H-1B और L-1 वीज़ा एक्सटेंशन पर अमेरिका के नए प्रस्तावित नियम, 79% भारतीय पेशेवरों पर सबसे बड़ा खतरा
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने एक प्रस्तावित इमिग्रेशन नीति पेश की है जो H-1B और L-1 वीज़ा धारकों — खासतौर पर भारतीय पेशेवरों — के लिए एक्सटेंशन प्रक्रिया को काफी कठिन बना सकती है। इस प्रस्ताव के लागू होने पर अमेरिकी इमिग्रेशन अधिकारी वीज़ा एक्सटेंशन आवेदनों पर फैसला करते समय पिछली मंजूरी को आधार मानने के लिए बाध्य नहीं होंगे। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार, लगातार रोज़गार की श्रेणी में H-1B एक्सटेंशन पाने वालों में करीब 79 फीसदी भारतीय मूल के पेशेवर हैं।
प्रस्ताव में क्या है
अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने 14 अक्टूबर 2026 को फेडरल रजिस्टर में 'रिमूविंग डिफरेंस टू प्रायर USCIS डिटरमिनेशंस ऑफ एलिजिबिलिटी' शीर्षक से यह प्रस्ताव प्रकाशित किया। इस पर सार्वजनिक टिप्पणियाँ देने की अंतिम तारीख 13 नवंबर 2026 है। इच्छुक पक्ष केवल सरकारी पोर्टल Regulations.gov के ज़रिये अपनी राय और आपत्तियाँ दर्ज करा सकते हैं।
प्रस्ताव के तहत मौजूदा आव्रजन नियम 8 CFR 214.1(c)(5) को हटाने की बात कही गई है। यह नियम अभी तक यह सुनिश्चित करता था कि यदि किसी कर्मचारी और नियोक्ता के संबंध में पहले वीज़ा मंजूर हो चुका है और परिस्थितियों में कोई बड़ा बदलाव, महत्वपूर्ण गलती या नई प्रतिकूल जानकारी सामने नहीं आई है, तो अधिकारी को सामान्यतः पुराने फैसले का सम्मान करना होगा।
कितने आवेदन और किन वीज़ा श्रेणियों पर होगा असर
नया प्रस्ताव लागू होने पर H-1B और L-1 के अलावा O-1, TN, E और P श्रेणी के वीज़ा आवेदनों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। DHS के अनुसार, फॉर्म I-129 आवेदनों में H-1B की हिस्सेदारी 75 फीसदी से अधिक है और प्रस्तावित बदलाव से हर साल करीब 2.08 लाख आवेदन प्रभावित हो सकते हैं।
USCIS के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024 में H-1B वीज़ा के करीब 3.99 लाख आवेदनों को मंजूरी मिली, जिनमें 71 फीसदी लाभार्थी भारत में जन्मे थे। लगातार रोज़गार की श्रेणी में मंजूर करीब 2.58 लाख आवेदनों में से लगभग 2.03 लाख यानी 79 फीसदी भारतीय मूल के पेशेवरों के थे।
RFE और अतिरिक्त लागत का बोझ
पिछली मंजूरी को प्राथमिकता देने की व्यवस्था खत्म होने से अतिरिक्त दस्तावेज़ और स्पष्टीकरण माँगने वाले नोटिस — यानी रिक्वेस्ट फॉर एविडेंस (RFE) — की दर में लगभग 3 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे हर साल करीब 6,000 अतिरिक्त नोटिस जारी होने का अनुमान है। विभाग के अनुसार, RFE वाले आवेदनों को निपटाने में औसतन 64 दिन अधिक लगते हैं। DHS ने इस प्रक्रिया से आवेदकों और नियोक्ताओं पर पड़ने वाली अतिरिक्त लागत करीब 1.34 लाख डॉलर सालाना आँकी है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब ट्रंप प्रशासन पहले से H-1B कोटा और आव्रजन प्रक्रियाओं पर कड़ाई बरत रहा है। अनेक भारतीय पेशेवरों और उनके नियोक्ता कंपनियों ने इस प्रस्ताव पर गहरी चिंता जताई है।
सरकार का तर्क और ऐतिहासिक संदर्भ
DHS का कहना है कि मौजूदा नियम आव्रजन अधिकारी पर यह साबित करने की जिम्मेदारी डालता है कि पहले लिए गए फैसले से अलग निर्णय क्यों लिया जा रहा है — जबकि प्रस्तावित बदलाव से अधिकारी हर आवेदन की परिस्थितियों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकेंगे। विभाग ने कार्यस्थल निरीक्षणों के आंकड़ों का भी हवाला दिया: वित्त वर्ष 2022 से 2025 के दौरान H-1B एक्सटेंशन से जुड़े कार्यस्थलों में नियमों के उल्लंघन और धोखाधड़ी के संयुक्त मामले करीब 22 फीसदी पाए गए, जबकि वित्त वर्ष 2018 से 2020 के दौरान यह आंकड़ा 17 फीसदी था।
हालाँकि, प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि अधिकारी पुराने वीज़ा अनुमोदन को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं करेंगे — 'अधिकारी पहले के फैसलों पर विचार कर सकेंगे, लेकिन उनके लिए पुराने अनुमोदन को आधार बनाकर आगे बढ़ना अनिवार्य नहीं होगा' — ऐसा DHS के प्रस्ताव में कहा गया है।
यह नीति पहली बार 2004 में लागू हुई थी। 2017 में ट्रंप के पहले कार्यकाल में इसे समाप्त किया गया, 2021 में बहाल किया गया और 2024 में इसे औपचारिक रूप से आव्रजन नियमों में शामिल किया गया। अब दूसरे ट्रंप कार्यकाल में फिर इसे हटाने का प्रस्ताव है।
आगे क्या होगा
DHS ने स्वीकार किया है कि इस बदलाव से उन कर्मचारियों और कंपनियों की योजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं जिन्होंने पिछली वीज़ा मंजूरी के आधार पर करियर और निजी जीवन से जुड़े फैसले किए हैं। सार्वजनिक टिप्पणी विंडो 13 नवंबर 2026 को बंद होने के बाद विभाग अंतिम नियम तय करेगा। आव्रजन विशेषज्ञों और प्रभावित पक्षों की नज़र अब इस टिप्पणी प्रक्रिया और उसके बाद के घटनाक्रम पर टिकी है।