कर्नाटक SIR विवाद: अभिनेता प्रकाश राज की अगुवाई में सिविल सोसाइटी ने CM शिवकुमार से मांगा हस्तक्षेप
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से 17 अगस्त 2026 को अभिनेता प्रकाश राज की अगुवाई में सिविल सोसाइटी संगठनों के एक प्रतिनिधिमंडल ने बेंगलुरु स्थित विधान सौधा में मुलाकात की और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) में तत्काल हस्तक्षेप की माँग की। प्रतिनिधियों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के चलते बड़ी संख्या में योग्य मतदाताओं के नाम गलत तरीके से सूची से हटाए जा सकते हैं।
मुख्य घटनाक्रम
गौरतलब है कि SIR प्रक्रिया का मुख्य चरण सोमवार, 17 अगस्त को समाप्त हो गया और एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने की यही अंतिम तिथि थी। इसी दिन 'एड्डेलु कर्नाटक' और अन्य सिविल सोसाइटी संगठनों के प्रतिनिधि मुख्यमंत्री से मिले और एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।
प्रतिनिधिमंडल ने दावा किया कि कर्नाटक में देशभर में सबसे अधिक मतदाता सूची से नाम हटाने की घटनाएँ दर्ज हो रही हैं। उनके अनुसार लगभग 1.09 करोड़ मतदाताओं को ASDDO (पहले ही शिफ्ट हो चुके, मृत, डुप्लिकेट या अन्य) श्रेणी में रखा गया है, जिससे विशेष रूप से बेंगलुरु में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की आशंका है।
आँकड़ों की चिंता
प्रतिनिधियों के अनुसार राज्यभर के लगभग 3,000 पोलिंग बूथों पर नाम हटाने की दर 60 प्रतिशत से अधिक हो गई है। यह ऐसे समय में आया है जब चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर पहले से ही कई राज्यों में सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इतनी ऊँची विलोपन दर मतदाता अधिकारों के लिए गंभीर खतरा है।
प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख माँगें
सिविल सोसाइटी संगठनों ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे चुनाव आयोग (ECI) पर दबाव डालें ताकि SIR प्रक्रिया को कम से कम तीन महीने और बढ़ाया जाए तथा इसे पूरा करने के लिए एक वर्ष का समय दिया जाए।
संगठनों ने यह भी माँग की कि 'शिफ्टेड', 'अनुपस्थित' और 'अन्य' श्रेणी के मतदाताओं के नाम तत्काल न हटाए जाएँ। इसके बजाय बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) को घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन करना चाहिए। साथ ही, दूसरी जगह जा चुके मतदाताओं के लिए रजिस्ट्रेशन ट्रांसफर की सुविधा और नए योग्य मतदाताओं के लिए पंजीकरण का अवसर सुनिश्चित किया जाए।
सरकार से बड़े कदम की अपील
प्रतिनिधिमंडल ने कहा, "राज्य सरकार को खुद पहल करनी चाहिए ताकि यह पक्का हो सके कि योग्य मतदाता सूची में बने रहें। सरकारी कर्मचारियों को जानकारी देने के लिए घरों का दौरा करना चाहिए और मतदाताओं की मदद के लिए हेल्पलाइन केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए।"
संगठनों ने यह भी माँग की कि यदि चुनाव आयोग सुधारात्मक कदम उठाने में विफल रहे तो राज्य विधानसभा में इस मुद्दे पर विशेष चर्चा कराई जाए, एक प्रस्ताव पास किया जाए और आवश्यकता पड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जाए।
आगे क्या होगा
मुख्यमंत्री शिवकुमार की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। SIR प्रक्रिया की समय-सीमा समाप्त होने के बाद अब यह देखना होगा कि राज्य सरकार चुनाव आयोग के समक्ष किस रुख के साथ पेश होती है और क्या न्यायिक हस्तक्षेप की नौबत आती है।