आयुष्मान भारत योजना से जयकिशन को मिली नई ज़िंदगी: व्हीलचेयर से उठकर चले अपने पैरों पर
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के मेहसाणा जिले के 32 वर्षीय जयकिशन कपाड़िया एक समय ऐसे मोड़ पर खड़े थे जहाँ उन्होंने सामान्य जीवन में लौटने की उम्मीद लगभग छोड़ दी थी — लेकिन केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना ने उनके जीवन में वह बदलाव किया जो उन्हें असंभव लग रहा था। अहमदाबाद के गवर्नमेंट स्पाइन इंस्टीट्यूट में इलाज के बाद, जयकिशन अब अपने पैरों पर चलने में सक्षम हैं — और एक स्वतंत्र जीवन जीने की नई उम्मीद लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
मुश्किलों की शुरुआत: किडनी की बीमारी और माँ की कुर्बानी
जयकिशन के जीवन में कठिनाइयाँ तब शुरू हुईं जब महज 17 वर्ष की उम्र में उन्हें गंभीर किडनी रोग हो गया। उनकी माँ ने अपनी एक किडनी दान देकर उनकी जान बचाई और 2012 में किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक हुआ।
हालाँकि, ट्रांसप्लांट के बाद लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं के सेवन से उनके कूल्हे के दोनों जोड़ धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगे। अंगों में अकड़न और जोड़ों में असहनीय दर्द ने उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को पूरी तरह ठप कर दिया। एक समय ऐसा भी आया जब उनका वजन घटकर मात्र 30-35 किलोग्राम रह गया और वे व्हीलचेयर के बिना एक कदम भी नहीं चल पाते थे।
आयुष्मान भारत बना उम्मीद की किरण
आर्थिक तंगी के कारण इलाज जारी रखना जयकिशन के परिवार के लिए असंभव हो चला था। इसी स्थिति में तीन वर्ष पहले उनकी माँ उन्हें अहमदाबाद के गवर्नमेंट स्पाइन इंस्टीट्यूट ले आईं, जहाँ उनका इलाज आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत निःशुल्क शुरू हुआ।
संस्थान के निदेशक डॉ. पीयूष मित्तल और उनकी विशेषज्ञ टीम ने पहले जयकिशन की शारीरिक और मानसिक स्थिति को स्थिर करने पर ध्यान दिया। डॉ. मित्तल के अनुसार, 'जब जयकिशन पहली बार संस्थान में आए, तो उनकी हड्डियाँ बेहद कमज़ोर हो चुकी थीं, कूल्हे के दोनों जोड़ खराब हो गए थे और वे बिस्तर से उठ भी नहीं पाते थे।'
चार सर्जरी और पुनर्वास की लंबी राह
जयकिशन की कुल चार सर्जरी हुईं, जिनमें दोनों कूल्हों के जोड़ों को एक-एक करके बदला गया। डॉ. मित्तल ने बताया, 'हमने फिजियोथेरेपी और ज़रूरी दवाओं के साथ इलाज शुरू किया। इसके साथ ही उनके मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने पर भी ध्यान दिया गया। हमारा लक्ष्य उन्हें फिर से अपने पैरों पर खड़ा करना और एक स्वतंत्र जीवन जीने के काबिल बनाना था।'
गौरतलब है कि इस तरह के जटिल ऑर्थोपेडिक ऑपरेशन निजी अस्पतालों में लाखों रुपये तक खर्च करा सकते हैं — आयुष्मान भारत योजना की वजह से जयकिशन जैसे आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों के लिए यह उपचार सुलभ हो पाया।
जयकिशन की आवाज़ में उम्मीद
इलाज के बाद जयकिशन ने कहा, 'मेरी माँ मुझे व्हीलचेयर पर अस्पताल लाई थीं। उस समय मैं ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था। यहाँ के डॉक्टरों ने पहले एक पैर की और फिर दूसरे पैर की सर्जरी की। अब मैं काफी बेहतर महसूस कर रहा हूँ। एक समय ऐसा था जब मुझे नहीं लगा था कि मैं कभी दोबारा चल पाऊँगा, लेकिन अब अपनी हालत में सुधार देखकर बहुत अच्छा लग रहा है।'
जयकिशन ने यह भी बताया कि अब वे नौकरी की तलाश में हैं और अपनी माँ का सहारा बनना चाहते हैं — जिन्होंने उनके लिए न केवल अपनी किडनी दी, बल्कि वर्षों तक उनकी देखभाल में खुद को झोंक दिया।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब आयुष्मान भारत योजना की पहुँच और प्रभाव पर देशभर में चर्चा जारी है। जयकिशन का मामला दर्शाता है कि सही वक्त पर मिली सरकारी स्वास्थ्य सुविधा किस तरह किसी व्यक्ति का जीवन पूरी तरह बदल सकती है। संस्थान की टीम का अगला लक्ष्य जयकिशन के पुनर्वास को और मजबूत करना और उन्हें व्यावसायिक पुनःएकीकरण में सहयोग देना है।