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गोवा के बंदोरा महालक्ष्मी मंदिर में विराजमान हैं माँ की दो मूर्तियाँ, 1413 से जुड़ा है इतिहास

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गोवा के बंदोरा महालक्ष्मी मंदिर में विराजमान हैं माँ की दो मूर्तियाँ, 1413 से जुड़ा है इतिहास

सारांश

गोवा के बंदोरा का महालक्ष्मी मंदिर अपने आप में अनूठा है — यहाँ एक ही गर्भगृह में माँ की दो प्रतिमाएँ विराजमान हैं। पुर्तगाली शासन के दौर में दो भक्तों ने जान जोखिम में डालकर कोल्वा से मूर्ति बचाई और बंदोरा लाए, जहाँ पहले से ही एक प्रतिमा थी। 1413 से जुड़े इस मंदिर की कहानी आस्था और साहस का दस्तावेज़ है।

मुख्य बातें

गोवा के बंदोरा (बांदोडे) स्थित महालक्ष्मी देवी मंदिर में माँ की दो मूर्तियाँ एक साथ विराजमान हैं।
मंदिर का इतिहास सन् 1413 से जुड़ा बताया जाता है।
16वीं शताब्दी में पुर्तगाली शासन के दौरान कोल्वा से मूर्ति को बचाकर बंदोरा लाया गया था।
मूर्ति बचाने की जिम्मेदारी साफ्टो और फातो नामक दो भक्तों ने उठाई थी।
तालाउली गाँव में आज भी माँ के चरण-चिह्न पूजे जाते हैं।
मंदिर की दीवारों पर पुराणों की कथाओं के चित्र और गणेश, हनुमान, गरुड़ की नक्काशी अंकित है।

गोवा के पोंडा के निकट बंदोरा (बांदोडे) में स्थित महालक्ष्मी देवी मंदिर भारत के उन विरल धार्मिक स्थलों में से एक है, जहाँ एक ही गर्भगृह में माँ महालक्ष्मी की दो मूर्तियाँ एक साथ विराजमान हैं। मंदिर का इतिहास सन् 1413 से जुड़ा बताया जाता है और इसके पीछे एक ऐसी कथा है जो श्रद्धा, साहस और बलिदान की अनूठी मिसाल पेश करती है।

मंदिर का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

16वीं शताब्दी में गोवा पर पुर्तगाली शासन के दौरान अनेक हिंदू मंदिरों पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुँचाए जाने और मूर्तियाँ नष्ट किए जाने का भय बढ़ता जा रहा था। ऐसे कठिन दौर में दक्षिण गोवा के साल्सेट इलाके के कोल्वा में स्थित महालक्ष्मी मंदिर की देवी-प्रतिमा को किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया।

दो निष्ठावान भक्तों का अदम्य साहस

कथाओं के अनुसार, माँ की मूर्ति को बचाने का दायित्व साफ्टो और फातो नामक दो अनन्य भक्तों ने उठाया। दोनों ने अपनी जान की परवाह किए बिना रात के अंधेरे में देवी की प्रतिमा को एक बड़े बक्से में छिपाया और उसे सुरक्षित स्थान तक ले जाने के लिए निकल पड़े। यह यात्रा उस युग के धार्मिक उत्पीड़न के विरुद्ध आस्था की एक मूक परंतु अदम्य प्रतिक्रिया थी।

दोनों भक्त माँ की प्रतिमा को पोंडा के समीप स्थित तालाउली गाँव तक पहुँचाने में सफल रहे। जनश्रुति है कि जिस स्थान पर देवी की मूर्ति को अस्थायी रूप से विश्राम दिया गया, वहाँ आज भी माँ के चरण-चिह्न मौजूद हैं। गाँव के श्रद्धालु आज भी इन चरण-चिह्नों की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं।

दो मूर्तियों का मिलन — मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता

कोल्वा से सुरक्षित लाई गई माँ महालक्ष्मी की प्रतिमा को अंततः बंदोरा के इसी मंदिर में स्थापित किया गया। विशेष तथ्य यह था कि इस मंदिर में पहले से ही माँ महालक्ष्मी की एक अन्य प्रतिमा विद्यमान थी। इस प्रकार दोनों मूर्तियाँ एक ही गर्भगृह में विराजमान हो गईं, और यही इस मंदिर को भारत के अन्य महालक्ष्मी मंदिरों से अलग और असाधारण बनाता है।

