जॉन ब्रिटास का आरोप: दिल्ली पुलिस ने की मारपीट, CJI, राष्ट्रपति और सभापति को लिखा पत्र
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा सदस्य और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — सीपीआई (एम) — के नेता जॉन ब्रिटास ने 11 अक्टूबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), राष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर नई दिल्ली में उनके साथ हुई कथित पुलिस कार्रवाई की न्यायिक निगरानी में स्वतंत्र जाँच कराने की माँग की है। उनका आरोप है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के कर्मियों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया, उन्हें जबरन खींचते हुए पुलिस वाहन में डाला और बाद में सड़क किनारे छोड़ दिया।
मुख्य घटनाक्रम
ब्रिटास के अनुसार, वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर चल रहे लोकतांत्रिक आंदोलन के सिलसिले में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर उन्हें जबरन खींचते हुए लगभग 50 मीटर तक घसीटा। ब्रिटास का कहना है कि अपनी राज्यसभा सदस्यता की पहचान बताने के बावजूद उनके साथ अपमानजनक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने वाला व्यवहार जारी रहा।
उन्होंने दावा किया कि पुलिस वाहन के अंदर भी मारपीट की गई। बाद में संबंधित डीसीपी के निर्देश पर उन्हें रिहा किया गया, क्योंकि उनकी हिरासत को गैरकानूनी माना गया। रिहाई के बाद भी उन्हें शारीरिक पीड़ा और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। उनके अनुसार, झारखंड के एक युवक ने पूरी घटना की प्रत्यक्षदर्शी के रूप में देखा और उनकी सहायता की।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का संदर्भ
ब्रिटास ने अपने पत्र में यह भी रेखांकित किया कि यह घटना ऐसे समय हुई जब सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों को लेकर स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि शांतिपूर्ण और निहत्थे नागरिकों को केवल कानून के अनुसार ही हिरासत में लिया जा सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि अदालत के निर्देशों के कुछ ही घंटों बाद इस तरह की कार्रवाई कैसे हुई। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्ष पहले से ही दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठा रहा है।
व्यापक विपक्षी हिरासत का संदर्भ
गौरतलब है कि घटना से एक दिन पहले कई विपक्षी नेताओं को भी हिरासत में लिया गया था, जिनमें केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन भी शामिल थे। ब्रिटास के अनुसार, उन नेताओं को कई घंटे तक दिल्ली में इधर-उधर ले जाया गया और उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि उन्हें कहाँ ले जाया जा रहा है। यह पहली ऐसी घटना नहीं है जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान सांसदों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगे हों।
जाँच और जवाबदेही की माँग
सीपीआई (एम) सांसद ने माँग की है कि इस मामले में शामिल पुलिसकर्मियों, वाहन, आदेशों की श्रृंखला और प्रत्यक्षदर्शियों की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। उन्होंने मीडिया और आम नागरिकों द्वारा बनाए गए वीडियो फुटेज, पुलिस रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर, वायरलेस लॉग और हिरासत से जुड़े समस्त दस्तावेजों को तत्काल सुरक्षित रखने की अपील की है।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया है कि मामले को किसी उपयुक्त पीठ के समक्ष रखा जाए और अनुच्छेद 32 के तहत आवश्यक कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली पुलिस और CRPF से अलग अधिकारियों वाली विशेष जाँच टीम (SIT) या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से अदालत की निगरानी में जाँच कराने की माँग की है।
लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रश्न
ब्रिटास ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि वह यह मामला किसी विशेष संसदीय सुविधा की माँग के रूप में नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े एक गंभीर मुद्दे के रूप में उठा रहे हैं। उनके शब्दों में, यदि मीडिया से बात कर रहे किसी व्यक्ति को जबरन उठाकर ले जाया जा सकता है, तो आम नागरिकों की स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए पुलिस बल का उपयोग और असहमति को कुचलने के लिए राज्य-शक्ति का प्रयोग लोकतांत्रिक मूल्यों के सर्वथा विरुद्ध है। इस पत्र पर CJI, राष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति की प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है।