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न्यायपालिका महिलाओं की गरिमा की संरक्षक: NCW अध्यक्ष विजया रहाटकर का बेंगलुरु सम्मेलन में उद्बोधन

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न्यायपालिका महिलाओं की गरिमा की संरक्षक: NCW अध्यक्ष विजया रहाटकर का बेंगलुरु सम्मेलन में उद्बोधन

सारांश

बेंगलुरु में NCW के दो दिवसीय 'महिलाओं के लिए न्याय' सम्मेलन में न्यायिक भाषा, POSH Act क्रियान्वयन और पीड़िता पुनर्वास पर गहन चर्चा हुई। NCW अध्यक्ष विजया रहाटकर ने स्पष्ट कहा — न्यायपालिका महिलाओं की गरिमा की संवैधानिक संरक्षक है।

मुख्य बातें

NCW ने 8-9 अगस्त 2026 को बेंगलुरु में सर्वोच्च न्यायालय और कर्नाटक उच्च न्यायालय के सहयोग से 'महिलाओं के लिए न्याय' दक्षिण क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किया।
उद्घाटन जस्टिस बी.वी.
नागरत्ना ने किया; NCW अध्यक्ष विजया रहाटकर , जस्टिस विभु बाखरू , जस्टिस जयंत बनर्जी और जस्टिस एस.जी.
सम्मेलन में चार तकनीकी सत्र — न्याय तक पहुँच, कार्यस्थल सुरक्षा, मध्यस्थता और डिजिटल सुरक्षा — पर केंद्रित रहे।
POSH Act के प्रभावी क्रियान्वयन और न्यायिक भाषा की संवेदनशीलता पर विशेष जोर दिया गया।
जस्टिस जयंत बनर्जी ने 'वी द वूमेन ऑफ इंडिया' का डिजिटल संस्करण और जस्टिस एस.जी.
पंडित ने घरेलू हिंसा पर पुस्तक का विमोचन किया।
समापन सत्र में जस्टिस वी.
मोहना और जस्टिस लिसा गिल ने न्यायिक प्रक्रिया को सम्मानजनक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने 8 और 9 अगस्त 2026 को बेंगलुरु स्थित कर्नाटक ज्यूडिशियल अकादमी में 'महिलाओं के लिए न्याय' विषयक दक्षिण क्षेत्रीय सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय और कर्नाटक ज्यूडिशियल अकादमी ने संयुक्त रूप से सहयोग किया। दो दिवसीय इस सम्मेलन में दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों के उच्चतम, उच्च और जिला न्यायालयों के न्यायाधीशों ने महिलाओं की न्याय तक पहुँच, कानूनी संरक्षण और सुरक्षा के प्रभावी क्रियान्वयन पर गहन विचार-विमर्श किया।

उद्घाटन सत्र: प्रमुख उपस्थिति और संबोधन

सम्मेलन का उद्घाटन सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने किया। इस अवसर पर NCW अध्यक्ष विजया रहाटकर, कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विभु बाखरू, कर्नाटक ज्यूडिशियल अकादमी के अध्यक्ष जस्टिस जयंत बनर्जी तथा कर्नाटक मेडिएशन सेंटर के अध्यक्ष जस्टिस एस.जी. पंडित विशेष रूप से उपस्थित रहे।

उद्घाटन सत्र में विजया रहाटकर ने कहा कि महिलाओं को न्याय दिलाना सभी संस्थाओं की साझा संवैधानिक जिम्मेदारी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय का अर्थ केवल समय पर निर्णय नहीं, बल्कि पीड़ित के मन में यह विश्वास भी होना चाहिए कि उसे वास्तव में न्याय मिला है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि महिलाओं को होने वाली हानि और उत्पीड़न का स्वरूप पुरुषों की तुलना में भिन्न होता है। उन्होंने रेखांकित किया कि कई मामलों में अपराधी कोई अजनबी नहीं, बल्कि वही व्यक्ति होता है जिस पर महिला सामाजिक या आर्थिक दृष्टि से निर्भर होती है।

महिला अधिकारों पर NCW अध्यक्ष की मुख्य चिंताएँ

रहाटकर ने महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराधों में किसी भी प्रकार के समझौते या सुलह की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की और कहा कि ऐसे मामलों में संवेदनशील एवं न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है। उन्होंने न्यायिक निर्णयों में प्रयुक्त भाषा को लेकर विशेष सावधानी बरतने पर बल दिया, ताकि यौन उत्पीड़न की पीड़िताओं को न्यायिक प्रक्रिया में दोबारा मानसिक आघात न झेलना पड़े।

उन्होंने परिवार और वैवाहिक संबंधों को सुदृढ़ रखने के लिए समय रहते संवाद, परामर्श और हस्तक्षेप की आवश्यकता पर भी जोर दिया। इस संदर्भ में उन्होंने NCW की पहल 'तेरे मेरे सपने' का उल्लेख करते हुए विवाह पूर्व परामर्श और बेहतर संवाद के महत्व को रेखांकित किया।

चार तकनीकी सत्रों में विस्तृत चर्चा

सम्मेलन में चार तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। पहले सत्र में महिलाओं की न्याय तक पहुँच, कानूनी सहायता, महिला आरोपियों के अधिकार तथा यौन उत्पीड़न, एसिड अटैक और मानव तस्करी की पीड़िताओं के पुनर्वास और मुआवजे पर चर्चा हुई।

