केरल DGP श्रीजीत को राहत: हाई कोर्ट में सरकार बोली — सतर्कता जांच की जरूरत नहीं
सारांश
मुख्य बातें
केरल उच्च न्यायालय में 20 अगस्त 2026 को राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि डीजीपी एस. श्रीजीत, आईपीएस के विरुद्ध किसी सतर्कता जांच की आवश्यकता नहीं है। श्रीजीत पर आरोप था कि उन्होंने बिना अनुमति दुबई की यात्रा की और कथित तौर पर उनसे जुड़े एक निजी उद्यम के उद्घाटन में शामिल हुए। यह मामला केरल उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की पीठ के समक्ष विचाराधीन था।
मुख्य घटनाक्रम
गृह एवं सतर्कता विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव मिन्हाज आलम ने न्यायमूर्ति बदरुद्दीन के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर बताया कि उन्होंने अदालत के निर्देशों का अनुपालन किया है और पाया है कि फिलहाल सतर्कता जांच की कोई आवश्यकता नहीं है। अदालत ने इस पर कार्यवाही समाप्त कर दी, साथ ही याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उचित उपाय अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान की।
गौरतलब है कि मिन्हाज आलम को इसलिए व्यक्तिगत रूप से तलब किया गया था क्योंकि आरोप था कि सरकार ने इस मामले में पहले के अदालती आदेश का उल्लंघन किया था।
आरोपों की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि डीजीपी श्रीजीत ने आकस्मिक अवकाश लेकर और विदेश यात्रा की पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना दुबई का दौरा किया। इसके अतिरिक्त, उन पर यह भी आरोप था कि वे एक ऐसे निजी उद्यम के उद्घाटन में शामिल हुए जो कथित तौर पर उनसे संबद्ध था। सतर्कता विभाग की अनुपालन रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया था कि श्रीजीत के विरुद्ध लगाए गए आरोप झूठे और परेशान करने वाले थे — इसी रिपोर्ट को याचिकाकर्ता ने अदालत में चुनौती दी थी।
सुनवाई प्रक्रिया पर अदालत की टिप्पणी
इस मामले में उच्च न्यायालय ने पहले यह निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता को श्रीजीत की अनुपस्थिति में एक स्वतंत्र व्यक्तिगत सुनवाई प्रदान की जाए। अदालत ने कहा था कि शिकायतकर्ता को उस व्यक्ति की उपस्थिति में सुनवाई में भाग लेने के लिए बाध्य करना जिसके विरुद्ध आरोप लगाए गए हों, एक निष्पक्ष प्रक्रिया नहीं मानी जा सकती। याचिकाकर्ता ने भी संयुक्त सुनवाई में भाग लेने से इनकार करते हुए अधिकारियों के समक्ष स्वतंत्र रूप से उपस्थित होने की इच्छा जताई थी।
अधिकारियों को अदालत की कड़ी चेतावनी
न्यायमूर्ति बदरुद्दीन ने सरकारी अधिकारियों को अदालती आदेशों के अनुपालन के संदर्भ में कड़ी चेतावनी दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि बार-बार लापरवाही बरतने पर अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष पेश होना पड़ सकता है और अवमानना की कार्यवाही भी हो सकती है। अदालत ने मौखिक रूप से यह भी निर्देश दिया कि जब भी किसी आदेश की आवश्यकता हो, अधिकारी क्लर्कों या चपरासियों को भेजने के बजाय उचित याचिकाएं दाखिल करें — भविष्य में ऐसी लापरवाही पर जुर्माना लगाने की चेतावनी भी दी गई।
आगे की राह
हालांकि न्यायालय ने वर्तमान कार्यवाही समाप्त कर दी है, याचिकाकर्ता को कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता बरकरार है। उल्लेखनीय है कि श्रीजीत को हाल ही में डीजीपी के पद पर पदोन्नत किया गया है। सरकार के इनकार के बावजूद याचिकाकर्ता इस मामले को आगे ले जा सकते हैं, और यह देखना होगा कि वे किस कानूनी मंच का सहारा लेते हैं।