17 अगस्त 2026
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गुजरात सरकार की पहल: सरकारी स्कूलों की 10 लाख से अधिक छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, ₹46.68 करोड़ का बजट

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गुजरात सरकार की पहल: सरकारी स्कूलों की 10 लाख से अधिक छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, ₹46.68 करोड़ का बजट

सारांश

गुजरात सरकार की यह पहल केवल स्वास्थ्य योजना नहीं — यह शिक्षा नीति भी है। ₹46.68 करोड़ के बजट से 10 लाख से अधिक छात्राओं को मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल नैपकिन मिलेंगे, नोडल शिक्षिकाएँ जागरूकता फैलाएंगी — और लक्ष्य है कि माहवारी अब स्कूल छोड़ने की वजह न बने।

मुख्य बातें

गुजरात सरकार ने सरकारी स्कूलों में कक्षा 6 से 12 की 10 लाख से अधिक छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन देने की योजना शुरू की।
शिक्षा विभाग ने इस कार्यक्रम के लिए ₹46.68 करोड़ के बजट को मंजूरी दी; प्रत्येक छात्रा को सालाना ₹360 की दर से उत्पाद मिलेंगे।
प्रत्येक स्कूल में एक महिला नोडल शिक्षिका वितरण की निगरानी और माहवारी स्वच्छता पर जागरूकता का कार्य करेंगी।
पर्यावरण-अनुकूल ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल नैपकिन का उपयोग; 'सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016' के तहत निपटान अनिवार्य।
यह पहल 2016 के 'तरुणी सुविधा कार्यक्रम' से आगे का कदम है, जिसमें नैपकिन ₹1 में मिलते थे — अब पूरी तरह निःशुल्क।
योजना को 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और केंद्र की 'मासिक धर्म स्वच्छता योजना' से जोड़ा गया है।

गुजरात सरकार ने राज्य के सरकारी स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक पढ़ने वाली 10 लाख से अधिक छात्राओं को हर महीने मुफ्त सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की योजना शुरू की है। 17 अगस्त 2026 को गांधीनगर से घोषित इस पहल का उद्देश्य मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता सुनिश्चित करना और लड़कियों की स्कूल में नियमित उपस्थिति को बढ़ावा देना है। शिक्षा विभाग ने इस कार्यक्रम के लिए ₹46.68 करोड़ के बजट को मंजूरी दी है।

योजना का ढाँचा और बजट

इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रत्येक पात्र छात्रा को सालाना ₹360 की दर से स्कूलों के माध्यम से ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन निःशुल्क वितरित किए जाएंगे। शिक्षा विभाग ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वितरण प्रक्रिया पूरी तरह आरामदायक और सम्मानजनक तरीके से संपन्न की जाए, ताकि छात्राओं को किसी प्रकार की असहजता न हो।

यह योजना विशेष रूप से ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों की छात्राओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, जहाँ सैनिटरी उत्पादों तक पहुँच अब भी सीमित है।

नोडल शिक्षिका की भूमिका

प्रत्येक विद्यालय में एक महिला शिक्षिका को 'नोडल टीचर' के रूप में नियुक्त किया जाएगा। यह शिक्षिका न केवल नैपकिन वितरण की निगरानी करेंगी, बल्कि छात्राओं को माहवारी स्वच्छता और व्यक्तिगत स्वास्थ्य के बारे में जागरूक भी करेंगी। नोडल शिक्षिका माहवारी से जुड़ी भ्रांतियों और सामाजिक वर्जनाओं को दूर करने में भी सहायक भूमिका निभाएंगी।

पर्यावरण-अनुकूल निपटान व्यवस्था

सरकार ने इस्तेमाल किए गए सैनिटरी नैपकिन के सुरक्षित निपटान के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं। स्कूलों को 'सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016' का पालन करना अनिवार्य होगा, जिसके तहत उपयोग किए गए पैड को कागज में लपेटकर गीले और सूखे कचरे से अलग रखना और स्थानीय कचरा संग्रहण व्यवस्था को सौंपना शामिल है।

जिन स्कूलों में सैनिटरी पैड डिस्पोजल मशीन या इंसीनरेटर पहले से उपलब्ध हैं, उन्हें इन उपकरणों की नियमित सर्विसिंग और सुचारु संचालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल नैपकिन का चुनाव भी पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम रखने की दिशा में एक सोचा-समझा कदम है।

