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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन जींद से रवाना, लोको पायलट चंद्रकांत ने चेन्नई में ली 4 दिन की खास ट्रेनिंग

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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन जींद से रवाना, लोको पायलट चंद्रकांत ने चेन्नई में ली 4 दिन की खास ट्रेनिंग

सारांश

भारत ने 17 जुलाई को अपनी पहली हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन लॉन्च कर इतिहास रच दिया। जींद से रवाना इस ट्रेन के लोको पायलट चंद्रकांत कुमार ने चेन्नई में 4 दिन की खास ट्रेनिंग ली। शून्य कार्बन उत्सर्जन और स्वचालित सुरक्षा प्रणाली से लैस यह ट्रेन भारत को जर्मनी, जापान जैसे देशों की कतार में खड़ा करती है।

मुख्य बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 जुलाई 2026 को हरियाणा के जींद से देश की पहली हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन को हरी झंडी दिखाई।
लोको पायलट चंद्रकांत कुमार और उनके सहयोगियों को चेन्नई में 4 दिन की विशेष ट्रेनिंग दी गई।
ट्रेन की अधिकतम गति 110 किमी/घंटा ; जींद-सोनीपत रेलखंड पर फिलहाल 75 किमी/घंटा की गति से संचालन।
ट्रेन में सभी सुरक्षा सिस्टम ऑटोमैटिक ; धुआं, गैस रिसाव और आग जैसी स्थितियों में विशेष प्रणाली सक्रिय।
PESO ने संपीड़ित हाइड्रोजन गैस के भंडारण और वितरण के लिए आवश्यक लाइसेंस जारी किया।
भारत अब जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका के साथ हाइड्रोजन रेल तकनीक अपनाने वाले देशों में शामिल।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 जुलाई 2026 को हरियाणा के जींद से देश की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली पैसेंजर ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस ऐतिहासिक अवसर पर ट्रेन के लोको पायलट चंद्रकांत कुमार ने ट्रेन की विशेषताओं, सुरक्षा प्रणाली और अपनी विशेष प्रशिक्षण प्रक्रिया की जानकारी साझा की। यह ट्रेन जींद-सोनीपत रेलखंड पर नियमित रूप से संचालित होगी।

लोको पायलट की ट्रेनिंग और अनुभव

लोको पायलट चंद्रकांत कुमार ने बताया कि इस ट्रेन को चलाने की जिम्मेदारी सौंपे जाने से पहले उन्हें और उनके सहयोगियों को चेन्नई में चार दिन की विशेष ट्रेनिंग दी गई। उन्होंने कहा, 'यह ट्रेन बेहद शानदार है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हाइड्रोजन से चलती है और बिल्कुल भी प्रदूषण नहीं फैलाती। इसमें कार्बन उत्सर्जन नहीं होता। यही बात इसे डीजल और बिजली से चलने वाली अन्य ट्रेनों से अलग बनाती है।'

उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि यह ट्रेन हाइड्रोजन पर चलेगी, जिसे पानी से अलग किया जाता है। यह तकनीक परंपरागत ईंधन स्रोतों पर निर्भरता को समाप्त करती है और शून्य-उत्सर्जन परिवहन की दिशा में एक ठोस कदम है।

उच्च-स्तरीय सुरक्षा प्रणाली

सुरक्षा व्यवस्था पर चंद्रकांत कुमार ने कहा, 'इसकी सुरक्षा रेटिंग बहुत उच्च स्तर की है। धुआं, गैस रिसाव या आग जैसी किसी भी स्थिति में यह अलग तरीके से काम करती है। लोको पायलट के लिए ट्रेन चलाने की पूरी व्यवस्था बेहद आरामदायक है। इस ट्रेन में सभी सुरक्षा सिस्टम ऑटोमैटिक हैं।'

गौरतलब है कि हाइड्रोजन आधारित ट्रेनों में सुरक्षा मानक पारंपरिक ट्रेनों की तुलना में अधिक जटिल होते हैं, क्योंकि हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील गैस है। ऐसे में स्वचालित सुरक्षा प्रणालियों का होना इस परियोजना की तकनीकी परिपक्वता को दर्शाता है।

