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आईआईटी मद्रास के 6 प्रोफेसरों को जेसी बोस अनुदान, हर साल मिलेंगे ₹25 लाख

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आईआईटी मद्रास के 6 प्रोफेसरों को जेसी बोस अनुदान, हर साल मिलेंगे ₹25 लाख

सारांश

IIT मद्रास के 6 प्रोफेसरों को ANRF का प्रतिष्ठित जेसी बोस अनुदान मिला है — हर एक को 5 साल तक सालाना ₹25 लाख। कृत्रिम अंग से लेकर स्वच्छ जल तकनीक और बोरॉन रसायन तक, ये शोधकर्ता भारतीय विज्ञान की अग्रिम पंक्ति में हैं।

मुख्य बातें

IIT मद्रास के 6 प्रोफेसरों को ANRF का जेसी बोस अनुदान प्रदान किया गया है।
प्रत्येक वैज्ञानिक को 5 वर्षों तक हर साल ₹25 लाख की शोध निधि मिलेगी।
चयनित प्रोफेसर: सुजाता श्रीनिवासन, थलप्पिल प्रदीप, दीपा वेंकिटेश, जितेंद्र एस.
सांगवई, रामकृष्णन स्वामीनाथन और सुंदरगोपाल घोष ।
थलप्पिल प्रदीप यह अनुदान पाने वाले यह उनका तीसरा कार्यकाल है — एक दुर्लभ उपलब्धि।
अनुदान राशि मानव संसाधन, उपकरण, यात्रा और प्रयोगों पर खर्च की जा सकती है।
पात्रता: 45 से 65 वर्ष आयु के वैज्ञानिक व इंजीनियर; चयन शोध, पेटेंट और वैज्ञानिक उपलब्धियों के आधार पर।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के 6 वरिष्ठ प्रोफेसरों को अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के प्रतिष्ठित जेसी बोस अनुदान के लिए चुना गया है, जिसके तहत प्रत्येक वैज्ञानिक को 5 वर्षों तक हर साल ₹25 लाख की शोध निधि प्रदान की जाएगी। यह घोषणा 7 अगस्त 2026 को की गई। यह सम्मान देश के उन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को दिया जाता है जिन्होंने अनुसंधान के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया हो।

किन प्रोफेसरों को मिला यह सम्मान

इस बार चुने गए छह वैज्ञानिक हैं — प्रो. सुजाता श्रीनिवासन, प्रो. थलप्पिल प्रदीप, प्रो. दीपा वेंकिटेश, प्रो. जितेंद्र एस. सांगवई, प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन और प्रो. सुंदरगोपाल घोष। संस्थान के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी ने सभी चयनित वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान IIT मद्रास में हो रहे उच्च गुणवत्ता वाले शोध का प्रमाण है।

शोध के प्रमुख क्षेत्र और योगदान

प्रो. सुजाता श्रीनिवासन ने कृत्रिम अंग और दिव्यांगजन के लिए सहायक उपकरण विकसित किए हैं। संस्थान के अनुसार उनकी टीम ने कम लागत वाले ऐसे उपकरण तैयार किए हैं जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं — इनमें नियोफ्लाई-नियोबोल्ट प्रणाली, स्टैंडिंग व्हीलचेयर, कदम कृत्रिम घुटना और हल्की व्हीलचेयर शामिल हैं। उनके नाम भारत और विदेशों में कई पेटेंट दर्ज हैं।

प्रो. थलप्पिल प्रदीप ने स्वच्छ पेयजल तकनीक, नैनो पदार्थ और रसायन विज्ञान में विश्व स्तरीय शोध किया है। उनकी कम लागत वाली जल शुद्धिकरण तकनीक से देश के लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध हुआ है। उन्हें पद्मश्री, विज्ञान श्री, एनी पुरस्कार और विनफ्यूचर पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं। गौरतलब है कि यह उनका तीसरा जेसी बोस कार्यकाल है।

प्रो. दीपा वेंकिटेश ऑप्टिकल कम्यूनिकेशन तकनीक की विशेषज्ञ हैं। उनके नेतृत्व में भारत का पहला मल्टी कोर फाइबर परीक्षण केंद्र IIT मद्रास में स्थापित हुआ। उनका शोध उच्च क्षमता वाले संचार, सूक्ष्मतरंग प्रकाशिकी और संकेत प्रसंस्करण पर केंद्रित है।

प्रो. जितेंद्र एस. सांगवई का शोध कार्बन कैप्चर और भंडारण, गैस हाइड्रेट तथा तेल एवं गैस अभियांत्रिकी पर आधारित है। उनके 200 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं, 43 पेटेंट दायर किए हैं और उनके शोध का उल्लेख लगभग 11,000 बार किया जा चुका है। उन्हें राष्ट्रीय भूविज्ञान पुरस्कार सहित कई सम्मान प्राप्त हैं।

