कैलाश खेर: बिजनेस में नुकसान के बाद डिप्रेशन, ऋषिकेश ने दी नई राह और बने सूफी संगीत के सितारे
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सूफी और लोक संगीत को अपनी अनूठी आवाज से नई पहचान देने वाले गायक कैलाश खेर की जीवनयात्रा उतार-चढ़ाव, संघर्ष और असाधारण पुनरुत्थान की कहानी है। जिस मुकाम पर वह आज खड़े हैं, उस तक पहुँचने से पहले उन्हें बिजनेस में भारी नुकसान, गहरे अवसाद और जीवन समाप्त करने जैसे विचारों से गुज़रना पड़ा था।
प्रारंभिक जीवन और संगीत की नींव
कैलाश खेर का जन्म 7 जुलाई 1973 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक कश्मीरी हिंदू परिवार में हुआ। उनके पिता मेहर सिंह खेर स्वयं एक लोक गायक थे, इसलिए बचपन से ही संगीत उनके जीवन का हिस्सा बन गया। घर में गूँजते भजनों और लोकगीतों के बीच पले-बढ़े कैलाश ने छोटी उम्र से ही गायकी के गुर सीखने शुरू कर दिए।
बिजनेस की विफलता और मानसिक संकट
जीवन में कुछ अलग करने की चाह में कैलाश खेर ने एक मित्र के साथ मिलकर हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट का व्यवसाय शुरू किया। यह उद्यम पूरी तरह विफल हो गया और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इस असफलता का असर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर भी गहरा पड़ा — वह गंभीर अवसाद (डिप्रेशन) में चले गए और उनके मन में जीवन समाप्त करने जैसे विचार भी आने लगे।
यह ऐसे समय में आया जब उनके पास न कोई स्थिर आय थी, न भविष्य की कोई स्पष्ट दिशा। गौरतलब है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट और आर्थिक विफलता का यह संयोग कई उभरते कलाकारों के लिए करियर का अंत साबित होता है — लेकिन कैलाश के लिए यह एक नई शुरुआत का द्वार बना।
ऋषिकेश में आत्मिक पुनर्जन्म
इस कठिन दौर से उबरने के बाद कैलाश खेर कुछ समय के लिए ऋषिकेश चले गए। गंगा के किनारे साधु-संतों के सान्निध्य में बिताए उन दिनों में भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक वातावरण ने उन्हें मानसिक शांति दी। यहीं उन्होंने तय किया कि अब वह पूरी तरह संगीत को ही अपना जीवन-लक्ष्य बनाएँगे।
मुंबई में करियर की नई शुरुआत
2001 में कैलाश खेर ने मुंबई में अपने संगीत करियर की नई पारी शुरू की। शुरुआती दिनों में छोटे-मोटे काम और विज्ञापन जिंगल्स से उनका सफर आगे बढ़ा। बड़ा मोड़ आया फिल्म 'अंदाज' के गाने 'रब्बा इश्क ना होवे' से, जिसने उन्हें बॉलीवुड में पहचान दिलाई। इसके बाद 'अल्लाह के बंदे हंस दे' ने उन्हें रातोंरात राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया — उनकी सूफियाना आवाज हर घर में गूँजने लगी।
आगे चलकर 'तेरी दीवानी', 'सैयां', 'बम लहरी' और 'जय जयकारा' जैसे गीतों ने उनकी लोकप्रियता को और बुलंदियों पर पहुँचाया। उन्होंने 'कैलासा' नाम से अपना बैंड भी बनाया, जिसके ज़रिए लोक और सूफी संगीत को आधुनिक रूप में पेश किया गया। इस बैंड के एल्बम देश-विदेश में बेहद सफल रहे और हज़ारों स्टेज शो किए गए।
सम्मान और उपलब्धियाँ
कैलाश खेर को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड सहित कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। उन्होंने हिंदी के साथ-साथ 20 से अधिक भाषाओं में गाने गाए हैं और अपनी आवाज 700 से अधिक गीतों को दी है। उनकी यह यात्रा साबित करती है कि जीवन के सबसे अंधेरे पलों से भी रोशनी की राह निकल सकती है।