हूल क्रांति के 171 वर्ष: भोगनाडीह के बरगद तले 30 जून को सिदो-कान्हू को मिलेगी श्रद्धांजलि
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गाँव में पचकठिया का वह विशाल बूढ़ा बरगद वर्षभर मौन खड़ा रहता है — लेकिन 30 जून 2026 को जब इसकी छाया में राज्यभर से हजारों लोग जुटेंगे, तो 171 वर्ष पुरानी संथाल हूल क्रांति की स्मृतियाँ एक बार फिर जीवंत हो उठेंगी। इसी स्थल से 30 जून 1855 को सिदो, कान्हू, चांद, भैरव, फूलो और झानो के नेतृत्व में वह जनक्रांति फूटी थी, जिसने संथाल परगना से लेकर बंगाल के विशाल भूभाग तक ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता को हिला दिया था।
ऐतिहासिक महत्व: भारत का पहला संगठित जनयुद्ध?
जनजातीय इतिहास के अनेक अध्येता संथाल हूल को भारत का पहला संगठित स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं — 1857 के विद्रोह से पूरे दो वर्ष पहले। रांची स्थित रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के सेवानिवृत्त निदेशक और वरिष्ठ अधिकारी रणेंद्र के अनुसार, राजनीतिक दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने भी अपनी चर्चित रचना 'नोट्स ऑन इंडियन हिस्ट्री' में संथाल हूल का उल्लेख किया है। उस काल में लंदन से प्रकाशित अनेक समाचारपत्रों ने इस जनविद्रोह पर विस्तृत रिपोर्टें छापीं, जिनके ज़रिये दुनिया को आदिवासी संघर्ष की जानकारी मिली।
क्रांति का स्वरूप: रणनीति, संगठन और बलिदान
इतिहासकारों के अनुसार, सिदो और कान्हू मुर्मू ने अपने भाइयों चांद और भैरव तथा बहनों फूलो और झानो के साथ मिलकर भोगनाडीह में करीब 20 हजार लोगों की सभा बुलाई और अंग्रेजी शासन को क्षेत्र छोड़ने का खुला आह्वान किया। झारखंड इनसाइक्लोपीडिया के लेखक सुधीर पाल शोध दस्तावेजों के हवाले से बताते हैं कि इस आंदोलन के लिए सैन्य टुकड़ियाँ, गुप्तचर तंत्र, रसद व्यवस्था और प्रचार दल तक गठित किए गए थे — यह कोई स्वतःस्फूर्त विद्रोह नहीं, बल्कि सुनियोजित जनयुद्ध था।
तीर-धनुष, फरसा और पारंपरिक हथियारों से लैस विद्रोहियों ने कंपनी की आधुनिक सेना को कई मोर्चों पर कड़ी चुनौती दी। 16 जुलाई 1855 को पीरपैंती और 21 जुलाई को वीरभूम में अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। यह आंदोलन केवल संथाल समुदाय तक सीमित नहीं था — पहाड़िया, अहीर, लोहार और अन्य स्थानीय समुदाय भी इसमें शामिल हुए।
बलिदान और दमन
लगभग 52 गाँवों के 50 हजार से अधिक लोगों ने इस संघर्ष में प्रत्यक्ष भागीदारी की। एक वर्ष से अधिक चले इस अभियान में 10 हजार से ज्यादा लोग शहीद हुए। विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की। संघर्ष के दौरान चांद और भैरव रणभूमि में शहीद हो गए। बाद में सिदो को पचकठिया के उसी बरगद पर फाँसी दी गई जो आज भी इस इतिहास का मौन साक्षी है, जबकि कान्हू को भोगनाडीह में फाँसी पर चढ़ाया गया।
स्मृति और मान्यता
वर्ष 2002 में भारत सरकार ने सिदो-कान्हू की स्मृति में डाक टिकट जारी किया। झारखंड में हूल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि स्वाभिमान, प्रतिरोध और जनअस्मिता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। राजकीय स्तर पर भोगनाडीह में बड़ा कार्यक्रम आयोजित होगा और पूरे राज्य में कई समारोह होंगे। इसके बावजूद जनजातीय समाज और इतिहासकारों का मानना है कि संथाल हूल को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अब भी वह स्थान नहीं मिल पाया है, जिसका वह वास्तविक हकदार है।