9 अक्टूबर 2026
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पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज हेमंत गुप्ता बोले: चुनाव जीतकर सरकार हराएं, संस्थाओं पर अविश्वास न फैलाएं

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पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज हेमंत गुप्ता बोले: चुनाव जीतकर सरकार हराएं, संस्थाओं पर अविश्वास न फैलाएं

सारांश

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज हेमंत गुप्ता ने चुनाव आयोग विवाद के बीच सीधा संदेश दिया — सड़कों पर शोर मचाने से नहीं, मतपेटी से सरकारें बदलती हैं। संस्थाओं पर संगठित अविश्वास को उन्होंने 'राजनीतिक मकसद से प्रेरित' बताया।

मुख्य बातें

पूर्व न्यायाधीश हेमंत गुप्ता ने 9 अक्टूबर 2026 को कहा — सरकार से नाखुश हों तो चुनाव के जरिए हराएं, व्यवस्था पर उंगली न उठाएं।
उन्होंने राहुल गांधी के उस दावे पर सवाल उठाया कि कांग्रेस ने BJP को हराया, जबकि पार्टी ने केवल 99 सीटें जीती थीं।
चुनाव आयुक्त का कार्यकाल महाभियोग के बिना समाप्त नहीं किया जा सकता — गुप्ता ने न्यायाधीशों से तुलना की।
आयुक्तों के प्रति अपमानजनक भाषा — जैसे 'ज्ञानू' संबोधन — को गुप्ता ने अस्वीकार्य बताया।
42 पूर्व न्यायाधीशों के चुनाव आयोग समर्थन पत्र के संदर्भ में उन्होंने कहा — संस्थाओं पर अविश्वास राजनीतिक मकसद से प्रेरित है।
चुनाव आयोग में कथित आंतरिक मतभेदों पर उन्होंने कहा — सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हेमंत गुप्ता ने 9 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में देशवासियों से संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि सरकार से असंतुष्ट लोगों को चुनाव हारने के बाद व्यवस्था पर उंगली उठाने के बजाय लोकतांत्रिक माध्यमों से अपनी बात मनवानी चाहिए। उनके इस बयान को उन हालिया घटनाओं की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है, जिनमें चुनाव आयोग (ECI) की स्वायत्तता और आयुक्तों के व्यवहार को लेकर विवाद उठे हैं।

मुख्य वक्तव्य

पूर्व न्यायाधीश हेमंत गुप्ता ने कहा, "आपको संस्थाओं पर भरोसा करना चाहिए। सरकारों से असहमति हो सकती है — चुनाव आएंगे और तब आप उन्हें हरा सकते हैं। यह आसान है। लेकिन जब आप जीत नहीं पाते, तो यह दावा करना कि सड़कों पर आप जो कहते हैं वही सही है, गलत है। सिस्टम ऐसे काम नहीं करता।"

उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी दलों ने इसी चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से कई राज्यों में सरकारें बनाई हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्था काम करती है।

राहुल गांधी के दावे पर सवाल

2024 के लोकसभा चुनावों का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह दावा किया था कि कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) को हरा दिया है। पूर्व जज ने इस बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस ने 99 सीटें जीती थीं और बहुमत हासिल करने में नाकाम रही। उन्होंने कहा, "वह बयान तब भी गुमराह करने वाला था, और आज जो बातें कही जा रही हैं, वे और भी ज्यादा गुमराह करने वाली हैं।"

चुनाव आयुक्त के कार्यकाल की सुरक्षा

गुप्ता ने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव आयुक्त का कार्यकाल कानूनी रूप से उसी तरह संरक्षित है, जिस तरह किसी न्यायाधीश का। उन्होंने स्पष्ट किया, "चुनाव आयुक्त को केवल महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है, मनमाने ढंग से नहीं। कोई भी इस्तीफे की मांग कर सकता है, लेकिन कुछ लोग बहुत अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं।"

उन्होंने आयुक्तों को सम्मानजनक तरीके से संबोधित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा, "आयुक्त काफी उम्रदराज होते हैं — उनकी उम्र पिता या दादा जैसी होती है। किसी को अपमानजनक ढंग से 'ज्ञानू' कहना स्वीकार्य नहीं है। भले ही कोई 'श्री' या 'जी' जैसे सम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल न करे, फिर भी उन्हें कम से कम उनके नाम से सही ढंग से संबोधित करना चाहिए।"

