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कर्नाटक में बिना सहमति निजी फोटो-वीडियो शेयर करने पर अनिवार्य एफआईआर, 'स्टैंडिंग ऑर्डर 1061' जारी

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कर्नाटक में बिना सहमति निजी फोटो-वीडियो शेयर करने पर अनिवार्य एफआईआर, 'स्टैंडिंग ऑर्डर 1061' जारी

सारांश

कर्नाटक ने डिजिटल यौन शोषण पर कड़ा रुख अपनाया है — बिना सहमति निजी फोटो-वीडियो शेयर करने पर अनिवार्य एफआईआर और 'स्टैंडिंग ऑर्डर 1061' के ज़रिए पुलिस को जवाबदेह बनाया गया है। एफआईआर से इनकार करने वाले अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।

मुख्य बातें

कर्नाटक सरकार ने 26 जून 2026 को बिना सहमति निजी फोटो-वीडियो शेयर करने के सभी मामलों में अनिवार्य एफआईआर का आदेश दिया।
गृह मंत्री प्रियांक खड़गे के निर्देश पर DGP एम.ए.
सलीम ने ' स्टैंडिंग ऑर्डर 1061 ' जारी किया।
फोटो-वीडियो रिकॉर्ड करने की सहमति को साझा करने की सहमति नहीं माना जाएगा — यह BNS 2023 की धारा 77 और IT अधिनियम 2000 पर आधारित है।
एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने वाले पुलिस अधिकारियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
ये कानून लिंग-तटस्थ हैं; महिला पीड़ितों की शिकायतें महिला पुलिस अधिकारियों द्वारा दर्ज की जाएंगी।
पुलिस को सीआईडी साइबर डिवीजन के साथ समन्वय कर डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के निर्देश।

कर्नाटक सरकार ने 26 जून 2026 को राज्य की समस्त पुलिस को कड़े निर्देश जारी किए कि किसी भी व्यक्ति की निजी या अंतरंग तस्वीरें एवं वीडियो उसकी सहमति के बिना प्रकाशित या प्रसारित करने के हर मामले में बिना किसी देरी के एफआईआर दर्ज की जाएकर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे के निर्देश पर पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक एम.ए. सलीम ने 'स्टैंडिंग ऑर्डर 1061' के तहत विस्तृत दिशानिर्देश राज्यभर में लागू किए हैं।

मुख्य निर्देश और कानूनी आधार

दिशानिर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि फोटो या वीडियो रिकॉर्ड करने की सहमति का अर्थ उसे साझा या प्रसारित करने की सहमति कदापि नहीं है। यदि पीड़ित ने शुरुआत में रिकॉर्डिंग की अनुमति दी भी हो, तो स्पष्ट सहमति के बिना उसे फैलाना संज्ञेय अपराध माना जाएगा। यह स्थिति भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 77 के स्पष्टीकरण 2 और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 के प्रावधानों पर आधारित है। गौरतलब है कि ये कानून लिंग-तटस्थ (जेंडर-न्यूट्रल) हैं, यानी पुरुष और महिला दोनों पीड़ितों पर समान रूप से लागू होते हैं।

संवैधानिक अधिकार और पुलिस की जवाबदेही

गृह मंत्री खड़गे ने स्पष्ट किया कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है, जिसकी पुष्टि सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले के ऐतिहासिक फैसले में की थी। उन्होंने कहा, "ऐसे संवेदनशील मामलों में जो भी पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से इनकार करेगा या 'पहले से सहमति' जैसे गलत आधार का हवाला देकर पंजीकरण में देरी करेगा, उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।" खड़गे ने सभी पुलिस आयुक्तों, रेंज पुलिस महानिरीक्षकों (IGP) और पुलिस अधीक्षकों (SP) को इन निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा है।

साइबर अपराधों पर सख्त कार्रवाई

पुलिस को निर्देश दिया गया है कि ब्लैकमेल, सेक्सटॉर्शन और रिवेंज पोर्नोग्राफी से जुड़ी शिकायतें मिलते ही तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए। इसके साथ ही, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ऐसी गैर-कानूनी सामग्री हटवाने के लिए 'सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021' के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य मध्यवर्तियों को तुरंत नोटिस जारी करने का आदेश दिया गया है। जांच अधिकारियों को सीआईडी साइबर डिवीजन के साथ समन्वय कर डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के भी निर्देश हैं।

पीड़ितों की सुरक्षा और संवेदनशीलता

आदेश में पीड़ितों की पहचान को पूर्णतः गोपनीय रखने पर विशेष जोर दिया गया है। पुलिस को शिकायतकर्ताओं के साथ संवेदनशीलता से पेश आने और जहाँ भी संभव हो, महिला पीड़ितों की शिकायतें महिला पुलिस अधिकारियों द्वारा दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में साइबर अपराध, विशेषकर डिजिटल यौन शोषण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इन दिशानिर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन से कर्नाटक एक मिसाल कायम कर सकता है जिसे अन्य राज्य भी अपना सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा ज़िला स्तर के थानों में होगी जहाँ ऐसे मामलों में पीड़ितों को अक्सर 'समझौता करने' की सलाह दी जाती है। 'स्टैंडिंग ऑर्डर 1061' एफआईआर से इनकार करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई का प्रावधान करता है, लेकिन इस जवाबदेही तंत्र की निगरानी कौन करेगा, यह स्पष्ट नहीं है। यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार साइबर अपराधों में महिलाओं के विरुद्ध मामले लगातार बढ़ रहे हैं। बिना संवेदनशीलता प्रशिक्षण और पर्याप्त महिला अधिकारियों की तैनाती के, यह निर्देश एक और अधूरा सुधार बनकर रह सकता है।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक में बिना सहमति निजी फोटो-वीडियो शेयर करने पर क्या कानूनी कार्रवाई होगी?
कर्नाटक पुलिस को ऐसे हर मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। यह कार्रवाई भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 77 और IT अधिनियम 2000 के तहत होगी, जो इसे एक संज्ञेय अपराध मानते हैं।
क्या पहले से दी गई सहमति से शेयरिंग वैध मानी जाएगी?
नहीं। 'स्टैंडिंग ऑर्डर 1061' स्पष्ट करता है कि फोटो या वीडियो रिकॉर्ड करने की सहमति का अर्थ उसे साझा करने की सहमति नहीं है। स्पष्ट अनुमति के बिना प्रसारित करना अपराध है, भले ही रिकॉर्डिंग सहमति से हुई हो।
यदि पुलिस एफआईआर दर्ज करने से इनकार करे तो क्या होगा?
गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने स्पष्ट किया है कि एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने वाले या देरी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। सभी पुलिस आयुक्तों, IGP और SP को इसकी निगरानी का जिम्मा सौंपा गया है।
क्या यह कानून केवल महिलाओं पर लागू होता है?
नहीं, ये प्रावधान लिंग-तटस्थ (जेंडर-न्यूट्रल) हैं और पुरुष तथा महिला दोनों पीड़ितों पर समान रूप से लागू होते हैं। हालाँकि, महिला पीड़ितों की शिकायतें जहाँ संभव हो महिला पुलिस अधिकारियों द्वारा दर्ज की जाएंगी।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ऐसी सामग्री कैसे हटाई जाएगी?
पुलिस को IT (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और मध्यवर्तियों को तत्काल नोटिस जारी करने का निर्देश है। जांच में तकनीकी सहायता के लिए सीआईडी साइबर डिवीजन से समन्वय अनिवार्य है।
राष्ट्र प्रेस
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