शुभा मर्डर केस 2003: कर्नाटक कैबिनेट दोषियों की दया याचिकाओं पर करेगी विचार
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक राज्य कैबिनेट बेंगलुरु के बहुचर्चित 'रिंग रोड शुभा मर्डर केस' में दोषी ठहराई गईं शुभा शंकरनारायण और उनके सह-दोषियों की दया याचिकाओं पर विचार कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन चारों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखे जाने के बाद दोषियों ने राज्यपाल के पास दया याचिकाएँ दायर की थीं, जिन्हें राज्यपाल कार्यालय ने राज्य सरकार के गृह विभाग को उनकी राय जानने के लिए अग्रेषित किया है।
मुख्य घटनाक्रम
गुरुवार, 16 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित कैबिनेट बैठक में इन याचिकाओं पर चर्चा होने की संभावना है। बैठक में यह तय किया जाएगा कि इन याचिकाओं को स्वीकार करने की सिफारिश राज्यपाल को भेजी जाए अथवा खारिज करने की। सरकार की रिपोर्ट मिलने के बाद ही राज्यपाल अंतिम निर्णय ले सकते हैं।
राज्यपाल कार्यालय ने ये याचिकाएँ विशेष रूप से गृह विभाग को भेजी हैं, जो इस प्रक्रिया में राज्य सरकार की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है।
2003 के मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 3 दिसंबर 2003 का है, जब इंटेल में कार्यरत 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर बी.वी. गिरीश की निर्मम हत्या कर दी गई थी। यह घटना शुभा के साथ उनकी सगाई के ठीक चार दिन बाद हुई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शुभा गिरीश को 'हवाई जहाज की लैंडिंग' दिखाने के बहाने आउटर रिंग रोड इलाके में ले गई थी। वहाँ शुभा के साथियों ने लोहे की रॉड से गिरीश पर हमला किया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई।
जाँचकर्ताओं ने पाया कि शुभा परिवार द्वारा तय की गई इस सगाई के विरुद्ध थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उसने अरुण वर्मा, वेंकटेश और दिनेश के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची थी।
अदालती फैसले और सज़ा
शुभा शंकरनारायण, अरुण वर्मा, वेंकटेश और दिनेश — चारों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी उचित ठहराया।
गौरतलब है कि उम्रकैद की सजा बरकरार रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जबरन विवाह से जुड़े सामाजिक और पारिवारिक दबावों को संज्ञान में लिया था। साथ ही, दोषियों को गिरफ्तारी से पहले राज्यपाल के पास दया याचिका दाखिल करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया था।
दया याचिका की प्रक्रिया और आगे की राह
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को दया याचिकाओं पर निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन यह प्रक्रिया मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित होती है। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में दया याचिकाओं के निपटारे में लंबी देरी को लेकर न्यायिक हलकों में चिंता जताई जाती रही है।
राज्य सरकार की सिफारिश इस प्रक्रिया का निर्णायक चरण साबित हो सकती है। यदि कैबिनेट याचिकाएँ खारिज करने की अनुशंसा करती है, तो दोषियों की उम्रकैद यथावत जारी रहेगी।