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संथाल हूल क्रांति 1855: जल, जंगल, जमीन के लिए 60 हजार आदिवासियों की पहली जनगर्जना

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संथाल हूल क्रांति 1855: जल, जंगल, जमीन के लिए 60 हजार आदिवासियों की पहली जनगर्जना

सारांश

1857 से दो साल पहले, 30 जून 1855 को भोगनाडीह की धरती से उठी 'हूल' की गर्जना ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था। 60 हजार संथालों का यह विद्रोह जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संघर्ष था — जिसकी कीमत 20 हजार शहादतों से चुकाई गई, पर जिसने संथाल परगना को जन्म दिया।

मुख्य बातें

30 जून 1855 को साहिबगंज के भोगनाडीह गाँव से संथाल हूल क्रांति का आगाज हुआ — यह 1857 से दो वर्ष पूर्व की सबसे बड़ी जनक्रांति थी।
लगभग 60 हजार संथाल आदिवासियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी , जमींदारों और महाजनों के विरुद्ध संघर्ष किया।
नेतृत्व चार भाइयों — सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव — तथा उनकी बहनों फूलो और झानो ने किया।
दमन में लगभग 20 हजार संथाल शहीद हुए; सिद्धू और कान्हू को फाँसी दी गई।
आंदोलन के परिणामस्वरूप 1856 में संथाल परगना का गठन हुआ और आदिवासी भूमि-सुरक्षा कानून बना।
प्रतिवर्ष 30 जून को झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में हूल दिवस मनाया जाता है।

30 जून 1855 को साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गाँव में इतिहास का एक ऐसा पृष्ठ लिखा गया जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा की कथा में वह स्थान कभी नहीं मिला जिसका वह हकदार था। लगभग 60 हजार संथाल आदिवासियों ने एकजुट होकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, जमींदारों, महाजनों और साहूकारों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँका — और इस विद्रोह को नाम दिया 'हूल', जिसका संथाली भाषा में अर्थ है क्रांति। यह गर्जना इतनी बुलंद थी कि उसकी अनुगूँज लंदन की ब्रिटिश संसद तक पहुँची।

1857 से दो वर्ष पहले की वह अनकही क्रांति

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा प्रायः 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से आरंभ होती है, किंतु उससे पूरे दो वर्ष पहले संथाल समुदाय ने औपनिवेशिक शासन की जड़ें हिला दी थीं। यह केवल सत्ता-परिवर्तन की लड़ाई नहीं थी — यह सम्मान, अस्तित्व और सांस्कृतिक पहचान बचाने का संघर्ष था। गौरतलब है कि भोगनाडीह से उठी यह आवाज़ भारत के आदिवासी प्रतिरोध की सबसे सुसंगठित और व्यापक अभिव्यक्ति थी।

शोषण की वह पृष्ठभूमि जिसने विद्रोह को जन्म दिया

ब्रिटिश शासन के दौरान संथाल आदिवासियों पर भारी करों का बोझ लाद दिया गया था। महाजनों और जमींदारों ने कर्ज तथा ऊँची ब्याज दरों के जाल में उन्हें締め付け लिया। बाहरी लोगों को — जिन्हें संथाल 'दिकु' कहते थे — उनके जल, जंगल और जमीन पर अधिकार करने दिया जा रहा था। ये संसाधन आदिवासी समाज के लिए महज आर्थिक साधन नहीं थे; ये उनकी जीवन-पद्धति, संस्कृति और सामूहिक पहचान की आत्मा थे। जब इन्हीं पर संकट गहराया, तो प्रतिरोध अनिवार्य हो गया।

सिद्धू-कान्हू और फूलो-झानो: नेतृत्व की वह चतुर्भुज शक्ति

इस ऐतिहासिक आंदोलन का नेतृत्व चार सगे भाइयों — सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव — ने किया। उन्होंने हजारों लोगों को संगठित कर ब्रिटिश सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध छेड़ा। किंतु यह आंदोलन केवल पुरुषों तक सीमित नहीं था। उनकी बहनों फूलो और झानो ने महिलाओं को लामबंद कर संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया — आदिवासी समाज में महिला नेतृत्व का यह उदाहरण आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

दमन, शहादत और उसके परिणाम

हूल क्रांति को कुचलने के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने अभूतपूर्व बल प्रयोग किया। अनुमानों के अनुसार लगभग 20 हजार संथाल इस संघर्ष में शहीद हुए। सिद्धू और कान्हू को गिरफ्तार कर फाँसी दे दी गई। तथापि उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गई — आंदोलन के दबाव में ब्रिटिश सरकार को संथाल क्षेत्र के लिए पृथक प्रशासनिक व्यवस्था बनानी पड़ी। 1856 में संथाल परगना का गठन हुआ और बाद में संथाल परगना काश्तकारी कानून अस्तित्व में आया, जिसने आदिवासी भूमि की सुरक्षा को कानूनी आधार प्रदान किया।

हूल दिवस: स्मृति से संकल्प तक

प्रतिवर्ष 30 जून को झारखंड सहित बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आदिवासी अंचलों में संथाल हूल दिवस श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। सिद्धू-कान्हू तथा अन्य शहीदों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण किया जाता है। पारंपरिक नृत्य, मांदर की थाप, लोकगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को इस गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाता है। यह दिन केवल अतीत को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उस संकल्प को नवीनीकृत करने का दिन है कि जल, जंगल, जमीन और सामाजिक न्याय की रक्षा में उठी हर आवाज़ लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव होती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह पाठ्यपुस्तकों में अब भी फुटनोट से अधिक नहीं बन पाया। आज जब जल, जंगल और जमीन के अधिकार पुनः बहस के केंद्र में हैं, तब हूल की विरासत केवल इतिहास नहीं — एक जीवंत राजनीतिक प्रश्न है।
RashtraPress
29 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संथाल हूल क्रांति क्या थी और यह कब हुई?
संथाल हूल क्रांति 30 जून 1855 को साहिबगंज के भोगनाडीह गाँव से आरंभ हुई, जिसमें लगभग 60 हजार संथाल आदिवासियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, जमींदारों और महाजनों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया। संथाली भाषा में 'हूल' का अर्थ विद्रोह या क्रांति है।
हूल क्रांति का नेतृत्व किसने किया?
इस आंदोलन का नेतृत्व चार सगे भाइयों — सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव — ने किया। उनकी बहनों फूलो और झानो ने महिलाओं को संगठित कर संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया।
हूल क्रांति के क्या परिणाम निकले?
ब्रिटिश दमन में लगभग 20 हजार संथाल शहीद हुए और सिद्धू-कान्हू को फाँसी दी गई। तथापि आंदोलन के दबाव में 1856 में संथाल परगना का गठन हुआ और बाद में संथाल परगना काश्तकारी कानून बना, जिसने आदिवासी भूमि को कानूनी संरक्षण दिया।
हूल दिवस कब और कहाँ मनाया जाता है?
प्रतिवर्ष 30 जून को झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आदिवासी अंचलों में संथाल हूल दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर शहीदों को माल्यार्पण, पारंपरिक नृत्य, मांदर वादन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
हूल क्रांति को 1857 से पहले का स्वतंत्रता संग्राम क्यों कहा जाता है?
हूल क्रांति 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पूरे दो वर्ष पहले हुई और इसमें 60 हजार से अधिक लोगों ने भाग लिया। यह औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध एक सुसंगठित जनआंदोलन था, जिसने ब्रिटिश प्रशासन को ठोस नीतिगत बदलाव करने पर विवश किया — इसीलिए इसे भारत का पहला बड़ा जन-विद्रोह माना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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