राजनाथ सिंह: रक्षा आत्मनिर्भरता का अर्थ तकनीकी संप्रभुता, विदेशी निर्भरता से मुक्ति
सारांश
मुख्य बातें
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 3 नवंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 'दिल्ली डिफेंस डायलॉग' 2026 को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ देश में हर चीज़ का उत्पादन करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भारत की महत्वपूर्ण रक्षा जरूरतें किसी भी अन्य देश पर निर्भर न रहें। उन्होंने कहा कि इसका असली लक्ष्य तकनीकी संप्रभुता हासिल करना है — ताकि भारत स्वयं रक्षा तकनीक विकसित कर सके, उसमें सुधार कर सके और उसे नियंत्रित कर सके।
आत्मनिर्भरता की परिभाषा
राजनाथ सिंह ने कहा कि किसी रक्षा उपकरण को देश में केवल असेंबल या निर्मित कर लेना सच्ची आत्मनिर्भरता नहीं है। उनके अनुसार, वास्तविक आत्मनिर्भरता तब मानी जाएगी जब भारत के पास उस उपकरण को डिज़ाइन करने का ज्ञान, निर्माण की तकनीक, सुधार के अधिकार और उसके पूरे जीवनकाल तक रखरखाव की क्षमता हो। यह परिभाषा पारंपरिक 'मेड इन इंडिया' की सोच से कहीं व्यापक है।
अनुसंधान एवं नवाचार तंत्र को मजबूत करने पर बल
रक्षा मंत्री ने कहा कि देश में एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ नए विचार तेज़ी से प्रयोग, विकास और सैन्य उपयोग तक पहुँच सकें। उन्होंने माना कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने भारत की रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन तकनीकी नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल एक संस्था की नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों, शोध प्रयोगशालाओं, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs), निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को मिलकर एक समन्वित नवाचार तंत्र बनाना होगा। गौरतलब है कि यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब सरकार iDEX (इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सेलेंस) जैसे मंचों के ज़रिए रक्षा स्टार्टअप इकोसिस्टम को विस्तार दे रही है।
प्रयोग और विफलता को स्वीकार करने की ज़रूरत
राजनाथ सिंह ने नवाचार के लिए एक खुला दृष्टिकोण अपनाने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि हर प्रयोग सफल नहीं होगा, लेकिन हर प्रयोग से कुछ नया सीखने को मिलना चाहिए। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि सफल प्रयोग केवल प्रयोगशाला या प्रोटोटाइप स्तर पर नहीं रुकने चाहिए — उन्हें बड़े पैमाने पर उत्पादन और वास्तविक सैन्य उपयोग तक पहुँचाना ज़रूरी है।
2047 तक वैश्विक रक्षा केंद्र बनने का लक्ष्य
रक्षा मंत्री ने कहा कि वर्ष 2047 में आज़ादी के 100 वर्ष पूरे होने तक भारत को रक्षा क्षेत्र में डिज़ाइन, विकास, निर्माण और नवाचार का प्रमुख वैश्विक केंद्र बनने का लक्ष्य रखना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भरता की यह कोशिश दुनिया से अलग-थलग पड़ने की नहीं है — बल्कि तकनीकी रूप से सक्षम भारत अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर भी पैदा करेगा।
रक्षा निर्यात का विस्तारित दायरा
राजनाथ सिंह ने रक्षा निर्यात को केवल हथियारों और सैन्य उपकरणों तक सीमित न रखने की वकालत की। उनके अनुसार, इसमें रखरखाव, मरम्मत, प्रशिक्षण, रसद और तकनीकी सहयोग को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को पारंपरिक खरीदार-विक्रेता संबंध से आगे बढ़कर संयुक्त विकास, संयुक्त उत्पादन और साझा नवाचार पर आधारित साझेदारियाँ करनी चाहिए, जिससे वैश्विक रक्षा उद्योग में भारत की स्थायी पहचान बन सके।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बढ़ा है और सरकार ने ₹50,000 करोड़ के रक्षा निर्यात लक्ष्य की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। आने वाले महीनों में इन नीतिगत प्राथमिकताओं के क्रियान्वयन की दिशा स्पष्ट होगी।