इंदिरा गांधी बनाम कांग्रेस के 'सिंडिकेट': जब पार्टी के भीतर से उठी बगावत ने बदल दिया भारतीय राजनीति का इतिहास
सारांश
मुख्य बातें
भारत की तीसरी प्रधानमंत्री और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का राजनीतिक सफर केवल सत्ता का नहीं, बल्कि संघर्ष और दृढ़ता का असाधारण आख्यान है। 8 फरवरी 1916 को जन्मीं इंदिरा को कांग्रेस के भीतर एक शक्तिशाली नेता-गुट ने शुरुआत में एक 'मोहरे' के रूप में देखा था — लेकिन जनता ने उन्हें 'असली नेता' साबित कर दिया। यह वही दौर था जब कांग्रेस के भीतर एक बड़े धड़े ने उनके विरुद्ध मोर्चा खोला और भारतीय राजनीति का रुख हमेशा के लिए बदल गया।
दुर्गापुर में शुरू हुई वह निर्णायक जंग
जब इंदिरा गांधी कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के लिए दुर्गापुर रवाना होने से पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुँचीं, तो एक पत्रकार ने — जो पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का करीबी माना जाता था — माइक उनके सामने रख दिया। इंदिरा ने बिना किसी राजनीतिक चाल भाँपे सहज रूप से कह दिया कि उन वरिष्ठ नेताओं का पंडित जवाहरलाल नेहरू की राजनीति से विश्वास उठ गया है।
कुछ ही घंटों में वह टेप दुर्गापुर की कार्यसमिति बैठक में कई प्रमुख नेताओं के हाथों तक पहुँच गया। उन नेताओं ने इंदिरा पर पार्टी-विरोधी प्रचार फैलाने का आरोप लगाते हुए माँग की कि उन्हें सार्वजनिक मंचों पर बोलने से रोका जाए। बैठक में कोई ठोस नतीजा नहीं निकला, लेकिन इस प्रकरण ने दो पक्षों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया।
जनता की आवाज़ और नेताओं की चुप्पी
कन्वेंशन के खुले सत्र में जब दूसरे नेता भाषण दे रहे थे, तो उपस्थित जनसमूह जोर-जोर से इंदिरा गांधी का नाम पुकारने लगा। जैसे ही वह माइक के सामने आईं, पंडाल में सन्नाटा छा गया। लोगों ने उनका भाषण पूरे सब्र और शांति से सुना और जैसे ही वह समाप्त हुईं, भीड़ धीरे-धीरे वहाँ से चली गई।
इस दृश्य ने उन नेताओं की सभी रणनीतियाँ धराशायी कर दीं जो इंदिरा को अनुशासनात्मक कार्रवाई की आड़ में कमज़ोर करना चाहते थे। जनता के बीच उनकी असाधारण लोकप्रियता देखकर यह नेता यह सोचने लगे कि इंदिरा को सत्ता की बागडोर दे दी जाए और फिर अपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग किया जाए — या समय आने पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाए।
1967 के चुनाव और कांग्रेस की दरारें
1967 के आम चुनावों में जनता ने न तो इंदिरा के स्पष्ट पक्ष में मतदान किया और न ही उनके विरोध में — बल्कि उन वरिष्ठ नेताओं की राजनीति के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। इंदिरा उन उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिला पाईं जिन्हें वे उचित समझती थीं। कृष्ण मेनन इसी श्रेणी के लोगों में से एक थे। यहाँ तक कि मेनन द्वारा तैयार किए गए चुनाव घोषणा-पत्र को भी नकार दिया गया।
गौरतलब है कि इस दौरान देशभर में बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं ने पार्टी से नाता तोड़ लिया और क्षेत्रीय दलों के बैनर तले विपक्ष में शामिल हो गए। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि केंद्र में कांग्रेस की ताकत घटी और पार्टी को केरल, पश्चिम बंगाल तथा पंजाब में सत्ता से हाथ धोना पड़ा।
1969 का विभाजन और सत्ता की नई लड़ाई
1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया। इन वरिष्ठ नेताओं ने अपने जैसे अन्य लोगों को एकत्र कर एक साझा मंच तैयार किया और कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना का भरपूर लाभ उठाया। फरीदाबाद अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष ने सार्वजनिक क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए जाने पर भी आपत्ति जताई। यहाँ तक कि राष्ट्रपति भवन को भी कथित तौर पर इंदिरा विरोधी गतिविधियों का केंद्र बताया जाने लगा और प्रधानमंत्री पद को कमज़ोर दिखाने की कोशिश की गई।
इन सबके बावजूद इंदिरा डटी रहीं। जब कांग्रेस के नेताओं को यह बात समझ आई कि चुनावी जीत का रास्ता केवल इंदिरा के नाम से होकर जाता है, तो वे एक-एक कर उनके साथ आते गए।
1971 का जनादेश: इंदिरा की ऐतिहासिक जीत
1971 के आम चुनावों में कांग्रेस संगठन भले ही विभाजन से बिखरा हुआ था, लेकिन देशभर से जनता ने उत्साह के साथ मतदान केंद्रों का रुख किया और इंदिरा कांग्रेस के उम्मीदवारों को भारी बहुमत दिया। स्वतंत्रता के बाद किसी नेता के लिए जनसमर्थन का ऐसा ज्वार पहले कभी नहीं देखा गया था। साझा मंच को करारी हार का सामना करना पड़ा।
विधानसभा चुनावों में भी यही जनभावना परिलक्षित हुई। तमिलनाडु को छोड़कर कांग्रेस ने वे सभी राज्य पुनः हासिल कर लिए जो उसने खो दिए थे। जनता ने स्पष्ट संदेश दे दिया कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ही असली कांग्रेस है। यह जनादेश उन सभी नेताओं के राजनीतिक जीवन पर पूर्ण विराम था जिन्होंने 1969 के विभाजन के बाद इंदिरा का साथ छोड़ा था।
इंदिरा गांधी ने उस संकट के दौर में — जब पाकिस्तान ने उपमहाद्वीप के पूर्वी हिस्से में अत्याचार मचा रखा था — देश को बेहद सूझ-बूझ से संभाला। उनका यह ऐतिहासिक योगदान आज भी भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। 31 अक्टूबर 1984 को उनके अपने ही दो अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी — यह त्रासदी 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद भड़की सिख भावनाओं की प्रतिक्रिया थी।