गोपालदास 'नीरज': गंगा किनारे सिक्के बीनने वाले बालक से पद्मभूषण गीतकार तक का सफर
सारांश
मुख्य बातें
गोपालदास सक्सेना 'नीरज' — हिंदी साहित्य और सिनेमा के वह अमर गीतकार, जिन्होंने 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गाँव में जन्म लिया और जीवन की हर तंगहाली को काव्य की अमृतधारा में बदल दिया। मात्र 6 वर्ष की आयु में पिता के निधन के बाद परिवार का बोझ उठाने वाले इस बालक ने गंगा नदी में डुबकी लगाकर श्रद्धालुओं के फेंके सिक्के बटोरे, गलियों में बीड़ी-सिगरेट बेची और दीवारों पर फिल्मी पोस्टर चिपकाए — और एक दिन उन्हीं पोस्टरों पर देश के सबसे बड़े गीतकार के रूप में उनका नाम सुनहरे अक्षरों में चमका।
संघर्ष से साहित्य तक
आर्थिक विपन्नता के बावजूद नीरज ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। 1942 में प्रथम श्रेणी से हाईस्कूल उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने कचहरी में टाइपिस्ट और क्लर्क का काम करते हुए शिक्षा जारी रखी। 1953 में उन्होंने हिंदी साहित्य में एमए की उपाधि प्राप्त की। इसी दौर में उनका पहला काव्य-संग्रह 'संघर्ष' प्रकाशित हुआ, जिसने साहित्य जगत में उनकी उपस्थिति को अंकित किया।
वह प्रेम और वह गीत जिसने इतिहास रचा
23 वर्ष की आयु में एक संपन्न घराने की युवती से उनका प्रेम सामाजिक बंधनों की भेंट चढ़ गया। एक सुबह जब उन्होंने मित्र की छत से अपनी प्रेमिका की विदा होती डोली देखी, तो उस असहनीय दर्द ने जन्म दिया हिंदी का एक कालजयी गीत — 'कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।' यह गीत रेडियो पर प्रसारित होते ही नीरज को रातोंरात पूरे देश का प्रिय कवि बना गया। व्यक्तिगत पीड़ा को सार्वभौमिक दर्शन में ढालने की यह क्षमता ही नीरज को अन्य गीतकारों से अलग करती थी।
अध्यापन और मुंबई का सफर
नीरज ने मेरठ कॉलेज में अध्यापन किया, परंतु प्रशासन द्वारा लगाए गए झूठे आरोपों से आहत होकर इस्तीफा दे दिया। 1956 में वे अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में प्रोफेसर बने और अलीगढ़ उनका स्थायी आश्रय बन गया। कवि सम्मेलनों में उनकी बढ़ती ख्याति ने निर्देशक आर. चंद्रा का ध्यान खींचा, जो उन्हें मुंबई ले आए। फिल्मी दुनिया में उनके प्रवेश ने सिनेमाई गीतों को एक नई साहित्यिक गरिमा दी।
यादगार फिल्मी गीत और पुरस्कार
नीरज के रचे कुछ अमर गीत आज भी श्रोताओं के दिलों में जीवित हैं। फिल्म 'नई उमर की नई फसल' (1965) में रोशन के संगीत और मोहम्मद रफी की आवाज़ में 'कारवाँ गुज़र गया'; 'कन्यादान' (1968) में शंकर-जयकिशन और रफी के साथ 'लिखे जो खत तुझे' — जिसे नीरज ने मात्र 6 मिनट में लिखा था; 'मेरा नाम जोकर' (1970) में मन्ना डे की आवाज़ में 'ए भाई ज़रा देख के चलो' — जिसने उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार दिलाया; तथा 'प्रेम पुजारी' (1970) में एस.डी. बर्मन के संगीत और किशोर कुमार की आवाज़ में 'फूलों के रंग से'। देव आनंद नीरज के इतने बड़े प्रशंसक थे कि उन्होंने उनका परिचय महान संगीतकार एस.डी. बर्मन से करवाया।
वापसी और विरासत
1971 में जयकिशन के निधन, रोशन लाल नागरथ के जाने और 1975 में एस.डी. बर्मन के देहांत ने नीरज को भीतर से तोड़ दिया। मुंबई की बदलती व्यावसायिक फिज़ा उन्हें रास नहीं आई और वे अपनी प्रसिद्ध पंक्तियाँ — 'इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में...' — गुनगुनाते हुए हमेशा के लिए अलीगढ़ लौट आए। भारत सरकार ने उनके अतुलनीय योगदान को मान्यता देते हुए 1991 में पद्म श्री और 2007 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने 1994 में उन्हें यश भारती पुरस्कार प्रदान किया। 19 जुलाई 2018 को नई दिल्ली के एम्स में इस गीत-ऋषि ने अंतिम साँस ली। उन्होंने अपना पार्थिव शरीर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को चिकित्सा शोध हेतु दान कर दिया था — यह उनके जीवन का अंतिम और शायद सबसे बड़ा उपहार था। उनके गीत आज भी हर उस इंसान की ज़बान पर हैं जिसने कभी दर्द को शब्दों में ढूँढा है।