केरल में ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 का विरोध, एलजीबीटीआईक्यू+ समुदाय ने इसे भेदभावपूर्ण बताया

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
केरल में ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 का विरोध, एलजीबीटीआईक्यू+ समुदाय ने इसे भेदभावपूर्ण बताया

सारांश

केरल के एलजीबीटीआईक्यू+ समुदाय ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स संशोधन विधेयक 2026 का विरोध करते हुए इसे भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक करार दिया है। यह विधेयक आत्म-निर्धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को हटा रहा है, जिससे चिंता और तनाव का माहौल बढ़ रहा है।

मुख्य बातें

ट्रांसजेंडर पर्सन्स संशोधन विधेयक 2026 का विरोध।
आत्म-निर्धारित लैंगिक पहचान का अधिकार हटाना।
समुदाय में चिंता और तनाव का माहौल।
बिना अध्ययन के तैयार किया गया विधेयक।
राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर विरोध के कदम।

तिरुवनंतपुरम, 26 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। केरल में ट्रांसजेंडर और एलजीबीटीआईक्यू+ समुदाय ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक 2026 का तीव्र विरोध किया है। जॉइंट एक्शन कमेटी ऑन ट्रांसजेंडर एंड एलजीबीटीआईक्यू+ राइट्स इन केरलम सहित विभिन्न राष्ट्रीय और सामुदायिक संगठनों ने इसे "पिछड़ा, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक" बताया है।

समुदाय की मुख्य आपत्ति इस विधेयक में आत्म-निर्धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को हटाने से जुड़ी है। नए प्रावधान के अनुसार, यह अधिकार व्यक्ति से लेकर राज्य द्वारा नियुक्त मेडिकल बोर्ड को दिया जा सकता है, जिससे प्रमाणन की प्रक्रिया अधिक जटिल और दखल देने वाली बन सकती है।

समिति का कहना है कि यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित गरिमा, स्वायत्तता और निजता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मानकों तथा मेडिकल प्रथाओं के खिलाफ है।

विधेयक में “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा को सीमित करने पर भी सवाल उठाए गए हैं। इससे ट्रांस पुरुष, नॉन-बाइनरी, जेंडरक्वियर और अन्य पहचान रखने वाले लोग कानूनी रूप से बाहर हो सकते हैं।

समिति ने यह भी बताया कि यह विधेयक बिना पर्याप्त अध्ययन, विश्वसनीय आंकड़ों और संबंधित पक्षों—जैसे नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स—से सार्थक चर्चा के बिना तैयार किया गया है।

एक अन्य चिंता अस्पष्ट दंडात्मक प्रावधानों से जुड़ी है, जिनके दुरुपयोग की आशंका जताई गई है। समिति का कहना है कि इनका इस्तेमाल एक्टिविस्ट, डॉक्टरों, शिक्षकों, परिवारों और सहयोगी समूहों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

गौरतलब है कि केरल 2015 में ट्रांसजेंडर नीति लागू करने वाला पहला राज्य बना, जहां कई कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से ट्रांसजेंडर समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया गया। समिति ने चेतावनी दी कि राष्ट्रीय स्तर पर पहचान सीमित करने से इन योजनाओं का लाभ प्रभावित होगा और वर्षों की प्रगति को पीछे ले जा सकता है।

समुदाय का कहना है कि इस विधेयक के कारण देशभर में एलजीबीटीआईक्यू+ लोगों में चिंता, तनाव और डर का माहौल बढ़ रहा है, जिससे आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य संकट का खतरा भी बढ़ सकता है।

विरोध के तहत जॉइंट एक्शन कमेटी ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई कदम उठाने का निर्णय लिया है, जिसमें केरल में राज्य स्तरीय सम्मेलन आयोजित करना शामिल है, जिसमें समुदाय के लोग, विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर आगे की रणनीति तय करेंगे।

साथ ही, विधेयक को संवैधानिक चुनौती देने और न्यायिक हस्तक्षेप की संभावनाओं पर विचार के लिए व्यापक कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की योजना भी है।

समिति ने कहा, "यह सिर्फ एक कानून में बदलाव नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या ट्रांसजेंडर लोग संविधान के तहत समान नागरिक बने रहेंगे या नहीं। पिछले दशक में भारत ने प्रगति की है, लेकिन यह विधेयक हमें पीछे ले जा सकता है।"

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह समाज में समानता और अधिकारों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण लड़ाई है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ट्रांसजेंडर समुदाय को संविधान के तहत समान अधिकार मिले।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ट्रांसजेंडर पर्सन्स संशोधन विधेयक 2026 का मुख्य मुद्दा क्या है?
विधेयक का मुख्य मुद्दा आत्म-निर्धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को हटाना है, जो ट्रांसजेंडर समुदाय को प्रभावित करेगा।
केरल में इस विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है?
एलजीबीटीआईक्यू+ समुदाय का मानना है कि यह विधेयक भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है, जिससे उनकी पहचान और अधिकारों पर खतरा है।
क्या इस विधेयक का प्रभाव पूरे देश पर पड़ेगा?
हाँ, यदि यह विधेयक पारित होता है, तो इसका प्रभाव पूरे देश के ट्रांसजेंडर समुदाय पर पड़ेगा और उनकी कल्याणकारी योजनाओं को बाधित कर सकता है।
समुदाय ने विरोध के लिए क्या कदम उठाए हैं?
समुदाय ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई कदम उठाने का निर्णय लिया है, जिसमें सम्मेलन और कानूनी प्रक्रिया शामिल है।
यह विधेयक कैसे तैयार किया गया है?
समिति का कहना है कि यह विधेयक बिना पर्याप्त अध्ययन और संबंधित पक्षों से सार्थक चर्चा के बिना तैयार किया गया है।
राष्ट्र प्रेस