42 पूर्व जजों के पत्र का संदर्भ

चुनाव आयोग के समर्थन में 42 पूर्व न्यायाधीशों द्वारा लिखे गए पत्र का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने कहा कि संस्थाओं में अविश्वास फैलाना देश के लोकतांत्रिक तंत्र को कमजोर कर सकता है। उन्होंने कहा, "अगर हम संस्थाओं पर भरोसा नहीं करेंगे, तो देश का भरोसा टूट जाएगा। हम हर शिकायत लेकर कोर्ट जाते हैं और सांसद संसद में मुद्दे उठाते हैं। अगर आप हर संस्था पर शक करने लगेंगे, तो सिस्टम का क्या होगा? यह राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए जानबूझकर पैदा किया गया अविश्वास है।"

आंतरिक मतभेद और सर्वसम्मति

एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित उस रिपोर्ट पर, जिसमें चुनाव आयोग के भीतर कथित आंतरिक मतभेदों और 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) प्रस्तावों को अनुमति न मिलने का उल्लेख था, गुप्ता ने कहा कि यह स्पष्ट किया जा चुका है कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। उन्होंने तर्क दिया, "चर्चा के दौरान स्वाभाविक रूप से अलग अलग राय सामने आती हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोर्ट में होती है, जब तक कि किसी एक राय पर आम सहमति नहीं बन जाती।" यह ऐसे समय में आया है जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर हाल के दिनों में तीखी बहस छिड़ी हुई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि चुनाव आयोग को घेरने की मौजूदा राजनीतिक मुहिम के प्रत्युत्तर में आया एक सुविचारित हस्तक्षेप है। गौरतलब है कि 42 पूर्व जजों का पत्र और गुप्ता का यह वक्तव्य — दोनों एक ही समय में सामने आए हैं, जो दर्शाता है कि न्यायिक बिरादरी का एक वर्ग संस्थागत अविश्वास की उस लहर को राजनीति प्रेरित मानता है। हालांकि, आलोचक यह भी पूछ सकते हैं कि जब संस्थाएं स्वयं पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी पर खरी उतरें, तभी भरोसे की यह अपील नैतिक वज़न रखती है। लोकतंत्र में 'संस्थागत विश्वास' और 'जनतांत्रिक जवाबदेही' — दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
RashtraPress
9 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पूर्व जज हेमंत गुप्ता ने संस्थाओं पर क्या कहा?
हेमंत गुप्ता ने कहा कि नागरिकों को संस्थाओं पर भरोसा करना चाहिए और सरकार से असहमति होने पर चुनाव के जरिए उसे हराना चाहिए, न कि व्यवस्था पर सवाल उठाने चाहिए। उनके अनुसार संस्थाओं पर अविश्वास फैलाना राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित है।
चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया क्या है?
हेमंत गुप्ता के अनुसार चुनाव आयुक्त का कार्यकाल कानून द्वारा उसी तरह सुरक्षित है जैसे किसी न्यायाधीश का, और उन्हें केवल महाभियोग प्रक्रिया के जरिए ही हटाया जा सकता है। मनमाने ढंग से उनके इस्तीफे की मांग करना या अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना अनुचित है।
गुप्ता ने राहुल गांधी के किस दावे पर सवाल उठाया?
गुप्ता ने 2024 के लोकसभा चुनावों के संदर्भ में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस दावे पर सवाल उठाया कि कांग्रेस ने BJP को हरा दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने केवल 99 सीटें जीती थीं और बहुमत हासिल करने में नाकाम रही, इसलिए यह दावा भ्रामक था।
चुनाव आयोग में कथित आंतरिक मतभेदों पर गुप्ता ने क्या कहा?
एक अखबार में छपी रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर आंतरिक मतभेदों और 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) प्रस्तावों को मंजूरी न मिलने की बात कही गई थी। गुप्ता ने कहा कि इस पर स्पष्टीकरण आ चुका है कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे, और विचार विमर्श के दौरान अलग अलग राय स्वाभाविक होती है।
42 पूर्व जजों के पत्र का क्या संदर्भ है?
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर हाल में विवाद उठने के बाद 42 पूर्व न्यायाधीशों ने चुनाव आयोग के समर्थन में एक पत्र लिखा। गुप्ता ने इस संदर्भ में कहा कि संस्थाओं पर संगठित अविश्वास देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचाता है और यह राजनीतिक उद्देश्यों से जानबूझकर पैदा किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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