महिलाओं के लिए न्याय साझा संवैधानिक जिम्मेदारी: NCW अध्यक्ष विजया राहटकर का बेंगलुरु सम्मेलन में आह्वान
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष विजया राहटकर ने बेंगलुरु में आयोजित 'महिलाओं के लिए न्याय' विषयक पहले दक्षिण क्षेत्रीय सम्मेलन में स्पष्ट किया कि महिलाओं को न्याय दिलाना किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि सभी संवैधानिक निकायों का साझा दायित्व है। उन्होंने 9 अगस्त को कहा कि न्याय केवल समय पर मिलना पर्याप्त नहीं — उससे नागरिकों में विश्वास भी उत्पन्न होना चाहिए।
सम्मेलन की पृष्ठभूमि और आयोजन
यह दो दिवसीय सम्मेलन NCW ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय और कर्नाटक न्यायिक अकादमी के सहयोग से आयोजित किया। शनिवार को इसका उद्घाटन सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने किया, जिसमें कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विभू बखरू और अन्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश उपस्थित थे। सम्मेलन में दक्षिणी क्षेत्र के सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों के न्यायाधीश महिलाओं की न्याय तक पहुँच, सुरक्षा, गरिमा और कानूनी सुरक्षा उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन पर विचार-विमर्श के लिए एकत्रित हुए।
राहटकर के मुख्य संदेश
राहटकर ने अपने संबोधन में कहा कि महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों को किसी भी परिस्थिति में समझौते या सुलह के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए। उन्होंने न्यायिक संवेदनशीलता बढ़ाने का आह्वान करते हुए यह भी कहा कि यौन उत्पीड़न पीड़ितों को द्वितीयक आघात से बचाने के लिए न्यायिक भाषा और शब्दावली का सावधानीपूर्वक उपयोग अनिवार्य है।
NCW को एमिकस क्यूरी बनाने का प्रस्ताव
NCW अध्यक्ष ने एक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव रखते हुए कहा कि महिलाओं के अधिकारों और न्याय से जुड़े उपयुक्त मामलों में राष्ट्रीय महिला आयोग को एमिकस क्यूरी (न्यायालय-मित्र) के रूप में सम्मिलित किया जाए। यह सुझाव न्यायपालिका और संवैधानिक निकायों के बीच समन्वय को नई दिशा दे सकता है।
न्यायपालिका और संविधान की भूमिका
राहटकर ने रेखांकित किया कि सर्वोच्च न्यायालय संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करता है और जीवन के अधिकार में गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। उन्होंने कहा, 'जब भी कोई न्यायालय किसी महिला की गरिमा की रक्षा करता है, तो वह संविधान को मजबूत करता है। एक संवेदनशील न्यायालय न्याय में विश्वास पैदा करता है।'
आगे की राह
राहटकर के अनुसार, जब न्यायपालिका और अन्य संस्थाएँ मिलकर काम करती हैं, तो एक ऐसे भारत की नींव रखी जाती है जहाँ हर महिला को गरिमा, समानता और आशा के साथ न्याय मिले। यह सम्मेलन दक्षिण भारत में महिला न्याय के संस्थागत ढाँचे को मज़बूत करने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।