प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन ने चिकित्सा उपकरण और जैव-चिकित्सा यंत्रों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनका शोध मस्तिष्क और मांसपेशियों की कार्यप्रणाली को समझने वाले उपकरणों पर केंद्रित है। वे 550 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं और 50 से अधिक शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर चुके हैं।

प्रो. सुंदरगोपाल घोष का शोध बोरॉन आधारित रसायन विज्ञान पर केंद्रित है। उनके कार्य से उत्प्रेरण और छोटे अणुओं की सक्रियता के क्षेत्र में नई संभावनाएँ खुली हैं। उन्होंने 325 से अधिक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र प्रकाशित किए हैं और उन्हें IIT मद्रास का अनुसंधान एवं विकास पुरस्कार भी मिल चुका है।

अनुदान राशि का उपयोग

जेसी बोस अनुदान के तहत प्रत्येक वैज्ञानिक को 5 वर्षों तक प्रतिवर्ष ₹25 लाख की निधि प्राप्त होगी। यह राशि मानव संसाधन, उपकरण, शोध सामग्री, यात्रा, प्रयोग और अन्य अनुसंधान कार्यों पर खर्च की जा सकेगी।

पात्रता और चयन प्रक्रिया

जेसी बोस अनुदान के लिए 45 से 65 वर्ष आयु के वैज्ञानिक और इंजीनियर पात्र होते हैं। चयन उनके शोध, पेटेंट, तकनीक विकास, शोध अनुदान और वैज्ञानिक उपलब्धियों के आधार पर किया जाता है। यह अनुदान देश के श्रेष्ठ वैज्ञानिकों को विज्ञान और अभियांत्रिकी के उभरते क्षेत्रों में प्रभावशाली शोध करने के लिए प्रोत्साहित करता है। IIT मद्रास का यह प्रदर्शन देश के शीर्ष तकनीकी संस्थानों में उसकी शोध-केंद्रित पहचान को और मज़बूत करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

सवाल यह भी उठता है कि ₹25 लाख की वार्षिक निधि — जो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर मामूली है — क्या वाकई उस स्तर के शोध को सक्षम बना सकती है जो वैश्विक वैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा में भारत को आगे रखे। ANRF का यह कदम सराहनीय है, लेकिन शोध निधि की मात्रा और वितरण तंत्र पर दीर्घकालिक पुनर्विचार ज़रूरी है।
RashtraPress
7 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जेसी बोस अनुदान क्या है और यह किसे मिलता है?
जेसी बोस अनुदान ANRF (अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित शोध सम्मान है, जो देश के उन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने अनुसंधान में असाधारण योगदान दिया हो। इसके लिए 45 से 65 वर्ष आयु के वैज्ञानिक पात्र होते हैं और चयन शोध, पेटेंट व वैज्ञानिक उपलब्धियों के आधार पर होता है।
IIT मद्रास के किन 6 प्रोफेसरों को जेसी बोस अनुदान मिला है?
चयनित छह प्रोफेसर हैं — प्रो. सुजाता श्रीनिवासन, प्रो. थलप्पिल प्रदीप, प्रो. दीपा वेंकिटेश, प्रो. जितेंद्र एस. सांगवई, प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन और प्रो. सुंदरगोपाल घोष। ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त शोधकर्ता हैं।
जेसी बोस अनुदान के तहत कितनी राशि मिलती है और इसका उपयोग कैसे होता है?
प्रत्येक चयनित वैज्ञानिक को 5 वर्षों तक हर साल ₹25 लाख की शोध निधि प्रदान की जाती है। यह राशि मानव संसाधन, उपकरण, शोध सामग्री, यात्रा, प्रयोग और अन्य अनुसंधान कार्यों पर खर्च की जा सकती है।
प्रो. थलप्पिल प्रदीप की उपलब्धि इस बार विशेष क्यों है?
प्रो. थलप्पिल प्रदीप के लिए यह तीसरा जेसी बोस कार्यकाल है — जो एक दुर्लभ उपलब्धि है। उन्होंने स्वच्छ पेयजल तकनीक के क्षेत्र में ऐसी कम लागत वाली जल शुद्धिकरण तकनीक विकसित की है जिससे देश के लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल मिला है। उन्हें पद्मश्री और विनफ्यूचर पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान प्राप्त हैं।
IIT मद्रास के इन शोधकर्ताओं का काम आम जनता पर क्या असर डालता है?
इन प्रोफेसरों का शोध सीधे सामाजिक ज़रूरतों से जुड़ा है — जैसे दिव्यांगजन के लिए किफायती कृत्रिम अंग, ग्रामीण भारत के लिए सस्ती जल शुद्धिकरण तकनीक, और उन्नत चिकित्सा उपकरण। प्रो. सांगवई का कार्बन कैप्चर शोध जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी सहायक है।
राष्ट्र प्रेस
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