दूसरे सत्र में कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा और लैंगिक संवेदनशीलता पर विचार-विमर्श हुआ, जिसमें कार्यस्थल यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम (POSH Act) के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया गया। तीसरे सत्र में मध्यस्थता के माध्यम से महिलाओं को न्याय दिलाने पर केंद्रित चर्चा हुई — इसमें वैवाहिक विवाद, बच्चों की अभिरक्षा, संपत्ति एवं उत्तराधिकार विवाद तथा घरेलू हिंसा के मामलों में मध्यस्थता की भूमिका पर विचार किया गया।

चौथा सत्र महिलाओं की समग्र सुरक्षा पर केंद्रित रहा, जिसमें सार्वजनिक स्थानों, घरों और डिजिटल माध्यमों में सुरक्षा, यौन अपराध, मानव तस्करी, घरेलू हिंसा और ऑनलाइन सुरक्षा जैसे विषयों पर विमर्श हुआ। सम्मेलन के दौरान जस्टिस जयंत बनर्जी ने 'वी द वूमेन ऑफ इंडिया' के डिजिटल संस्करण का लोकार्पण किया, जबकि जस्टिस एस.जी. पंडित ने 'ब्रेकिंग द साइलेंस: ए कम्प्लीट गाइड टू डोमेस्टिक वायलेंस एंड द लॉ' पुस्तक का विमोचन किया।

समापन सत्र: न्यायिक भाषा और संवेदनशीलता पर जोर

सम्मेलन का समापन सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश जस्टिस वी. मोहना, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस लिसा गिल और NCW अध्यक्ष विजया रहाटकर की उपस्थिति में हुआ। जस्टिस वी. मोहना ने कहा कि न्यायिक निर्णयों में प्रयुक्त भाषा का समाज और न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है और न्याय की पूरी प्रक्रिया सम्मानजनक एवं संवेदनशील होनी चाहिए।

समापन संबोधन में विजया रहाटकर ने कहा, 'सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक है और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की रक्षा उसकी जिम्मेदारी है। जीवन के अधिकार में गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है। इसलिए न्यायपालिका महिलाओं की गरिमा और अधिकारों की भी संरक्षक है। जब भी कोई अदालत किसी महिला की गरिमा की रक्षा करती है, तब वह संविधान को और मजबूत करती है।'

उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका और अन्य संस्थाओं के मिलकर काम करने से ऐसे भारत के निर्माण का लक्ष्य पूरा किया जा सकता है जहाँ हर महिला को सम्मान, समानता और आशा के साथ न्याय मिले। यह सम्मेलन आगे चलकर महिला न्याय के क्षेत्र में नीतिगत सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा कमरे के बाहर होती है। न्यायिक भाषा पर संवेदनशीलता की बात वर्षों से होती रही है, फिर भी उच्च न्यायालयों के कई फैसलों में पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा करने वाली भाषा देखी जाती है। POSH Act को लागू हुए एक दशक से अधिक हो चुका है, लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र और छोटे संस्थानों में इसकी पहुँच अभी भी सीमित है। सम्मेलन में जो संकल्प लिए गए, उनके क्रियान्वयन की जवाबदेही तय किए बिना ये आयोजन महज एक औपचारिकता बनकर रह सकते हैं।
RashtraPress
9 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बेंगलुरु में 'महिलाओं के लिए न्याय' सम्मेलन क्या था?
यह NCW द्वारा सर्वोच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय और कर्नाटक ज्यूडिशियल अकादमी के सहयोग से 8-9 अगस्त 2026 को बेंगलुरु में आयोजित दो दिवसीय दक्षिण क्षेत्रीय सम्मेलन था। इसमें महिलाओं की न्याय तक पहुँच, सुरक्षा और कानूनी संरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन पर चर्चा हुई।
NCW अध्यक्ष विजया रहाटकर ने सम्मेलन में क्या कहा?
विजया रहाटकर ने कहा कि न्यायपालिका महिलाओं की गरिमा और अधिकारों की संवैधानिक संरक्षक है। उन्होंने महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराधों में समझौते की प्रवृत्ति पर चिंता जताई और न्यायिक भाषा में संवेदनशीलता की आवश्यकता पर जोर दिया।
सम्मेलन में POSH Act पर क्या चर्चा हुई?
दूसरे तकनीकी सत्र में कार्यस्थल यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम (POSH Act) के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया गया। न्यायाधीशों ने लैंगिक संवेदनशीलता और कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपायों पर विचार-विमर्श किया।
सम्मेलन में कौन-से प्रकाशन जारी किए गए?
जस्टिस जयंत बनर्जी ने 'वी द वूमेन ऑफ इंडिया' के डिजिटल संस्करण का लोकार्पण किया। जस्टिस एस.जी. पंडित ने 'ब्रेकिंग द साइलेंस: ए कम्प्लीट गाइड टू डोमेस्टिक वायलेंस एंड द लॉ' पुस्तक का विमोचन किया।
सम्मेलन के समापन सत्र में क्या निष्कर्ष निकले?
जस्टिस वी. मोहना ने कहा कि न्यायिक भाषा का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है और पूरी न्यायिक प्रक्रिया सम्मानजनक होनी चाहिए। रहाटकर ने न्यायपालिका और अन्य संस्थाओं के सहयोग से ऐसे भारत के निर्माण का आह्वान किया जहाँ हर महिला को सम्मान और समानता के साथ न्याय मिले।
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