काशी के प्राचीन मंदिर में मां महिषासुर मर्दिनी का अद्भुत स्वरूप, दिन में तीन बार बदलता है 'स्वप्नेश्वरी'
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नई दिल्ली, 6 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में अनगिनत प्राचीन मंदिर हैं। इन मंदिरों की महिमा अद्वितीय और चमत्कारी है। काशी के हर कोने में भक्ति और चमत्कार की कहानियाँ बसी हुई हैं। इन मंदिरों में अनेक देवी-देवताओं की उपासना की जाती है, जो यहां की आस्था को और भी मजबूत बनाते हैं। इनमें से एक प्राचीन और विशेष मंदिर है मां महिषासुर मर्दिनी का, जहां माता स्वप्नेश्वरी का स्वरूप दिन में तीन बार बदलता है।
यह मंदिर भद्र वन, अर्थात भदैनी क्षेत्र में स्थित है। यहां मां को स्वप्नेश्वरी के नाम से भी पूजा जाता है। मंदिर के पुजारी धनंजय पाण्डेय के अनुसार, माता का यह रूप दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय में वर्णित है, जहां उन्होंने महिषासुर का वध किया था। मंदिर की मूर्ति स्वयंभू है और यह भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए जानी जाती है।
पुजारी बताते हैं कि माता का रूप दिन में तीन बार बदलता है। सुबह वे सौम्य और बाल रूप में दिखती हैं, दोपहर में यौवन रूप में और शाम होते ही उनका रौद्र रूप प्रकट हो जाता है। इस अद्भुत परिवर्तन को देखकर भक्त मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। मां स्वप्नेश्वरी को मालपुआ, दही-बर्फी और नारियल का भोग अर्पित किया जाता है। लाल गुड़हल की माला और श्रृंगार की सामग्री चढ़ाने का विशेष महत्व है।
मान्यता है कि जो भक्त लगातार 41 दिन तक माता की आरती में शामिल होता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। एक और खास मान्यता इस मंदिर से जुड़ी है। जो भक्त रात भर मंदिर में रहकर आराधना करते हैं और वहीं सोते हैं, माता उनके सपनों में आकर उनकी मनोकामना पूरी होने का संकेत देती हैं। इसी कारण उन्हें स्वप्नेश्वरी कहा जाता है।
काशी के इस अद्भुत मंदिर में मां महिषासुर मर्दिनी न केवल महिषासुर का संहार करने वाली शक्ति के रूप में पूजी जाती हैं, बल्कि भक्तों के सपनों में आकर उन्हें मार्गदर्शन देने वाली मां के रूप में भी जानी जाती हैं। भक्तों का मानना है कि यहां आने से मन की सभी मुरादें पूरी होती हैं।
मंदिर परिसर में भैरव बाबा, भोलेनाथ, हनुमान जी और गणेश भगवान के भी छोटे मंदिर हैं। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष भीड़ देखने को मिलती है। महिलाएं कीर्तन-भजन करती हैं और दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। नवमी के दिन भंडारा आयोजित होता है और भक्तों को प्रसाद बांटा जाता है।
श्रद्धालु प्रभुनाथ त्रिपाठी बताते हैं कि मां महिषासुर मर्दिनी कृपालु हैं। उनके दर्शन से ही भक्तों को शांति और बल मिलता है। महिषासुर नामक राक्षस का वध करने वाली माता का एक और नाम 'स्वप्नेश्वरी' देवी भी है। उन्होंने कहा, "महिषासुर मर्दिनी का दर्शन करने का सौभाग्य भक्तों को मिलता आया है। माता बहुत कृपालु हैं। शक्ति के इस रूप का एक और नाम 'स्वप्नेश्वरी' भी है। मान्यता है कि जो भी भक्त दिन-रात मंदिर में रहकर माता की आराधना करता है और रात्रि में वहीं पर शयन करता है, माता उसके स्वप्न में आती हैं और मांगी गई मनोकामना के बारे में बताती हैं।"
मंदिर सेवा समिति के उपाध्यक्ष राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि पूरे वर्ष भक्तों की अच्छी खासी भीड़ रहती है, लेकिन नवरात्रि में मंदिर में अलग ही ऊर्जा और भक्ति का माहौल छा जाता है। यह प्राचीन मंदिर वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से लगभग 5 किलोमीटर दूर लोलार्क कुंड क्षेत्र में स्थित है। यहां पहुंचने के लिए ऑटो, रिक्शा या कैब आसानी से उपलब्ध हैं।