राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: 2030 तक 50 लाख मीट्रिक टन उत्पादन लक्ष्य, ₹8 लाख करोड़ निवेश की उम्मीद
सारांश
मुख्य बातें
भारत सरकार ने 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन (5 एमएमटी) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। 28 अक्टूबर 2026 को जारी एक आधिकारिक फैक्टशीट के अनुसार, राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन देश की ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करने, जीवाश्म ईंधन आयात पर निर्भरता घटाने और भारत को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक अगुआ बनाने की कुंजी है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, इस मिशन से ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आकर्षित होगा और 6 लाख से अधिक रोज़गार अवसर सृजित होंगे।
मिशन के मुख्य लक्ष्य और आर्थिक संभावनाएँ
फैक्टशीट में उल्लेखित आँकड़ों के अनुसार, 2030 तक जीवाश्म ईंधन आयात पर होने वाले खर्च में लगभग ₹1 लाख करोड़ की बचत अपेक्षित है। इसके साथ ही, निर्धारित मात्रा में ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन एवं उपयोग से प्रतिवर्ष लगभग 5 करोड़ टन (50 एमएमटी) कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जा सकेगा। यह पहल विनिर्माण, बुनियादी ढाँचा, अनुसंधान और परियोजना विकास जैसे क्षेत्रों में नई औद्योगिक गतिविधि को गति देगी।
गौरतलब है कि यह मिशन केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं — इसका उद्देश्य औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन में कटौती करते हुए घरेलू विनिर्माण को मज़बूती देना और भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग तथा निर्यात का वैश्विक केंद्र स्थापित करना है।
राज्यों की भागीदारी और नीतिगत तैयारी
ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए छह राज्यों ने पहले ही समर्पित नीतियाँ अधिसूचित कर दी हैं — गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल। वहीं हरियाणा, पंजाब, बिहार और केरल अपनी-अपनी नीतियों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में हैं।
हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ ने ग्रीन हाइड्रोजन को अपनी मौजूदा औद्योगिक और नवीकरणीय ऊर्जा नीतियों में शामिल किया है। इस प्रकार देश के एक बड़े भू-भाग में नीतिगत ढाँचा तैयार होता दिख रहा है, जो निवेशकों को एक समन्वित संकेत देता है।
अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ और कूटनीतिक पहल
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, सऊदी अरब, यूएई और उज्बेकिस्तान के साथ विभिन्न समझौते, आशय-पत्र और संयुक्त घोषणाएँ की हैं। नीदरलैंड्स के साथ नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग पर एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) भी हस्ताक्षरित किया गया है।
भारत-अमेरिका स्ट्रैटेजिक क्लीन एनर्जी पार्टनरशिप के तहत एक विशेष इंडिया-यूएस हाइड्रोजन टास्क फोर्स का गठन किया गया है। ग्रीन हाइड्रोजन को भारत-अमेरिका नवीन एवं उभरती नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी कार्ययोजना (आरईटीएपी) का भी प्रमुख क्षेत्र माना गया है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था को लेकर यूरोप और एशिया में प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है।
प्रमाणन व्यवस्था और डिजिटल बुनियादी ढाँचा
ग्रीन हाइड्रोजन के लिए विश्वसनीय प्रमाणन व्यवस्था विकसित करने हेतु अप्रैल 2025 में ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन स्कीम ऑफ इंडिया शुरू की गई थी। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (बीईई) प्रमाणन एजेंसियों को अधिकृत करता है, जबकि जून 2026 में इसके लिए एक विशेष डिजिटल पोर्टल भी लॉन्च किया गया। सरकार का कहना है कि पारदर्शी प्रमाणन से भारतीय उत्पादकों को वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण और जलवायु प्रतिबद्धता
यह मिशन भारत की 2047 तक 'विकसित भारत' की परिकल्पना और 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता दोनों को बल देता है। आलोचकों का कहना है कि लक्ष्यों की भव्यता के बावजूद क्रियान्वयन की गति, इलेक्ट्रोलाइज़र क्षमता और नवीकरणीय ऊर्जा की पर्याप्त उपलब्धता जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। तथापि, राज्य स्तर पर बढ़ती नीतिगत सक्रियता और अंतरराष्ट्रीय भागीदारियाँ इस बात का संकेत देती हैं कि भारत स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश कर रहा है।