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राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: 2030 तक 50 लाख मीट्रिक टन उत्पादन लक्ष्य, ₹8 लाख करोड़ निवेश की उम्मीद

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राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: 2030 तक 50 लाख मीट्रिक टन उत्पादन लक्ष्य, ₹8 लाख करोड़ निवेश की उम्मीद

सारांश

भारत का 2030 तक 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य सिर्फ एक ऊर्जा योजना नहीं — यह ₹8 लाख करोड़ के निवेश, 6 लाख नौकरियों और ₹1 लाख करोड़ की ईंधन आयात बचत का दाँव है। 10 से अधिक देशों से साझेदारी और 6 राज्यों की नीतियाँ तैयार — भारत वैश्विक हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था में जगह बनाने की दौड़ में है।

मुख्य बातें

भारत का लक्ष्य 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन (5 एमएमटी) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है।
मिशन से ₹8 लाख करोड़ से अधिक निवेश और 6 लाख से अधिक रोज़गार अवसर सृजित होने का अनुमान है।
2030 तक जीवाश्म ईंधन आयात पर ₹1 लाख करोड़ की बचत और प्रतिवर्ष 5 करोड़ टन CO₂ उत्सर्जन में कमी का लक्ष्य।
गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल ने समर्पित ग्रीन हाइड्रोजन नीतियाँ अधिसूचित कीं।
एमएनआरई ने ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, सऊदी अरब, यूएई सहित कई देशों के साथ समझौते किए; इंडिया-यूएस हाइड्रोजन टास्क फोर्स भी गठित।
ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन स्कीम ऑफ इंडिया अप्रैल 2025 में शुरू; डिजिटल पोर्टल जून 2026 में लॉन्च।

भारत सरकार ने 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन (5 एमएमटी) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। 28 अक्टूबर 2026 को जारी एक आधिकारिक फैक्टशीट के अनुसार, राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन देश की ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करने, जीवाश्म ईंधन आयात पर निर्भरता घटाने और भारत को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक अगुआ बनाने की कुंजी है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, इस मिशन से ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आकर्षित होगा और 6 लाख से अधिक रोज़गार अवसर सृजित होंगे।

मिशन के मुख्य लक्ष्य और आर्थिक संभावनाएँ

फैक्टशीट में उल्लेखित आँकड़ों के अनुसार, 2030 तक जीवाश्म ईंधन आयात पर होने वाले खर्च में लगभग ₹1 लाख करोड़ की बचत अपेक्षित है। इसके साथ ही, निर्धारित मात्रा में ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन एवं उपयोग से प्रतिवर्ष लगभग 5 करोड़ टन (50 एमएमटी) कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जा सकेगा। यह पहल विनिर्माण, बुनियादी ढाँचा, अनुसंधान और परियोजना विकास जैसे क्षेत्रों में नई औद्योगिक गतिविधि को गति देगी।

गौरतलब है कि यह मिशन केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं — इसका उद्देश्य औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन में कटौती करते हुए घरेलू विनिर्माण को मज़बूती देना और भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग तथा निर्यात का वैश्विक केंद्र स्थापित करना है।

राज्यों की भागीदारी और नीतिगत तैयारी

ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए छह राज्यों ने पहले ही समर्पित नीतियाँ अधिसूचित कर दी हैं — गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल। वहीं हरियाणा, पंजाब, बिहार और केरल अपनी-अपनी नीतियों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में हैं।

हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ ने ग्रीन हाइड्रोजन को अपनी मौजूदा औद्योगिक और नवीकरणीय ऊर्जा नीतियों में शामिल किया है। इस प्रकार देश के एक बड़े भू-भाग में नीतिगत ढाँचा तैयार होता दिख रहा है, जो निवेशकों को एक समन्वित संकेत देता है।

अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ और कूटनीतिक पहल

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, सऊदी अरब, यूएई और उज्बेकिस्तान के साथ विभिन्न समझौते, आशय-पत्र और संयुक्त घोषणाएँ की हैं। नीदरलैंड्स के साथ नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग पर एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) भी हस्ताक्षरित किया गया है।

