ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: 2030 तक 50 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का लक्ष्य, ₹8 लाख करोड़ निवेश और 6 लाख नौकरियाँ
सारांश
मुख्य बातें
भारत ने 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन (5 एमएमटी) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। 28 अक्टूबर 2026 को जारी एक आधिकारिक फैक्टशीट के अनुसार, राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन देश की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने, आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने और भारत को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व दिलाने की दिशा में निर्णायक कदम है। यह पहल 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन की भारत की प्रतिबद्धता को नई ऊर्जा देती है।
मिशन के प्रमुख आर्थिक लक्ष्य
सरकारी फैक्टशीट में कहा गया है कि इस मिशन के क्रियान्वयन से वर्ष 2030 तक जीवाश्म ईंधन आयात पर लगभग ₹1 लाख करोड़ की बचत होने का अनुमान है। इसके अतिरिक्त, मिशन से ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आकर्षित होने की संभावना जताई गई है।
विनिर्माण, बुनियादी ढाँचा, अनुसंधान एवं परियोजना विकास जैसे क्षेत्रों में 6 लाख से अधिक रोज़गार के अवसर सृजित होने का अनुमान है। गौरतलब है कि यह आँकड़े सरकारी अनुमान हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।
जलवायु लक्ष्यों पर असर
फैक्टशीट के अनुसार, निर्धारित मात्रा में ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन और उपयोग होने पर प्रतिवर्ष लगभग 5 करोड़ टन (50 एमएमटी) कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जा सकेगा। यह भारत के पेरिस समझौते के तहत निर्धारित जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में उल्लेखनीय योगदान देगा।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर कई देश ऊर्जा संक्रमण में तेज़ी ला रहे हैं और हरित हाइड्रोजन को भावी ऊर्जा अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जा रहा है।
राज्यों की भागीदारी
ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र को गति देने के लिए गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल — कुल छह राज्यों ने समर्पित नीतियाँ अधिसूचित कर दी हैं। हरियाणा, पंजाब, बिहार और केरल अपनी-अपनी नीतियों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में हैं।
हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ ने ग्रीन हाइड्रोजन को अपनी मौजूदा औद्योगिक एवं नवीकरणीय ऊर्जा नीतियों में शामिल किया है। इस प्रकार देश के अधिकांश प्रमुख राज्य किसी न किसी रूप में इस मिशन से जुड़ चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग का विस्तार
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, सऊदी अरब, यूएई और उज़्बेकिस्तान के साथ समझौते, आशय-पत्र और संयुक्त घोषणाएँ की हैं। नीदरलैंड्स के साथ नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग पर एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) भी हस्ताक्षरित किया गया है।
भारत-अमेरिका स्ट्रैटेजिक क्लीन एनर्जी पार्टनरशिप के तहत एक विशेष इंडिया-यूएस हाइड्रोजन टास्क फोर्स का गठन किया गया है। ग्रीन हाइड्रोजन को नई और उभरती नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी कार्ययोजना (आरईटीएपी) का भी प्रमुख क्षेत्र माना गया है।
प्रमाणन व्यवस्था और डिजिटल ढाँचा
ग्रीन हाइड्रोजन के लिए विश्वसनीय प्रमाणन प्रणाली विकसित करने हेतु अप्रैल 2025 में ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन स्कीम ऑफ इंडिया शुरू की गई थी। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (बीईई) प्रमाणन एजेंसियों को अधिकृत करता है, जबकि जून 2026 में इसके लिए एक विशेष डिजिटल पोर्टल भी लॉन्च किया गया।
सरकार का कहना है कि पारदर्शी एवं विश्वसनीय प्रमाणन से भारतीय उत्पादकों को वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी। आलोचकों का कहना है कि प्रमाणन तंत्र की मज़बूती ही यह तय करेगी कि भारतीय ग्रीन हाइड्रोजन अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का भरोसा जीत पाता है या नहीं।
आगे की राह
विशेषज्ञों के अनुसार, उत्पादन लागत को प्रतिस्पर्धी बनाना और नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करना इस मिशन की सबसे बड़ी चुनौतियाँ होंगी। सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है — जो देश को जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।