जामनगर पॉक्सो कोर्ट का बड़ा फैसला: 8 साल की बच्ची की हत्या में दोषी नितिन माणेक को फांसी की सजा
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के जामनगर जिले की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने 9 अक्टूबर 2026 को नितिन माणेक को 8 साल की एक बच्ची की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई। न्यायालय ने इस मामले को साक्ष्यों और अपराध की अत्यंत जघन्य प्रकृति को देखते हुए 'दुर्लभतम मामलों में से एक' करार दिया। पीड़िता के साथ लंबे समय तक क्रूर शारीरिक शोषण किया गया था, जिसमें माचिस की तीलियों से जलाना और लोहे के मूसल से बार-बार हमला करना शामिल था।
मुख्य घटनाक्रम
यह घटना 2025 में जामनगर जिले के सिक्का क्षेत्र में घटित हुई। प्रारंभ में अपराध का पता नहीं चल सका, जिसके बाद पुलिस ने जाँच शुरू की और नितिन माणेक — जो सिक्का का ही निवासी है — की पहचान आरोपी के रूप में की गई। जाँच में वैज्ञानिक, तकनीकी और दस्तावेज़ी साक्ष्य एकत्र किए गए तथा घटना के मात्र 35 दिनों के भीतर न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की गई।
न्यायालय में अभियोजन
ट्रायल के दौरान सरकारी वकील ने 23 गवाहों से पूछताछ की और पॉक्सो कोर्ट के समक्ष लगभग 95 दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत किए। साक्ष्यों और अपराध की परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात न्यायालय ने हत्या के लिए मौत की सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त, माणेक को पॉक्सो एक्ट के तहत उम्रकैद की सजा और ₹50,000 का जुर्माना भी लगाया गया।
सरकार की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद गुजरात के डिप्टी मुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने पुलिस टीम और न्यायपालिका को बधाई दी। अधिकारियों ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध अपराधों के प्रति जीरो-टॉलरेंस की नीति अपनाई है। गौरतलब है कि पुलिस की त्वरित कार्रवाई और समयबद्ध चार्जशीट को इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया को गति देने का प्रमुख कारण माना जा रहा है।
आम जनता पर असर
यह फैसला उन माता-पिता और बाल-अधिकार संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है जो देश में बच्चों के विरुद्ध यौन और शारीरिक अपराधों के प्रति कड़े न्यायिक हस्तक्षेप की माँग करते रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब पॉक्सो मामलों में त्वरित सुनवाई और कठोर दंड की माँग राष्ट्रीय विमर्श में बनी हुई है।
क्या होगा आगे
मौत की सजा पर अमल से पहले मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में होना अनिवार्य है, जहाँ निचली अदालत की सजा की पुष्टि की जाएगी। क़ानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की समीक्षा प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है।