भारत-अमेरिका स्ट्रैटेजिक क्लीन एनर्जी पार्टनरशिप के तहत एक विशेष इंडिया-यूएस हाइड्रोजन टास्क फोर्स का गठन किया गया है। ग्रीन हाइड्रोजन को भारत-अमेरिका नवीन एवं उभरती नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी कार्ययोजना (आरईटीएपी) का भी प्रमुख क्षेत्र माना गया है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था को लेकर यूरोप और एशिया में प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है।

प्रमाणन व्यवस्था और डिजिटल बुनियादी ढाँचा

ग्रीन हाइड्रोजन के लिए विश्वसनीय प्रमाणन व्यवस्था विकसित करने हेतु अप्रैल 2025 में ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन स्कीम ऑफ इंडिया शुरू की गई थी। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (बीईई) प्रमाणन एजेंसियों को अधिकृत करता है, जबकि जून 2026 में इसके लिए एक विशेष डिजिटल पोर्टल भी लॉन्च किया गया। सरकार का कहना है कि पारदर्शी प्रमाणन से भारतीय उत्पादकों को वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी।

दीर्घकालिक दृष्टिकोण और जलवायु प्रतिबद्धता

यह मिशन भारत की 2047 तक 'विकसित भारत' की परिकल्पना और 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता दोनों को बल देता है। आलोचकों का कहना है कि लक्ष्यों की भव्यता के बावजूद क्रियान्वयन की गति, इलेक्ट्रोलाइज़र क्षमता और नवीकरणीय ऊर्जा की पर्याप्त उपलब्धता जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। तथापि, राज्य स्तर पर बढ़ती नीतिगत सक्रियता और अंतरराष्ट्रीय भागीदारियाँ इस बात का संकेत देती हैं कि भारत स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश कर रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि भारत में अभी इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण क्षमता और नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता उस स्तर पर नहीं है जो इस पैमाने को 2030 तक व्यावहारिक बना सके। राज्य नीतियाँ और अंतरराष्ट्रीय एमओयू ढाँचागत प्रगति के संकेत हैं, परंतु वैश्विक हाइड्रोजन बाज़ार में यूरोप और मध्य पूर्व भी तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। ₹1 लाख करोड़ की आयात बचत का अनुमान सरकारी है — स्वतंत्र ऊर्जा विश्लेषकों ने अभी तक इन आँकड़ों की पुष्टि नहीं की है। जब तक क्रियान्वयन की समयसीमा, सत्यापन तंत्र और घरेलू विनिर्माण प्रोत्साहन के ठोस ब्यौरे सामने नहीं आते, यह मिशन नीतिगत दिशा का संकेत तो है, लेकिन सफलता की गारंटी नहीं।
RashtraPress
28 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का 2030 का लक्ष्य क्या है?
भारत सरकार ने 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन (5 एमएमटी) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है। इस मिशन से ₹8 लाख करोड़ से अधिक निवेश और 6 लाख से अधिक रोज़गार अवसर सृजित होने की उम्मीद है।
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से भारत को क्या आर्थिक लाभ होगा?
आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, 2030 तक जीवाश्म ईंधन आयात पर ₹1 लाख करोड़ की बचत होगी और विनिर्माण, बुनियादी ढाँचा तथा अनुसंधान क्षेत्रों में 6 लाख से अधिक नौकरियाँ पैदा होंगी। इसके अलावा ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निजी और सार्वजनिक निवेश आकर्षित होने का लक्ष्य है।
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन में कौन-से राज्य सबसे आगे हैं?
गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल ने पहले ही समर्पित ग्रीन हाइड्रोजन नीतियाँ अधिसूचित कर दी हैं। हरियाणा, पंजाब, बिहार और केरल अपनी नीतियों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में हैं।
भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन के लिए किन देशों के साथ साझेदारी की है?
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, सऊदी अरब, यूएई और उज्बेकिस्तान के साथ समझौते किए हैं। अमेरिका के साथ स्ट्रैटेजिक क्लीन एनर्जी पार्टनरशिप के तहत इंडिया-यूएस हाइड्रोजन टास्क फोर्स भी गठित की गई है।
ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन स्कीम क्या है और यह क्यों ज़रूरी है?
अप्रैल 2025 में शुरू की गई ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन स्कीम ऑफ इंडिया एक प्रमाणन व्यवस्था है जिसे ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (बीईई) संचालित करता है। जून 2026 में एक डिजिटल पोर्टल भी लॉन्च हुआ — इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय उत्पादकों को वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिले।
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