इस्मत चुगताई की 111वीं जयंती: 'लेडी चंगेज खां' जिन्होंने उर्दू साहित्य को नई दिशा दी
सारांश
मुख्य बातें
उर्दू साहित्य की निर्भीक आवाज़ इस्मत चुगताई की 21 अगस्त 2026 को 111वीं जयंती मनाई जा रही है। 21 अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में जन्मी इस्मत चुगताई ने अपनी लेखनी से महिलाओं के अधिकार, धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता के सवालों को उर्दू गद्य में केंद्र में रखा। प्रगतिशील लेखक आंदोलन की अग्रणी हस्ती के रूप में उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
बचपन से कलम तक का सफर
इस्मत चुगताई ने बेहद कम उम्र में लेखन शुरू कर दिया था। परिवार ने उनके इस रुझान को रोकने की कोशिश की और समाज ने ताने दिए, लेकिन उनकी कलम नहीं रुकी। उनकी इसी अडिग जिद और बेबाक शैली के कारण प्रसिद्ध लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर ने उन्हें 'लेडी चंगेज खां' की उपाधि दी — एक ऐसा विशेषण जो उनकी साहित्यिक आक्रामकता और अदम्य साहस को रेखांकित करता है। स्नेह से उन्हें 'इस्मत आपा' भी कहा जाता था।
साहित्यिक योगदान और प्रमुख रचनाएँ
इस्मत चुगताई ने उर्दू कथा-साहित्य को कई यादगार उपन्यास और कहानियाँ दीं। उनके उपन्यासों में टेढ़ी लकीर, जिद्दी, एक कतरा ए खून, दिल की दुनिया, मासूमा, बहरूप नगर, सैदाई, जंगली कबूतर, अजीब आदमी और बांदी शामिल हैं। उनकी कहानी 'लिहाफ' ने अपने समय में व्यापक बहस छेड़ी और आज भी उर्दू साहित्य की क्लासिक रचनाओं में गिनी जाती है। यह ऐसे समय में आया जब महिला लेखकों का सामाजिक और यौन विषयों पर खुलकर लिखना दुर्लभ था।
फिल्म जगत से जुड़ाव
इस्मत चुगताई का हिंदी सिनेमा से भी गहरा नाता रहा। उनके पति शाहिद लतीफ फिल्म निर्देशक थे और उन्होंने इस्मत की कई कहानियों पर फिल्में बनाईं। वर्ष 1953 में आई फिल्म 'फरेब' में वे सह-निर्देशिका रहीं। उनकी कहानी पर आधारित फिल्म 'गरम हवा' (1973) को फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ लेखन पुरस्कार मिला। इसके अलावा, उनकी कहानी 'लिहाफ' को माधुरी दीक्षित अभिनीत फिल्म 'डेढ़ इश्किया' में भी रूपांतरित किया गया।
विरासत और अंतिम समय
लंबी बीमारी के बाद 24 अक्टूबर 1991 को मुंबई स्थित अपने घर में इस्मत चुगताई का निधन हो गया। गौरतलब है कि उनके जाने के तीन दशक से भी अधिक समय बाद उनकी रचनाएँ विश्वविद्यालय पाठ्यक्रमों, साहित्यिक उत्सवों और फिल्म अध्ययन में निरंतर उद्धृत होती हैं — यही उनकी स्थायी प्रासंगिकता का प्रमाण है। उनकी 111वीं जयंती पर साहित्य प्रेमी उनकी उस विरासत को याद कर रहे हैं जिसने उर्दू गद्य में स्त्री-स्वर को एक नई भाषा दी।