जम्मू-कश्मीर में ₹5.57 करोड़ का अनाज घोटाला: एसीबी ने कुपवाड़ा के 14 आरोपियों पर दर्ज की एफआईआर
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने 7 जुलाई 2025 को कुपवाड़ा जिले के करनाह इलाके में सरकारी अनाज के गबन से जुड़े ₹5.57 करोड़ के घोटाले में 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की है। आरोपियों में खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामले (एफसीएस एवं सीए) विभाग के पाँच अधिकारी और नौ उचित मूल्य की दुकानों (एफपीएस) के डीलर शामिल हैं। एसीबी के अनुसार, यह हेराफेरी सरकारी कर्मचारियों और निजी लाभार्थियों की आपराधिक मिलीभगत से की गई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कश्मीर के एफसीएस एवं सीए विभाग के निदेशक से प्राप्त जानकारी के आधार पर सामने आया। विभागीय निरीक्षण और भौतिक सत्यापन के दौरान सरकारी अनाज भंडारों में भारी कमी उजागर हुई, जिसके बाद संबंधित अधिकारियों और एफपीएस डीलरों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की माँग की गई थी। गौरतलब है कि सरकारी बिक्री केंद्रों और उचित मूल्य की दुकानों पर संयुक्त औचक निरीक्षण में शुरुआती जाँच में ही 4,175.89 क्विंटल अनाज की कमी पाई गई।
घोटाले का वित्तीय नुकसान
एसीबी के बयान के अनुसार, इस गबन से सरकारी खजाने को ₹5,57,18,657.25 रुपए का नुकसान हुआ। आरोप है कि आरोपियों ने गैर-कानूनी आर्थिक लाभ के लिए उन्हें सौंपे गए सरकारी अनाज का बेईमानी से गबन किया। यह ऐसे समय में सामने आया है जब जम्मू-कश्मीर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पारदर्शिता पर पहले से सवाल उठते रहे हैं।
कानूनी कार्रवाई और धाराएँ
एसीबी ने सक्षम अधिकारी से पूर्व मंजूरी लेने के बाद एसीबी बारामूला पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की। मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित) की धारा 13(1)(ए) और 13(2) तथा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 61(2) और 316(5) के तहत दर्ज किया गया है।
नामजद आरोपी
एफआईआर में नामजद प्रमुख आरोपियों में तत्कालीन असिस्टेंट स्टोरकीपर उमर बशीर उर्फ राजा उमर और तत्कालीन असिस्टेंट स्टोरकीपर आशिक हुसैन मीर शामिल हैं। इनके अलावा अन्य सरकारी कर्मचारी और उचित मूल्य की दुकानों के डीलर भी आरोपी बनाए गए हैं।
आगे की कार्रवाई
एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद एसीबी ने कई स्थानों पर तलाशी अभियान शुरू किया और कानूनी प्रक्रियाएँ आरंभ कर दी गई हैं। जाँच के दायरे में और नाम आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह मामला जम्मू-कश्मीर की सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।