राजनारायण बसु की 200वीं जयंती: RSS सरकार्यवाह ने राष्ट्रीय चेतना के पितामह को किया नमन
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह ने 3 नवंबर 2026 को राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत और समाज सुधारक राजनारायण बसु की 200वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। सरकार्यवाह ने कहा कि बसु ने भारतीय शिक्षित समाज में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव और आत्मसम्मान की भावना जागृत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, और उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
कौन थे राजनारायण बसु
राजनारायण बसु का जन्म 7 दिसंबर 1826 को बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बोराल गाँव में हुआ था। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने संस्कृत स्कूल में अध्यापन किया और अपना संपूर्ण जीवन सामाजिक सुधार को समर्पित कर दिया। उन्होंने गरीबों के उत्थान, नशामुक्ति, महिला शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के लिए अथक प्रयास किए। इस दिशा में स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने अपने भाई का विवाह एक विधवा से कराया था।
राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में योगदान
सरकार्यवाह के बयान के अनुसार, ब्रिटिश आक्रमण ने भारतीय शिक्षित समाज को उसकी सभ्यतागत जड़ों से दूर कर दिया था। ऐसे विकट समय में बसु ने शिक्षित वर्ग में आत्मगौरव और आत्मविश्वास की भावना विकसित करने के लिए निरंतर कार्य किया। उनका दृढ़ मत था कि इन गुणों के बिना किसी भी राष्ट्र का उत्थान संभव नहीं है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 'प्रॉस्पेक्टस ऑफ ए सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ नेशनल फीलिंग' नामक प्रारूप तैयार किया था।
उनके प्रयासों से 1867 में नबगोपाल मित्र द्वारा आरंभ हिंदू मेला राष्ट्रीय चेतना के प्रसार का एक सशक्त मंच बना। बसु ने इस मंच के माध्यम से स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की पुरजोर वकालत की और स्वदेशी भावना को समाज में स्थापित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण काम किया। वे मातृभाषा को आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना का मूल आधार मानते थे।
साहित्यिक एवं वैचारिक विरासत
1873 में बसु ने 'द सुपीरियरिटी ऑफ हिंदुइज्म' नामक महत्त्वपूर्ण पुस्तक की रचना की, जिसमें हिंदू संस्कृति की दार्शनिक शक्ति और विशिष्टताओं को विस्तार से प्रस्तुत किया गया। वे हिंदू धर्म को भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता का आधार मानते थे। उन्होंने सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय जागरण के लिए 'महा हिंदू समिति' की परिकल्पना भी की थी, जिसे उन्होंने 1880 के दशक में प्रकाशित अपनी चर्चित पुस्तिका 'वृद्धा हिंदुर आशा' (एक वृद्ध हिंदू की आशा) में विस्तार से रखा। उन्हें भारतीय राष्ट्रीय चेतना के पितामह के रूप में भी जाना जाता है।
महान विभूतियों पर प्रभाव
बयान में विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि राजनारायण बसु महर्षि श्री अरविंद के नाना थे। उनके विचारों और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का युवा अरविंद पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा था। रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता सहित भारतीय राष्ट्रीय पुनर्जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी अनेक महान विभूतियाँ उनका गहन सम्मान करती थीं और उनके जीवन एवं विचारों से प्रेरणा ग्रहण करती थीं।
आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार
सरकार्यवाह ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा कि बसु के विचार और दर्शन आत्मगौरव, सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव और राष्ट्रीय एकता के महत्त्व की निरंतर याद दिलाते हैं। गौरतलब है कि यह श्रद्धांजलि ऐसे समय में दी गई है जब भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों और राष्ट्रीय पहचान को लेकर व्यापक सार्वजनिक विमर्श के दौर से गुज़र रहा है। राष्ट्र उनके अमूल्य योगदान के लिए सदैव कृतज्ञ रहेगा।