योगी सरकार के राजस्व न्यायालयों में 10 लाख से अधिक वादों का निस्तारण, जनवरी-जुलाई 2026 में रिकॉर्ड गति
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जनवरी से जुलाई 2026 के बीच राजस्व न्यायालयों में 10 लाख से अधिक लंबित वादों का निस्तारण कर एक उल्लेखनीय प्रशासनिक उपलब्धि दर्ज की है। शासन स्तर पर नियमित निगरानी, विशेष अभियानों और तकनीक-आधारित मॉनिटरिंग के संयुक्त प्रभाव से यह गति संभव हुई है।
धारा-24: सीमांकन एवं पैमाइश के वाद
31 दिसंबर 2025 तक धारा-24 (सीमांकन/पैमाइश) के अंतर्गत 28,556 वाद विचाराधीन थे। 1 जनवरी से 31 जुलाई 2026 के बीच 91,472 नए वाद दर्ज हुए, जिनमें से 39,645 वादों का निस्तारण किया गया। वर्तमान में 80,383 वाद लंबित हैं, जबकि पाँच वर्ष से अधिक पुराने मामलों की संख्या घटकर मात्र 24 रह गई है।
आँकड़ों के अनुसार, इस श्रेणी में सर्वाधिक विचाराधीन वाद प्रयागराज, प्रतापगढ़, लखनऊ, अमेठी और मथुरा जिलों में हैं।
धारा-34: नामांतरण एवं दाखिल-खारिज में बड़ी सफलता
नामांतरण/दाखिल-खारिज से जुड़े धारा-34 के मामलों में सबसे बड़ी उपलब्धि सामने आई है। 31 दिसंबर 2025 तक 48,910 वाद विचाराधीन थे। 1 जनवरी से 31 जुलाई 2026 के दौरान 14,70,133 नए वाद आए, जिनमें से 10,96,814 वादों का निस्तारण किया गया।
गौरतलब है कि 15 से 25 जून 2026 तक चलाए गए विशेष अभियान में अकेले 2,21,667 वादों का निस्तारण हुआ — यह अभियान विशेष रूप से 45 दिन से अधिक समय से लंबित नामांतरण मामलों के त्वरित समाधान के लिए शुरू किया गया था।
धारा-80: भू-उपयोग परिवर्तन में शून्य पुराने वाद
भू-उपयोग परिवर्तन से संबंधित धारा-80 के अंतर्गत 1 जनवरी से 31 जुलाई 2026 तक 28,797 नए वाद दर्ज हुए, जबकि 49,855 वादों का निस्तारण किया गया — अर्थात नए वादों से अधिक पुराने मामले निपटाए गए। उल्लेखनीय यह है कि इस श्रेणी में पाँच वर्ष से अधिक पुराने लंबित वादों की संख्या शून्य दर्ज की गई है।
सरकार की रणनीति और लक्ष्य
योगी सरकार की इस मुहिम के पीछे तीन प्रमुख स्तंभ हैं — नियमित समीक्षा बैठकें, लक्षित विशेष अभियान और डिजिटल निगरानी तंत्र। यह ऐसे समय में आया है जब राजस्व संबंधी विवाद ग्रामीण उत्तर प्रदेश में भूमि अधिकारों की सबसे बड़ी अड़चन रहे हैं।
सरकार का घोषित लक्ष्य लंबित मामलों का समयबद्ध निस्तारण, आमजन को पारदर्शी न्याय और राजस्व प्रशासन में सुगम व्यवस्था सुनिश्चित करना है। आगे की राह में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि क्या यह गति नए वादों के निरंतर आगमन के बावजूद बनाए रखी जा सकती है।