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पालघर कोर्ट का बड़ा फैसला: 8 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म-हत्या के दोषी प्रमुल घोषे को फांसी की सजा

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पालघर कोर्ट का बड़ा फैसला: 8 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म-हत्या के दोषी प्रमुल घोषे को फांसी की सजा

सारांश

चार साल पहले डहाणू में हुई एक मासूम की निर्मम हत्या का न्याय आखिरकार मिला — पालघर की अपर जिला सत्र न्यायालय ने दोषी प्रमुल घोषे को फांसी की सजा सुनाई। 24 गवाहों और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर टिका यह फैसला बाल यौन उत्पीड़न के विरुद्ध कड़े न्यायिक रुख का प्रतीक है।

मुख्य बातें

पालघर अपर जिला एवं सत्र न्यायालय ने दोषी प्रमुल उर्फ प्रफुल्ल रत्ना घोषे (50) को मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई।
घटना 27 सितंबर 2021 को डहाणू, पालघर में हुई थी, जब आरोपी ने 8 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म कर हंसिया से उसकी हत्या की थी।
आरोपी पर IPC की धारा 302, 307, 376 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 व 6 के तहत दोष सिद्ध हुआ।
न्यायालय ने ₹75,000 का जुर्माना लगाया; अदायगी न होने पर डेढ़ वर्ष का अतिरिक्त कारावास।
सुनवाई में 24 गवाहों के बयान दर्ज हुए; जांच IPS अधिकारी नित्यानंद झा ने की।
फांसी की सजा उच्च न्यायालय की पुष्टि के बाद ही अंतिम रूप से लागू होगी।

पालघर की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय ने डहाणू क्षेत्र में 27 सितंबर 2021 को 8 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म और नृशंस हत्या के दोषी प्रमुल उर्फ प्रफुल्ल रत्ना घोषे (50) को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ए.आर. रहाणे ने शुक्रवार को यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आरोपी पर ₹75,000 का जुर्माना भी लगाया।

मुख्य घटनाक्रम

27 सितंबर 2021 को वांगडपाडा, रानशेत, तहसील डहाणू निवासी प्रमुल घोषे ने पानी की टंकी के पास झाड़ियों में 8 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म किया और इसके बाद हंसिया (कोयता) से उसके सिर, गर्दन और चेहरे पर वार कर उसकी निर्मम हत्या कर दी। घटनास्थल पर पहुंचे शिकायतकर्ता पर भी आरोपी ने जानलेवा हमला किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया।

इस मामले को डहाणू पुलिस स्टेशन में अपराध क्रमांक 189/2021 के तहत भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 307, 376, 377 तथा पॉक्सो अधिनियम की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत दर्ज किया गया था।

जांच और साक्ष्य

मामले की जांच तत्कालीन उप-विभागीय पुलिस अधिकारी (बोईसर) नित्यानंद झा (IPS) ने की। उन्होंने ठोस वैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्य एकत्र कर न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कुल 24 गवाहों के बयान दर्ज किए, जिनके आधार पर आरोपी का अपराध सिद्ध हुआ।

न्यायालय का फैसला

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ए.आर. रहाणे ने आरोपी को IPC की धारा 302, 307, 376 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 और 6 के तहत दोषी पाते हुए मृत्युदंड (अंतिम सांस तक फांसी) की सजा सुनाई। साथ ही ₹75,000 का जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में आरोपी को डेढ़ वर्ष के अतिरिक्त साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी।

सरकारी पक्ष की भूमिका

इस मामले में विशेष सरकारी वकील रेखा हिवराले ने अभियोजन पक्ष की पैरवी की। जांच अधिकारी नित्यानंद झा के अलावा महिला सहायक पुलिस उपनिरीक्षक विद्या नरेश बोरे और सहायक पुलिस उपनिरीक्षक संजय गावड ने न्यायालयीन कार्यवाही में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आगे क्या होगा

मृत्युदंड की सजा उच्च न्यायालय की पुष्टि के बाद ही अंतिम रूप से लागू होगी, क्योंकि भारतीय कानून के अनुसार किसी भी फांसी की सजा को उच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। यह मामला बाल यौन उत्पीड़न और हत्या के विरुद्ध त्वरित न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

अपराध की क्रूरता और शिकायतकर्ता पर जानलेवा हमला एक साथ सिद्ध हों। हालांकि मृत्युदंड की सजा उच्च न्यायालय की अनिवार्य समीक्षा से गुजरेगी, जहाँ अतीत में ऐसी सजाएं कभी-कभी बदली गई हैं। असली सवाल यह है कि क्या त्वरित जांच और मजबूत अभियोजन का यह मॉडल — जिसमें वैज्ञानिक साक्ष्य और 24 गवाह शामिल रहे — अन्य जिलों के लिए एक मानक बन सकता है। बाल यौन उत्पीड़न के मामलों में दोषसिद्धि दर राष्ट्रीय स्तर पर अब भी चिंताजनक रूप से कम है, और यह फैसला उस खाई को पाटने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
RashtraPress
7 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पालघर कोर्ट ने किसे और किस मामले में फांसी की सजा सुनाई?
पालघर की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय ने दोषी प्रमुल उर्फ प्रफुल्ल रत्ना घोषे (50) को 8 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में मृत्युदंड की सजा सुनाई। यह घटना 27 सितंबर 2021 को डहाणू, पालघर में हुई थी।
इस मामले में आरोपी पर कौन-सी धाराएं लगाई गई थीं?
आरोपी पर IPC की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 376, 377 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 और 6 के तहत मामला दर्ज था। सभी धाराओं में दोष सिद्ध होने पर न्यायालय ने मृत्युदंड की सजा सुनाई।
क्या फांसी की यह सजा तुरंत लागू होगी?
नहीं। भारतीय कानून के अनुसार सत्र न्यायालय द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजा उच्च न्यायालय की अनिवार्य पुष्टि के बाद ही अंतिम रूप से लागू होती है। दोषी के पास उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अपील का भी अधिकार है।
इस मामले की जांच किसने की और कितने गवाह थे?
मामले की जांच तत्कालीन उप-विभागीय पुलिस अधिकारी (बोईसर) नित्यानंद झा (IPS) ने की। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कुल 24 गवाहों के बयान दर्ज किए, और वैज्ञानिक व परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी का अपराध सिद्ध हुआ।
आरोपी पर जुर्माना कितना लगाया गया और अदायगी न होने पर क्या होगा?
न्यायालय ने आरोपी पर ₹75,000 का जुर्माना लगाया है। यदि आरोपी जुर्माना अदा नहीं करता, तो उसे डेढ़ वर्ष के अतिरिक्त साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी।
राष्ट्र प्रेस
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