23 अगस्त 2026
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भारतीय रेलवे की पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल कंटेनर ट्रेन: JNPT से वरणामा तक 422 किमी, 360 TEU का सफर

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भारतीय रेलवे की पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल कंटेनर ट्रेन: JNPT से वरणामा तक 422 किमी, 360 TEU का सफर

सारांश

भारतीय रेलवे ने 21 अगस्त को JNPT से वडोदरा के वरणामा तक पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल कंटेनर ट्रेन चलाकर इतिहास रचा। 422 किमी की यात्रा में 360 TEU कंटेनर — यह वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर पर बंदरगाह-से-अंतर्देशीय लॉजिस्टिक्स की क्षमता का नया मानक है।

मुख्य बातें

भारतीय रेलवे ने 21 अगस्त 2026 को देश की पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल कंटेनर ट्रेन का सफल संचालन किया।
ट्रेन JNPT (मुंबई) से वरणामा, वडोदरा स्थित कॉनकोर GCT टर्मिनल तक 422 किलोमीटर चली।
कुल 360 TEU कंटेनर ढोए गए — दो रैक में 180-180 TEU , जिनका संयुक्त भार 3,922 टन से अधिक रहा।
ट्रेन वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) पर संचालित हुई और पूरी तरह विद्युत चालित रही।
इस पहल से टर्मिनल भीड़ कम होगी, कंटेनर निकासी तेज होगी और डीजल-आधारित सड़क परिवहन पर निर्भरता घटेगी।

भारतीय रेलवे ने 21 अगस्त 2026 को देश की पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल कंटेनर ट्रेन का सफल संचालन किया — जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT), मुंबई से वडोदरा मंडल के वरणामा स्थित कॉनकोर के GCT टर्मिनल तक। यह ट्रेन 422 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए कुल 360 TEU कंटेनर लेकर चली, जो एकल रेल यात्रा में भारत की अब तक की सबसे बड़ी कंटेनर माल ढुलाई में से एक है।

संचालन का विवरण

यह ट्रेन 21 अगस्त की शाम 7 बजे JNPT से रवाना हुई और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) के रास्ते वरणामा पहुँची। ट्रेन में दो अलग-अलग डबल-स्टैक रैक को जोड़कर चलाया गया।

आगे वाले रैक को लोकोमोटिव संख्या 60311 ने खींचा। इसमें 45+1 लोड संरचना थी और कुल वजन 1,817 टन रहा, जिसमें 180 TEU कंटेनर थे। पीछे वाले रैक को लोकोमोटिव संख्या 24690 ने खींचा — समान 45+1 लोड संरचना के साथ, परंतु इसका वजन 2,105 टन था और इसमें भी 180 TEU कंटेनर लदे थे।

माल ढुलाई क्षमता पर असर

डबल-स्टैक तकनीक का सीधा अर्थ है कि एक ही रेल यात्रा में दोगुने कंटेनर ढोए जा सकते हैं। इससे JNPT और अन्य माल ढुलाई टर्मिनलों पर कंटेनरों की निकासी तेज होगी, प्रतीक्षा समय घटेगा और टर्मिनलों पर भीड़ कम होगी।

गौरतलब है कि समान मात्रा में माल ढोने के लिए अब कम रेल डिब्बों की आवश्यकता होगी, जिससे उपलब्ध रेल मार्ग क्षमता का अधिक कुशल उपयोग संभव होगा। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब WDFC पर माल ढुलाई की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।

पर्यावरण और सड़क परिवहन पर प्रभाव

चूँकि यह ट्रेन पूरी तरह विद्युत चालित रही, इसलिए डीजल-आधारित सड़क परिवहन पर निर्भरता कम होगी। एक ट्रेन में बड़ी मात्रा में कंटेनर ढोने से उतने ही माल के लिए ट्रकों की संख्या घटेगी — जिससे डीजल की खपत, सड़कों पर यातायात भार और वाहन उत्सर्जन तीनों में कमी आएगी।

रणनीतिक महत्व

यह पहल देश के समर्पित माल गलियारों को अधिक क्षमता और दक्षता के साथ संचालित करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। JNPT से वरणामा तक इस सफल परीक्षण ने यह प्रमाणित किया है कि डबल-स्टैक और लॉन्ग-हॉल ट्रेनें बंदरगाहों एवं देश के अंदरूनी क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी मज़बूत करने तथा रेल-आधारित कंटेनर लॉजिस्टिक्स की समग्र क्षमता बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।

आने वाले समय में इस मॉडल को अन्य माल गलियारों और बंदरगाह-जुड़े मार्गों पर भी विस्तारित किए जाने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा नियमित वाणिज्यिक संचालन में होगी — जहाँ शेड्यूल की पाबंदी, लोकोमोटिव उपलब्धता और टर्मिनल समन्वय एक साथ काम करें। WDFC पर क्षमता बढ़ाने की यह दिशा सही है, परंतु बंदरगाह-से-अंतर्देशीय लॉजिस्टिक्स की वास्तविक लागत में कमी तभी दिखेगी जब यह मॉडल पूर्वी गलियारे और अन्य बंदरगाह मार्गों पर भी नियमित रूप से लागू हो। एक सफल पायलट और एक स्केलेबल प्रणाली के बीच का अंतर अक्सर क्रियान्वयन की निरंतरता में होता है।
RashtraPress
23 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय रेलवे की पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल कंटेनर ट्रेन क्या है?
यह 21 अगस्त 2026 को JNPT (मुंबई) से वडोदरा के वरणामा स्थित कॉनकोर GCT टर्मिनल तक चलाई गई भारत की पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल कंटेनर ट्रेन है। इसमें दो रैक जोड़कर कुल 360 TEU कंटेनर 422 किलोमीटर की दूरी में ले जाए गए।
डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेन का क्या मतलब है?
डबल-स्टैक ट्रेन में कंटेनर एक के ऊपर एक दो परतों में रखे जाते हैं, जिससे एक ही रेल यात्रा में दोगुनी माल ढुलाई क्षमता मिलती है। इससे प्रति यूनिट माल ढुलाई की लागत घटती है और रेल मार्ग का अधिक कुशल उपयोग होता है।
यह ट्रेन किस रूट पर चली और कितना वजन ढोया?
ट्रेन वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) पर JNPT से वरणामा (वडोदरा) तक चली। आगे के रैक का वजन 1,817 टन और पीछे के रैक का वजन 2,105 टन था — दोनों मिलाकर 3,922 टन से अधिक।
इस पहल से आम माल ढुलाई पर क्या असर पड़ेगा?
JNPT जैसे व्यस्त बंदरगाह टर्मिनलों पर कंटेनरों की निकासी तेज होगी और प्रतीक्षा समय घटेगा। साथ ही, विद्युत-चालित ट्रेन होने से डीजल ट्रकों पर निर्भरता कम होगी, जिससे सड़क भार, ईंधन खपत और प्रदूषण में कमी आएगी।
वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर क्या है और इसमें इस ट्रेन का क्या महत्व है?
WDFC भारत का समर्पित माल गलियारा है जो बंदरगाहों और औद्योगिक क्षेत्रों को जोड़ता है। इस ट्रेन के सफल संचालन ने यह प्रमाणित किया कि WDFC पर डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल ट्रेनें व्यावहारिक रूप से चलाई जा सकती हैं, जो भविष्य में इस मॉडल के विस्तार का आधार बनेगा।
राष्ट्र प्रेस
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