व्यापक नीतिगत संदर्भ

शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने कहा, 'सैनिटरी उत्पादों तक पहुँच उन लड़कियों की मदद कर सकती है जो माहवारी के दौरान कक्षा में नहीं आ पातीं, ताकि वे नियमित रूप से स्कूल आ सकें।' विभाग ने इस पहल को 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान और महिला सशक्तिकरण के व्यापक लक्ष्यों से जोड़ा है।

गौरतलब है कि यह योजना केंद्र सरकार की 'मासिक धर्म स्वच्छता योजना' के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य किशोरियों — विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की — तक सैनिटरी उत्पादों की पहुँच बढ़ाना और जागरूकता फैलाना है।

पिछली योजनाओं से आगे का कदम

यह ऐसे समय में आया है जब गुजरात सरकार इस क्षेत्र में पहले से सक्रिय रही है। 2016 में शुरू किए गए 'तरुणी सुविधा कार्यक्रम' के तहत छह नैपकिन का पैक मात्र ₹1 की सांकेतिक कीमत पर उपलब्ध कराया जाता था। नई योजना उस पहल से एक कदम आगे जाकर उत्पाद को पूरी तरह निःशुल्क और स्कूल-आधारित वितरण प्रणाली के माध्यम से सुलभ बनाती है। आगामी शैक्षणिक सत्र से इस कार्यक्रम के पूर्ण क्रियान्वयन की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन की होगी — खासकर उन ग्रामीण स्कूलों में जहाँ इंसीनरेटर और डिस्पोजल मशीनें अभी भी कागज़ों पर ज़्यादा और ज़मीन पर कम हैं। नोडल शिक्षिका की अवधारणा सराहनीय है, परंतु प्रश्न यह है कि क्या उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण और समय दिया जाएगा, या यह ज़िम्मेदारी पहले से बोझिल शिक्षकों पर एक और अतिरिक्त काम बनकर रह जाएगी। 2016 का 'तरुणी सुविधा कार्यक्रम' भी महत्वाकांक्षी था, लेकिन उसकी पहुँच और प्रभाव के आँकड़े कभी पारदर्शी रूप से सामने नहीं आए। सरकार को इस बार वितरण और उपस्थिति के बीच सीधा सहसंबंध मापने का तंत्र सार्वजनिक करना चाहिए।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुजरात सरकार की मुफ्त सैनिटरी नैपकिन योजना क्या है?
यह गुजरात शिक्षा विभाग की एक पहल है जिसके तहत राज्य के सरकारी स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक पढ़ने वाली 10 लाख से अधिक छात्राओं को हर महीने मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन दिए जाएंगे। इस कार्यक्रम के लिए ₹46.68 करोड़ का बजट मंजूर किया गया है।
इस योजना से कौन-सी छात्राएँ लाभान्वित होंगी?
गुजरात के सरकारी स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक पढ़ने वाली सभी पात्र छात्राएँ इस योजना की लाभार्थी होंगी। विशेष ध्यान ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों की छात्राओं पर है, जहाँ सैनिटरी उत्पादों तक पहुँच अब भी सीमित है।
नोडल शिक्षिका की इस योजना में क्या भूमिका होगी?
प्रत्येक स्कूल में एक महिला शिक्षिका को 'नोडल टीचर' नियुक्त किया जाएगा, जो नैपकिन वितरण की निगरानी करेंगी और छात्राओं को माहवारी स्वच्छता व व्यक्तिगत स्वास्थ्य के बारे में जागरूक करेंगी। वे माहवारी से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों को दूर करने में भी सहायता करेंगी।
इस्तेमाल किए गए सैनिटरी नैपकिन का निपटान कैसे होगा?
स्कूलों को 'सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016' का पालन करना होगा — उपयोग किए गए पैड को कागज में लपेटकर गीले-सूखे कचरे से अलग रखना और स्थानीय कचरा संग्रहण व्यवस्था को सौंपना अनिवार्य होगा। जहाँ इंसीनरेटर या डिस्पोजल मशीनें उपलब्ध हैं, वहाँ उनकी नियमित सर्विसिंग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह योजना गुजरात की पुरानी पहलों से कैसे अलग है?
2016 में शुरू हुए 'तरुणी सुविधा कार्यक्रम' में छह नैपकिन का पैक मात्र ₹1 में दिया जाता था, जबकि नई योजना के तहत उत्पाद पूरी तरह निःशुल्क हैं और स्कूल-आधारित वितरण प्रणाली के माध्यम से सीधे छात्राओं तक पहुँचाए जाएंगे। साथ ही, इस बार जागरूकता और निपटान प्रबंधन को भी योजना का अभिन्न हिस्सा बनाया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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