आईपीसी ने DSMNRU और CSIR-CIMAP से किए दो MOU, दिव्यांगजनों व हर्बल दवाओं की गुणवत्ता को मिलेगी नई दिशा
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय औषध संहिता आयोग (आईपीसी) ने 23 जुलाई 2026 को डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय (डीएसएमएनआरयू), लखनऊ के साथ एक नए समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए और सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय एवं सुगंधित पादप संस्थान (सीएसआईआर-सीआईएमएपी) के साथ पूर्व MOU का नवीनीकरण किया। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन इस स्वायत्त संस्था ने इन दोनों साझेदारियों के ज़रिए 'विकसित उत्तर प्रदेश–विकसित भारत' की परिकल्पना को ठोस वैज्ञानिक आधार देने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
मुख्य घटनाक्रम
समारोह में डीएसएमएनआरयू के कुलपति प्रोफेसर संजय सिंह, आईपीसी के सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक डॉ. वी. कलैसेल्वन और सीएसआईआर-सीआईएमएपी के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। दोनों MOU एक साथ संपन्न होना इस बात का संकेत है कि आईपीसी एक साथ कई मोर्चों पर अपनी वैज्ञानिक साझेदारी का विस्तार कर रहा है।
डीएसएमएनआरयू के साथ नए MOU का दायरा
डीएसएमएनआरयू के साथ हुए नए समझौते का मूल उद्देश्य दिव्यांगजनों द्वारा उपयोग किए जाने वाले सहायक उपकरणों की गुणवत्ता, सुरक्षा और कार्यक्षमता के मूल्यांकन हेतु वैज्ञानिक प्रोटोकॉल तैयार करना है। यह सहयोग एक और महत्त्वपूर्ण पहल को भी आकार देगा — सांकेतिक भाषा में फार्माकोविजिलेंस प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित करना, ताकि दिव्यांगजनों में दवा सुरक्षा जागरूकता बढ़े और प्रतिकूल दवा प्रतिक्रियाओं की रिपोर्टिंग में सुधार हो।
यह ऐसे समय में आया है जब देश में दिव्यांग-अनुकूल स्वास्थ्य सेवाओं की माँग लगातार बढ़ रही है, और नियामक ढाँचे में इस वर्ग की ज़रूरतें अब तक सीमित रूप से ही संबोधित हो पाई हैं।
सीएसआईआर-सीआईएमएपी के साथ नवीनीकृत MOU
सीएसआईआर-सीआईएमएपी के साथ नवीनीकृत समझौता औषधीय पौधों के अनुसंधान, मानकीकरण और हर्बल दवाओं के गुणवत्ता मूल्यांकन में सहयोग को आगे बढ़ाएगा। गौरतलब है कि सीएसआईआर-सीआईएमएपी देश के प्रमुख हर्बल अनुसंधान संस्थानों में से एक है और लखनऊ में स्थित होने के कारण उत्तर प्रदेश की औषधीय पादप विरासत के संरक्षण व व्यावसायीकरण में इसकी केंद्रीय भूमिका है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
आईपीसी के सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक डॉ. वी. कलैसेल्वन ने कहा कि ये सहयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, गुणवत्ता मानकों और संस्थागत साझेदारियों को मज़बूत करेंगे, जिससे उत्तर प्रदेश को स्वास्थ्य सेवा और दवा गुणवत्ता के क्षेत्र में उत्कृष्टता केंद्र के रूप में उभरने में सहायता मिलेगी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ऐसी पहलें सुरक्षित, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य उत्पादों तक पहुँच बेहतर करके 'विकसित यूपी–विकसित भारत' के दृष्टिकोण में प्रत्यक्ष योगदान देती हैं।
आम जनता पर असर और आगे की राह
इन साझेदारियों का दीर्घकालिक प्रभाव तीन स्तरों पर दिखेगा — हर्बल दवाओं की गुणवत्ता में सुधार, दिव्यांगजनों के लिए सुरक्षित सहायक उपकरण सुनिश्चित करना, और राज्य में फार्माकोविजिलेंस तंत्र को सुदृढ़ करना। आईपीसी की यह पहल राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के अनुरूप संस्थागत क्षमता निर्माण की दिशा में एक सुनियोजित कदम है, जिसके परिणाम आने वाले वर्षों में नीति और अनुसंधान दोनों स्तरों पर दिखाई देंगे।