर्थ हमेशा पुराने हथियारों को बदलना नहीं है — कई बार पुरानी और भरोसेमंद प्रणालियों को नई तकनीक से जोड़कर उन्हें और प्रभावी बनाया जा सकता है।

जमीनी नियंत्रण और योद्धा की केंद्रीयता

सूचना, साइबर और अंतरिक्ष जैसे युद्ध के नए क्षेत्रों की बढ़ती भूमिका के बावजूद जनरल सेठ ने स्पष्ट किया कि जमीन पर नियंत्रण ही सफलता का एकमात्र प्रत्यक्ष संकेतक है। उन्होंने कहा, 'लंबी दूरी के हथियार युद्धक्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन जमीन पर कब्जा करने, उसे अपने नियंत्रण में रखने और उसकी रक्षा करने का काम अंततः सैनिक को ही करना होगा।'

उन्होंने 'समर्थ' की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कहा कि आत्मनिर्भरता के केंद्र में योद्धा होना चाहिए। उनके शब्दों में, 'आत्मनिर्भरता हमें लड़ने की स्वतंत्रता देती है। क्षमता हमें लड़ने की सामर्थ्य देती है। योद्धा हमें लड़ने की इच्छाशक्ति देता है। ये सभी मिलकर हमें जीतने की क्षमता देते हैं।'

स्वदेशीकरण की उपलब्धियाँ और आगे की राह

जनरल सेठ ने बताया कि भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों तक पहुँच चुके हैं। 175 में से 159 प्रकार के गोला-बारूद का स्वदेशीकरण पूरा हो चुका है और रक्षा उत्पादन में करीब 16,000 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (MSME) भाग ले रहे हैं। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाएँ भू-राजनीतिक तनाव के कारण अनिश्चित हो रही हैं, और भारत की सामरिक स्वायत्तता की परीक्षा तेज होती जा रही है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 'समर्थ' की अवधारणा ठोस नीतिगत रूपरेखा में किस प्रकार ढलती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ सस्ते ड्रोनों ने महंगे टैंकों और वायु रक्षा प्रणालियों को चुनौती दी है। विडंबना यह है कि भारत का रक्षा अधिग्रहण तंत्र अभी भी दशक-लंबी खरीद प्रक्रियाओं में जकड़ा है, जबकि सेनाध्यक्ष खुद कह रहे हैं कि तकनीक बहुत तेज बदलती है। '80 देशों को निर्यात' और '16,000 MSME' जैसे आँकड़े उत्साहजनक हैं, लेकिन असली कसौटी यह है कि क्या ये उद्योग तेजी से बदलती युद्ध-तकनीक के साथ कदम मिला सकते हैं। 'समर्थ' अवधारणा एक सही दिशा है, पर इसे नीतिगत रूपरेखा में ढालने की गति पर ही भविष्य की सैन्य तैयारी निर्भर करेगी।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने 'रुक-रुक कर होने वाले युद्ध' से क्या मतलब बताया?
जनरल सेठ के अनुसार आधुनिक युद्धों की कोई स्पष्ट समाप्ति नहीं होती — संघर्ष लंबे समय तक चलते हैं और बीच-बीच में भीषण लड़ाई होती रहती है। तकनीक लड़ाइयों की अवधि कम कर सकती है, लेकिन युद्धों की अवधि कम करना जरूरी नहीं।
रक्षा आत्मनिर्भरता को लेकर सेनाध्यक्ष का क्या कहना है?
जनरल सेठ ने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल देश में हथियार बनाना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संघर्ष में सैन्य ताकत बनाए रखने, बदलती जरूरतों के अनुसार उसे ढालने और तेजी से नए समाधान खोजने की क्षमता विकसित करना है।
ड्रोन खतरे को लेकर भारतीय सेना की क्या चिंता है?
सेनाध्यक्ष ने चेताया कि कुछ सौ डॉलर की कीमत का ड्रोन लाखों डॉलर के सैन्य प्लेटफार्म के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए कम कीमत वाली स्मार्ट तकनीक का जवाब तैयार करना आज की सबसे बड़ी सैन्य चुनौती है।
भारत के रक्षा स्वदेशीकरण में अब तक क्या उपलब्धि हुई है?
जनरल सेठ के अनुसार भारतीय रक्षा उत्पाद 80 से अधिक देशों तक पहुँच चुके हैं, 175 में से 159 प्रकार के गोला-बारूद का स्वदेशीकरण पूरा हो चुका है और रक्षा उत्पादन में करीब 16,000 MSME भाग ले रहे हैं।
'समर्थ' अवधारणा क्या है जिसका जिक्र सेनाध्यक्ष ने किया?
थल सेनाध्यक्ष ने भविष्य की सैन्य क्षमताओं के विकास के लिए 'समर्थ' की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके केंद्र में योद्धा है। इसका सार यह है कि हर सैन्य क्षमता अंततः सैनिक को अधिक सक्षम बनाने के लिए बनाई जानी चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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