गुजरात का दूध उत्पादन दो दशकों में 1.25 करोड़ टन बढ़ा, देश का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बना
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात ने पिछले दो दशकों में वार्षिक दूध उत्पादन में 1.25 करोड़ टन की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, जिससे यह राज्य देश का चौथा सबसे बड़ा दूध उत्पादक बन गया है। अधिकारियों ने इस उपलब्धि को 'श्वेत क्रांति 2.0' की संज्ञा दी है। ये आँकड़े 1 जून को मनाए जाने वाले विश्व दुग्ध दिवस से पहले जारी किए गए।
गुजरात का दूध उत्पादन: मुख्य आँकड़े
राज्य का वार्षिक दूध उत्पादन अब 1.9 करोड़ टन से अधिक हो गया है, जो राष्ट्रीय कुल उत्पादन का 7.78 प्रतिशत है। पिछले 20 वर्षों में गुजरात की औसत वार्षिक वृद्धि दर 9.3 प्रतिशत रही है — जो राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता के मामले में भी राज्य आगे है: पिछले एक दशक में यह 48 प्रतिशत बढ़कर 730 ग्राम प्रतिदिन हो गई है, जबकि राष्ट्रीय औसत 485 ग्राम प्रतिदिन है।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: भारत की डेयरी ताकत
भारत 1998 से लगातार विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना हुआ है। देश में अब प्रतिवर्ष लगभग 24.7 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत है। आँकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में राष्ट्रीय दूध उत्पादन में 69 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह 5.5 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रहा है। डेयरी क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 5 प्रतिशत का योगदान देता है। यह ऐसे समय में आया है जब खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को लेकर नीतिगत बहस तेज़ है।
पशु चिकित्सा अवसंरचना और सरकारी निवेश
राज्य सरकार के अनुसार, पशु स्वास्थ्य देखभाल, प्रजनन कार्यक्रमों और डेयरी अवसंरचना में निरंतर निवेश इस विकास की नींव रहा है। गुजरात में लगभग 2.75 करोड़ पशुधन की सेवा के लिए 1,137 पशु चिकित्सालय, 564 प्राथमिक पशु उपचार केंद्र और 587 मोबाइल पशु चिकित्सा क्लीनिक कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त 34 बहुउद्देशीय पशु चिकित्सा अस्पताल और 21 पशु रोग जाँच इकाइयाँ भी स्थापित हैं। राज्य भर में 4,710 पंजीकृत पशुचिकित्सक स्वास्थ्य देखभाल और रोग प्रबंधन सेवाएँ दे रहे हैं।
प्रजनन तकनीक: नस्ल सुधार की नई राह
सरकार ने नस्ल और उत्पादकता सुधार के लिए उन्नत प्रजनन तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा दिया है। पशुपालकों को लिंग-निर्धारित वीर्य की खुराकें अत्यधिक रियायती दरों पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। अधिकारियों के अनुसार, इस तकनीक की सफलता दर 90 प्रतिशत से अधिक है, जिससे अधिकांश सफल प्रसवों में मादा बछड़े पैदा होते हैं — जो दीर्घकालिक उत्पादन के लिए निर्णायक है। इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक अपनाने वाले किसानों को भी सब्सिडी प्रदान की जा रही है।
अमूल AI और डिजिटल बदलाव
गौरतलब है कि इसी वर्ष फरवरी में अमूल ने अपना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म 'अमूल AI' लॉन्च किया, जिसमें 'सरलाबेन' नामक AI-आधारित डिजिटल असिस्टेंट को पेश किया गया। यह प्लेटफॉर्म 36 लाख से अधिक किसान दुग्ध उत्पादकों को चौबीसों घंटे पशु स्वास्थ्य, संतुलित पोषण, नस्ल सुधार और सरकारी कल्याण योजनाओं पर मार्गदर्शन देता है। यह कदम डेयरी क्षेत्र में तकनीकी परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में इस प्लेटफॉर्म के विस्तार से ग्रामीण डेयरी किसानों की उत्पादकता में और सुधार की उम्मीद है।