20 सितंबर 2026
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जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के 10 साल: हरिद्वार में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बाल संरक्षण पर की राज्यस्तरीय समीक्षा

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जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के 10 साल: हरिद्वार में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बाल संरक्षण पर की राज्यस्तरीय समीक्षा

सारांश

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के 10 साल पूरे होने पर हरिद्वार में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्यस्तरीय परामर्श सम्मेलन बुलाया। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता समेत सभी न्यायाधीश उपस्थित रहे और नीतियों को धरातल पर उतारने की ज़रूरत पर एकमत हुए।

मुख्य बातें

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 20 सितंबर 2026 को हरिद्वार में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 के 10 वर्ष पूरे होने पर राज्यस्तरीय परामर्श सम्मेलन आयोजित किया।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता मुख्य अतिथि रहे; पहली बार उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश हरिद्वार में एकत्रित हुए।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने कागज़ों पर बनी नीतियों और उनके व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच की खाई को प्रमुख चुनौती बताया।
जिला जज नरेंद्र दत्त ने पिछले निर्णयों की समीक्षा और बाल गृह से जुड़े सभी न्यायाधीशों की उपस्थिति का उल्लेख किया।
जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने बताया कि उच्च न्यायालय के निर्देशन में हितधारकों के साथ विस्तृत चर्चा की गई।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय और राज्य सरकार के संयुक्त तत्वावधान में 20 सितंबर 2026 को हरिद्वार में एक राज्यस्तरीय परामर्श सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य जुवेनाइल जस्टिस, केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन एक्ट, 2015 के लागू होने के 10 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उसके क्रियान्वयन की समीक्षा करना था। यह पहली बार था जब उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश इस प्रकार के आयोजन के लिए हरिद्वार में एकत्रित हुए।

सम्मेलन का स्वरूप और प्रतिभागी

इस सम्मेलन में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उनके अलावा उच्च न्यायालय और जिला अदालतों के न्यायाधीश, प्रशासनिक अधिकारी तथा विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

सम्मेलन में बच्चों के पुनर्वास, सुरक्षा और कानून के जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष चर्चा हुई। विशेषज्ञों और हितधारकों ने अपने अनुभव साझा करते हुए ठोस रणनीतियाँ प्रस्तावित कीं।

मुख्य न्यायाधीश का संदेश

जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता ने कहा, 'हमारा मुख्य उद्देश्य यह है कि जो बच्चा हमारे राष्ट्र का भविष्य है, उसके बारे में हम चिंतन करें। सभी विभागों की ओर से अच्छा समर्थन मिला।' उनका यह वक्तव्य इस बात का संकेत है कि विभागीय समन्वय को लेकर प्रशासन सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहा है।

नीति को धरातल पर उतारने की ज़रूरत

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने कहा, 'सभी का एक ही मिशन है कि बच्चों का भविष्य अच्छा हो। सरकार की जितनी भी नीतियाँ हैं, वे कागजों पर न रहें, हर बच्चे तक पहुँचें। आमतौर पर देखा जाता है कि कागज पर नीति होती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से उसे लागू नहीं किया जाता।' यह टिप्पणी किशोर न्याय व्यवस्था की उस पुरानी चुनौती को रेखांकित करती है जहाँ कानून और उसके क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई देखी जाती रही है।

हरिद्वार के जिला जज नरेंद्र दत्त ने बताया कि पिछली बैठकों में लिए गए निर्णयों की समीक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा कि बाल गृह और बच्चों से संबंधित अपराधों पर सुनवाई करने वाले सभी न्यायाधीश इस सम्मेलन में उपस्थित रहे। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उच्च न्यायालय द्वारा इस बार आयोजन का स्थान हरिद्वार को चुना जाना उनके लिए विशेष सम्मान की बात है।

जिला प्रशासन की भूमिका

हरिद्वार के जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने बताया कि उच्च न्यायालय के निर्देशन में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के एक दशक के क्रियान्वयन पर विभिन्न हितधारकों के साथ विस्तृत चर्चा की गई। उन्होंने बताया कि इस संवाद से भविष्य की नीतियों को दिशा मिलेगी।

आगे की राह

यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हुआ है जब देशभर में बाल अधिकारों के क्रियान्वयन पर व्यापक पुनर्विचार हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि किशोर न्याय प्रणाली को अधिक संवेदनशील, समयबद्ध और संसाधन-सम्पन्न बनाने की आवश्यकता है। उत्तराखंड में इस तरह की राज्यस्तरीय समीक्षा को एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है, जिसके परिणाम आने वाले महीनों में नीतिगत सुधारों के रूप में सामने आ सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि इन वर्षों में कितने बच्चे वास्तव में इस कानून के लाभ तक पहुँच पाए। न्यायमूर्ति थपलियाल का यह स्वीकारोक्ति कि नीतियाँ कागज़ों पर रहती हैं, व्यवस्था की उस संरचनात्मक कमज़ोरी की ओर इशारा करती है जिसे केवल सम्मेलनों से नहीं, बल्कि जवाबदेही के ठोस तंत्र से दूर किया जा सकता है। हरिद्वार जैसे धार्मिक-पर्यटन केंद्र में बाल श्रम और तस्करी की पुरानी समस्याओं के मद्देनज़र यह चर्चा और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। देखना यह होगा कि यह समीक्षा नीतिगत सुधारों में बदलती है या महज़ एक और परामर्श बनकर रह जाती है।
RashtraPress
20 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 क्या है और इसके 10 साल क्यों अहम हैं?
जुवेनाइल जस्टिस, केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन एक्ट 2015 वह केंद्रीय कानून है जो बच्चों की देखभाल, संरक्षण और किशोर न्याय प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। 2026 में इसके 10 वर्ष पूरे होने पर उत्तराखंड ने इसके क्रियान्वयन की राज्यस्तरीय समीक्षा की, ताकि कमियों को चिह्नित कर भविष्य की रणनीति तय की जा सके।
हरिद्वार सम्मेलन में क्या खास हुआ?
20 सितंबर 2026 को हरिद्वार में आयोजित इस सम्मेलन में पहली बार उत्तराखंड उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश एक साथ उपस्थित रहे। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता के नेतृत्व में जिला न्यायाधीशों, प्रशासनिक अधिकारियों और एनजीओ प्रतिनिधियों ने बाल संरक्षण के व्यावहारिक पहलुओं पर विचार-विमर्श किया।
न्यायमूर्ति थपलियाल ने किस मुख्य समस्या की ओर ध्यान दिलाया?
उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने कहा कि बाल कल्याण की नीतियाँ प्रायः कागज़ों तक सीमित रहती हैं और उनका व्यावहारिक क्रियान्वयन नहीं हो पाता। उन्होंने ज़ोर दिया कि हर नीति हर बच्चे तक पहुँचनी चाहिए।
इस सम्मेलन से आगे क्या उम्मीद की जा सकती है?
जिला जज नरेंद्र दत्त के अनुसार, पिछली बैठकों में लिए गए निर्णयों की समीक्षा की जाएगी और बाल गृह से जुड़े मामलों पर न्यायिक निगरानी को मजबूत किया जाएगा। जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने संकेत दिया कि इस चर्चा के आधार पर भविष्य की नीतियों को नई दिशा मिलेगी।
इस सम्मेलन में किन लोगों ने भाग लिया?
सम्मेलन में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता, न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल सहित अन्य न्यायाधीश, जिला अदालतों के न्यायाधीश, जिलाधिकारी मयूर दीक्षित, प्रशासनिक अधिकारी और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल रहे।
राष्ट्र प्रेस
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