भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन 2026: वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भारत की 40% हिस्सेदारी, लॉजिस्टिक्स बड़ी चुनौती
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 24 अक्टूबर 2026 को आयोजित भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन 2026 में उद्योग विशेषज्ञों, निर्यातकों और नीति निर्माताओं ने एकमत से रेखांकित किया कि भारत वैश्विक चावल निर्यात में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दुनिया का निर्विवाद अग्रणी देश बना हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी क्षेत्र में भू राजनीतिक तनाव के कारण शिपिंग लागत और बीमा दरों में तीव्र वृद्धि के बावजूद भारत का निर्यात प्रवाह बाधित नहीं हुआ है।
सम्मेलन का महत्व और भागीदारी
इस सम्मेलन में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा), राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन, ईवाई (अर्न्स्ट एंड यंग एलएलपी), कृभको एग्री, यूरोफिन्स एनालिटिकल सर्विसेज इंडिया और एसजीएस फूड टेस्टिंग सर्विसेज सहित दर्जनों संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए। बोरियाँ बनाने वाले उद्योगों से लेकर सर्वेयर, कस्टम हाउस एजेंट, किसान और निर्यातक तक — पूरी वैल्यू चेन एक ही मंच पर उपस्थित रही।
विशेषज्ञों की राय: ताकत और चुनौतियाँ
वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत एपीडा के महाप्रबंधक तरुण बजाज ने कहा, "भारत वैश्विक चावल निर्यात में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है और दुनिया का निर्विवाद नेता है। ऐसे में भारत में ऐसा मंच होना जरूरी है, जहाँ किसान से लेकर उपभोक्ता तक पूरी वैल्यू चेन के लोग एक साथ बैठकर चुनौतियों और समाधानों पर चर्चा कर सकें।" उन्होंने स्वीकार किया कि इस समय सबसे बड़ी चुनौती लॉजिस्टिक्स की है — स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, शिपिंग समय बढ़ा है और परिवहन शुल्क कई गुना तक बढ़ गए हैं।
राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डॉ. राजीव कुमार ने बताया कि दुनिया के दूसरे, तीसरे और चौथे सबसे बड़े चावल निर्यातकों की संयुक्त हिस्सेदारी भी भारत से कम है। उन्होंने आगाह किया कि थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देश जलमार्गों पर अधिक निर्भर हैं, जबकि भारत में अधिकांश परिवहन सड़क मार्ग से होता है, जिससे लागत बढ़ जाती है। उनका सुझाव था कि सरकार और उद्योग जगत को उन किस्मों के उत्पादन पर अधिक ध्यान देना चाहिए जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में माँग अधिक हो।
बफर स्टॉक और खाद्य सुरक्षा की स्थिति
कृभको एग्री के मुख्य प्रबंधक राजेश पहारिया जैन ने कहा कि मौसम संबंधी चुनौतियों और फसल उत्पादन में संभावित कमी के बावजूद देश के पास भारतीय खाद्य निगम (FCI) के माध्यम से लगभग 5.5 से 6 करोड़ टन का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है, जिससे स्थिति सुरक्षित बनी हुई है। उन्होंने सरकार से निर्यात उद्योग के लिए ब्याज सहायता और अतिरिक्त प्रोत्साहनों की माँग भी की। गौरतलब है कि चावल केवल एक व्यापारिक वस्तु नहीं, बल्कि दर्जनों देशों की खाद्य सुरक्षा से सीधे जुड़ा मुद्दा है।
प्रौद्योगिकी और पारदर्शिता की भूमिका
एग्रीगुरु ऑनलाइन की संस्थापक हंसा सिंह राक्या ने बताया कि उनकी कंपनी ने दुनिया का पहला एआई आधारित मार्केट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो खरीदारों और विक्रेताओं को वास्तविक समय में कीमतों, फ्रेट लागत, व्यापार नियमों, वैश्विक घटनाक्रमों और बाजार से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराता है। उन्होंने कहा, "मौजूदा भू राजनीतिक तनाव और बदलती व्यापार नीतियों के दौर में सही और पारदर्शी जानकारी बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।"
यूरोफिन्स एनालिटिकल सर्विसेज इंडिया के प्रबंध निदेशक डॉ. पंकज जैमिनी और एसजीएस फूड टेस्टिंग सर्विसेज की प्रमुख पूर्वी शाह ने भी कहा कि ऐसे सम्मेलन वैश्विक व्यापार को सरल बनाने में सहायक हैं और खरीदार विक्रेता बैठकों से सीमा शुल्क या गुणवत्ता संबंधी अस्वीकृतियों को कम किया जा सकता है।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाएँ भू राजनीतिक दबावों और जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार झेल रही हैं। ईवाई के पार्टनर प्रशांत रायजादा के अनुसार, यह सम्मेलन चावल क्षेत्र का अब तक का सबसे बड़ा और प्रभावशाली आयोजन रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि लॉजिस्टिक्स लागत में कमी, उच्च माँग वाली किस्मों पर ध्यान और प्रौद्योगिकी आधारित पारदर्शिता — ये तीन कारक भारत की वैश्विक चावल बाजार में बढ़त को और मजबूत कर सकते हैं।