यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी में चुने गए IIT मद्रास के प्रो. थलप्पिल प्रदीप, नैनो-जल तकनीक को मिली वैश्विक पहचान
सारांश
मुख्य बातें
आईआईटी मद्रास के प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर थलप्पिल प्रदीप को स्वीडन के गोथेनबर्ग स्थित यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी का पूर्ण सदस्य चुना गया है। नैनो विज्ञान, जल शुद्धिकरण और कम लागत वाली स्वच्छ पेयजल तकनीकों में उनके अग्रणी योगदान को देखते हुए उन्हें यह प्रतिष्ठित सदस्यता प्रदान की गई है। वे इस अकादमी के पूर्ण सदस्य बनने वाले तीसरे भारतीय वैज्ञानिक हैं।
यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी क्या है
यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी की स्थापना 1992 में हुई थी। यह संस्था दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को एक साझा मंच पर एकत्रित करती है। इसके सदस्यों में नोबेल पुरस्कार, फील्ड्स पदक और ट्यूरिंग पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक भी शामिल हैं। अकादमी का उद्देश्य विज्ञान और इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित नीति-निर्माण में विशेषज्ञ परामर्श देना है।
भारत की बढ़ती वैज्ञानिक उपस्थिति
प्रो. प्रदीप से पहले भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो. सी. एन. आर. राव और प्रो. बिमन बागची इस अकादमी के पूर्ण सदस्य चुने जा चुके हैं। यूरोप और अमेरिका में कार्यरत भारतीय मूल के कई वैज्ञानिक भी इस अकादमी से जुड़े हैं। यह चुनाव ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में अपनी उपस्थिति तेज़ी से मज़बूत कर रहा है।
प्रयोगशाला से जमीन तक: प्रो. प्रदीप का शोध
आईआईटी मद्रास के अनुसार, प्रो. प्रदीप का वैज्ञानिक कार्य केवल शोध पत्रों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने नैनो तकनीक की सहायता से किफायती जल शुद्धिकरण प्रणाली विकसित की, जिसका उपयोग भारत में आर्सेनिक और कीटनाशकों जैसे खतरनाक प्रदूषकों से मुक्त सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए किया गया। उनका शोध यह प्रमाणित करता है कि अत्याधुनिक विज्ञान को यदि व्यावहारिक धरातल पर उतारा जाए, तो वह सीधे आम जनजीवन को बेहतर बना सकता है।
प्रो. प्रदीप का शोध क्षेत्र केवल जल शुद्धिकरण तक नहीं है — वे नैनो पदार्थों, आणविक समूहों, सूक्ष्म बूंदों, बर्फ रसायन, सतह विज्ञान और स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसे विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्वच्छ जल केंद्र की भी स्थापना की है, जो प्रयोगशाला की खोजों को भविष्य की जल सुरक्षा के लिए व्यावहारिक तकनीकों में परिवर्तित करने पर केंद्रित है।
संस्थान और वैज्ञानिक की प्रतिक्रिया
आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि ने प्रो. प्रदीप को बधाई देते हुए कहा कि नैनो विज्ञान और स्वच्छ जल तकनीक को बड़े पैमाने पर किफायती इंजीनियरिंग समाधानों में बदलना भारत जैसे विशाल देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, और प्रो. प्रदीप का योगदान इस दिशा में उल्लेखनीय है।
प्रो. थलप्पिल प्रदीप ने इस सम्मान पर कहा कि यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी की सदस्यता उनके लिए अत्यंत गौरव की बात है। उन्होंने इसे वैश्विक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारत की बढ़ती पहचान और नेतृत्व क्षमता का प्रतिबिंब बताया, और कहा कि यह सम्मान उन्हें वास्तविक सामाजिक समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान की दिशा में और दृढ़ संकल्प देता है।
हालिया सम्मान और आगे की राह
गौरतलब है कि यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी में चुनाव से ठीक पहले प्रो. प्रदीप को राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन के जे. सी. बोस अनुदान के लिए भी चुना गया था — यह उनका इस सम्मान के अंतर्गत तीसरा पाँच वर्षीय कार्यकाल है, जिसे पहले 'जे. सी. बोस फेलोशिप' के नाम से जाना जाता था। इसके अतिरिक्त उन्हें पद्मश्री और विज्ञान श्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हैं। इन उपलब्धियों की श्रृंखला यह संकेत देती है कि भारत के वैज्ञानिक अब वैश्विक शोध नेतृत्व में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।