वास्तुकला और आंतरिक सज्जा

मंदिर में प्रवेश करते ही इसकी पारंपरिक गोअन-हिंदू स्थापत्यकला मन को मोह लेती है। मुख्य प्रवेश द्वार आकर्षक तोरण और हाथियों की मूर्तियों से अलंकृत है। भीतर की छत पर पुराने ज़माने के भव्य झूमर लटके हैं। दीवारों पर भगवान गणेश, हनुमान और गरुड़ की सूक्ष्म नक्काशी की गई है।

मंदिर की भीतरी दीवारों पर पुराणों की कथाओं को चित्र-श्रृंखला के माध्यम से उकेरा गया है, जो इसे एक जीवंत धार्मिक संग्रहालय का रूप देता है। यह मंदिर न केवल पूजा-अर्चना का केंद्र है, बल्कि गोवा की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का एक अनमोल प्रतीक भी है।

आस्था और विरासत का संगम

यह मंदिर आज भक्तों के लिए केवल दर्शन-स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और साहस की एक जीवंत कहानी है। जो श्रद्धालु यहाँ आते हैं, वे माँ के दर्शन के साथ-साथ उन दो निष्ठावान भक्तों — साफ्टो और फातो — के समर्पण को भी नमन करते हैं, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर देवी की प्रतिमा को विनाश से बचाया। गौरतलब है कि यह वह काल था जब गोवा में धार्मिक अस्मिता को बनाए रखना स्वयं एक साहसिक कार्य था, और यह मंदिर उसी अदम्य भावना का जीवित प्रमाण है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जब पुर्तगाली धर्मांतरण अभियान के सामने आम श्रद्धालुओं ने अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए जान की बाजी लगाई। यह एक ऐसी कहानी है जो मुख्यधारा की पर्यटन कवरेज में प्रायः हाशिये पर रह जाती है, जबकि यह गोवा की हिंदू विरासत के प्रतिरोध और लचीलेपन का जीवंत दस्तावेज़ है। दो मूर्तियों का यह सह-अस्तित्व किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि उस साहसी मानवीय प्रयास की परिणति है जिसे इतिहास में उचित स्थान मिलना अभी बाकी है।
RashtraPress
2 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोवा के बंदोरा महालक्ष्मी मंदिर में दो मूर्तियाँ क्यों हैं?
16वीं शताब्दी में पुर्तगाली शासन के दौरान कोल्वा के महालक्ष्मी मंदिर से देवी की मूर्ति को खतरे के चलते बंदोरा लाया गया, जहाँ पहले से ही एक मूर्ति स्थापित थी। इस तरह एक ही गर्भगृह में दो मूर्तियाँ विराजमान हो गईं।
बंदोरा महालक्ष्मी मंदिर का इतिहास कितना पुराना है?
इस मंदिर का इतिहास सन् 1413 से जुड़ा बताया जाता है। सदियों से यह मंदिर गोवा के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
साफ्टो और फातो कौन थे?
साफ्टो और फातो कोल्वा के महालक्ष्मी मंदिर के दो निष्ठावान भक्त थे। कथाओं के अनुसार, इन्होंने पुर्तगाली दमन के दौर में रात के अंधेरे में देवी की मूर्ति को बक्से में छिपाकर सुरक्षित बंदोरा पहुँचाया था।
तालाउली गाँव का इस मंदिर से क्या संबंध है?
जनश्रुति के अनुसार, कोल्वा से लाई गई देवी की मूर्ति को यात्रा के दौरान तालाउली गाँव में अस्थायी रूप से रखा गया था। उस स्थान पर माँ के चरण-चिह्न आज भी मौजूद बताए जाते हैं और ग्रामवासी उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं।
बंदोरा महालक्ष्मी मंदिर की वास्तुकला क्या खास है?
मंदिर का प्रवेश द्वार तोरण और हाथियों की मूर्तियों से सजा है, छत पर पुराने झूमर लगे हैं और दीवारों पर गणेश, हनुमान व गरुड़ की नक्काशी के साथ-साथ पुराणों की कथाओं के चित्र भी उकेरे गए हैं। यह पारंपरिक गोअन-हिंदू स्थापत्यकला का सुंदर उदाहरण है।
राष्ट्र प्रेस
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