केरल में मैंग्रोव क्षेत्र में एक दशक बाद वृद्धि, बंगाल की खाड़ी में समुद्री हीटवेव की 100 से अधिक घटनाएँ: अध्ययन
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) के एक नए अध्ययन के अनुसार, केरल में 2017 से 2026 के बीच मैंग्रोव (तटीय दलदली वनस्पति) के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह उस राज्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है, जहाँ पिछले पाँच दशकों में मैंग्रोव का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका था। हालाँकि, उसी संगोष्ठी में प्रस्तुत एक अन्य अध्ययन ने चिंताजनक तस्वीर पेश की — बंगाल की खाड़ी में 1982 से 2023 के बीच समुद्री हीटवेव (मरीन हीटवेव) की 100 से अधिक घटनाएँ दर्ज की गई हैं।
मैंग्रोव पुनर्विकास: क्या कहता है अध्ययन
सीएमएफआरआई के अध्ययन में केरल के तटीय जिलों में मैंग्रोव विस्तार के बदलावों को मापने के लिए उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों का उपयोग किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि 2017 से 2026 के दौरान कुल मिलाकर मैंग्रोव क्षेत्र में वृद्धि हुई है। अध्ययन के निष्कर्ष 6 नवंबर 2026 को कोच्चि में आयोजित मत्स्य पालन और रिमोट सेंसिंग पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए।
गौरतलब है कि यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब केरल के तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर दशकों से विकास गतिविधियों और अतिक्रमण का दबाव रहा है। अध्ययन के अनुसार, उपग्रह आधारित निगरानी प्रणाली मैंग्रोव संरक्षण प्रयासों को सटीक दिशा देने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
मैंग्रोव का तटीय पारिस्थितिकी में महत्व
मैंग्रोव वन तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा में बहुआयामी भूमिका निभाते हैं। ये मछलियों और समुद्री जीवों के प्रजनन तथा शुरुआती विकास के लिए प्राकृतिक आश्रय स्थल के रूप में काम करते हैं। इसके साथ ही, चक्रवात और तूफानी ज्वार जैसी आपदाओं से तटीय बस्तियों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
इसके अतिरिक्त, मैंग्रोव वायुमंडल से कार्बन सोखने में सक्षम हैं, जिससे ये जलवायु परिवर्तन को कम करने की वैश्विक कोशिशों में भी योगदान देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मैंग्रोव का पुनर्विकास न केवल जैव विविधता के लिए, बल्कि तटीय समुदायों की आजीविका और सुरक्षा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बंगाल की खाड़ी में समुद्री हीटवेव का बढ़ता खतरा
बांग्लादेश की शाहजलाल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, बंगाल की खाड़ी में 1982 से 2023 के बीच समुद्री हीटवेव की 100 से अधिक घटनाएँ दर्ज की गई हैं। अध्ययन में पाया गया कि इन घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि हुई है, और वर्ष 2000 के बाद यह रुझान विशेष रूप से तेज हुआ है।
वर्ष 2016 में स्थिति विशेष रूप से गंभीर रही, जब असामान्य रूप से तीव्र समुद्री हीटवेव लंबे समय तक बनी रहीं। अध्ययन के मुताबिक, इन घटनाओं की सर्वाधिक संख्या अगस्त और नवंबर में दर्ज की गई, जबकि सबसे तीव्र घटनाएँ आमतौर पर मानसून-पूर्व महीनों में सामने आईं।
समुद्री हीटवेव उस स्थिति को कहते हैं जब समुद्र का तापमान लगातार कई दिनों तक सामान्य से असामान्य रूप से अधिक बना रहता है। ऐसी परिस्थितियाँ समुद्री जीवों को नुकसान पहुँचाती हैं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगाड़ सकती हैं।
चक्रवातों पर असर की चेतावनी
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि समुद्री हीटवेव की बढ़ती आवृत्ति और अवधि का असर चरम मौसमी घटनाओं पर भी पड़ सकता है। इससे उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की तीव्रता प्रभावित होने की आशंका जताई गई है, जो भारत और बांग्लादेश के तटीय क्षेत्रों के लिए विशेष चिंता का विषय है।
यह ऐसे समय में आया है जब हिंद महासागर क्षेत्र में चक्रवाती गतिविधियाँ पहले से ही बढ़ी हुई हैं और वैज्ञानिक समुद्री तापमान वृद्धि को इनकी बढ़ती तीव्रता से जोड़ रहे हैं।
संगोष्ठी और आयोजन
दोनों अध्ययन कोच्चि में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए। इस संगोष्ठी का संयुक्त आयोजन ट्रेवर प्लैट साइंस फाउंडेशन, कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (कुसैट) के रासायनिक समुद्र विज्ञान विभाग, सीएमएफआरआई और मरीन बायोलॉजिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने किया। इन निष्कर्षों से तटीय नीति-निर्माण और मत्स्य पालन क्षेत्र पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।