गति और रेलखंड की विशेषताएँ

चंद्रकांत कुमार ने बताया कि इस ट्रेन की अधिकतम गति 110 किलोमीटर प्रति घंटा है। हालाँकि, जींद-सोनीपत रेलखंड पर निर्धारित गति सीमा 75 किलोमीटर प्रति घंटा होने के कारण फिलहाल यह ट्रेन इसी रफ्तार से संचालित होगी। यह रेलखंड हरियाणा के दो प्रमुख शहरों को जोड़ता है और इस पर यात्री यातायात उल्लेखनीय है।

स्वदेशी बुनियादी ढाँचा और लाइसेंस

इस परियोजना के अंतर्गत जींद में स्वदेशी हाइड्रोजन भंडारण और रीफ्यूलिंग सुविधा विकसित की गई है। पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) ने संपीड़ित हाइड्रोजन गैस के भंडारण और वितरण के लिए आवश्यक लाइसेंस भी जारी कर दिया है। यह लाइसेंस इस परियोजना की सुरक्षा और नियामकीय अनुपालन की पुष्टि करता है।

वैश्विक संदर्भ और भारत की स्थिति

इस ट्रेन के संचालन के साथ भारत जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो स्वच्छ रेल परिवहन के लिए हाइड्रोजन तकनीक पर काम कर रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपने नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के राष्ट्रीय लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है। भारतीय रेलवे की यह पहल नवाचार, ऊर्जा दक्षता और पर्यावरण संरक्षण के व्यापक एजेंडे का हिस्सा मानी जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि जींद-सोनीपत जैसे एक रेलखंड से यह तकनीक राष्ट्रीय रेल नेटवर्क तक कब और कैसे पहुँचेगी। जर्मनी ने अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन 2018 में उतारी थी, लेकिन उच्च परिचालन लागत और हाइड्रोजन उत्पादन के बुनियादी ढाँचे की सीमाओं के कारण विस्तार धीमा रहा है — भारत को इन्हीं चुनौतियों का सामना करना होगा। स्वदेशी रीफ्यूलिंग सुविधा का जींद में विकास सकारात्मक संकेत है, परंतु हाइड्रोजन उत्पादन की लागत और 'ग्रीन हाइड्रोजन' की उपलब्धता पर स्पष्टता अभी बाकी है। बिना स्केलेबल आपूर्ति श्रृंखला के, यह पहल एक शोकेस परियोजना बनकर रह सकती है।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन कहाँ से और कब शुरू हुई?
भारत की पहली हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन 17 जुलाई 2026 को हरियाणा के जींद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना की। यह ट्रेन जींद-सोनीपत रेलखंड पर नियमित रूप से संचालित होगी।
हाइड्रोजन ट्रेन के लोको पायलट को कैसी ट्रेनिंग दी गई?
लोको पायलट चंद्रकांत कुमार और उनके सहयोगियों को चेन्नई में चार दिन की विशेष ट्रेनिंग दी गई, जिसके बाद उन्हें इस ट्रेन के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई। ट्रेनिंग में ट्रेन की विशेष तकनीक और सुरक्षा प्रणालियों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
हाइड्रोजन ट्रेन की सुरक्षा व्यवस्था कैसी है?
इस ट्रेन में सभी सुरक्षा सिस्टम ऑटोमैटिक हैं और इसकी सुरक्षा रेटिंग उच्च स्तर की बताई गई है। धुआं, गैस रिसाव या आग जैसी किसी भी आपात स्थिति में यह ट्रेन स्वचालित रूप से विशेष तरीके से काम करती है।
हाइड्रोजन ट्रेन की गति कितनी है और यह डीजल ट्रेन से कैसे अलग है?
इस ट्रेन की अधिकतम गति 110 किलोमीटर प्रति घंटा है, हालाँकि जींद-सोनीपत रेलखंड पर यह फिलहाल 75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी। डीजल ट्रेनों के विपरीत, यह हाइड्रोजन से संचालित होती है जिसे पानी से अलग किया जाता है और इसमें कार्बन उत्सर्जन बिल्कुल नहीं होता।
भारत की हाइड्रोजन ट्रेन वैश्विक स्तर पर कहाँ खड़ी है?
इस ट्रेन के संचालन के साथ भारत जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जो हाइड्रोजन रेल तकनीक पर काम कर रहे हैं। जींद में स्वदेशी हाइड्रोजन भंडारण और रीफ्यूलिंग सुविधा भी विकसित की गई है और PESO ने आवश्यक लाइसेंस जारी कर दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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