सत्यजीत रे की 'पाथेर पांचाली': खिड़की पर बैठे सफेद उल्लू के बाद बदली किस्मत, 3 साल बाद रिलीज हुई अटकी फिल्म
सारांश
Key Takeaways
महान बंगाली निर्देशक सत्यजीत रे की पहली फिल्म 'पाथेर पांचाली' का सफर जितना ऐतिहासिक रहा, उतना ही संघर्षपूर्ण भी। पैसों की कमी से ठप हुई इस फिल्म की शूटिंग तब दोबारा शुरू हुई जब पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय ने रे को लोन दिया — और लोककथाओं में इस बदलाव का श्रेय रे की खिड़की पर बैठे एक दुर्लभ सफेद उल्लू को दिया जाता है। 3 मई, 1955 को न्यूयॉर्क के म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट में प्रीमियर के बाद यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सर्वकालिक महान कृतियों में शुमार हो गई।
कला की विरासत और फिल्म की राह
सत्यजीत रे का जन्म 2 मई, 1921 को कलकत्ता के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। उनके दादा उपेंद्र किशोर रे एक प्रतिष्ठित लेखक, चित्रकार, वायलिन वादक और संगीतकार थे — कला उन्हें विरासत में मिली थी। रे ने अपने करियर की शुरुआत एक ग्राफिक्स डिजाइनर के रूप में की, लेकिन इटैलियन फिल्म 'बाइसिकल थीव्स' देखने के बाद उन्होंने निर्देशक बनने का निर्णय लिया। गौरतलब है कि वे मुख्यतः अंग्रेजी फिल्मों के दर्शक थे, फिर भी इस एक इटैलियन फिल्म ने उनकी सोच को पूरी तरह बदल दिया।
संघर्ष और पैसों की तंगी
रे ने बंगाली भाषा में 'पाथेर पांचाली' के निर्देशन और निर्माण का फैसला किया। फिल्म के लिए पहले उन्होंने अपनी जमापूंजी लगाई और फिर पत्नी के गहने तक गिरवी रख दिए। उन्होंने फिल्म-प्रेमी उत्साहियों की एक टीम बनाई, जिन्हें फिल्म निर्माण का तकनीकी अनुभव नहीं था। लोकेशन की तलाश से लेकर शूटिंग तक अनेक कठिनाइयाँ आईं और 1 साल बाद ही फिल्म की शूटिंग पैसों की कमी के कारण ठप हो गई।
सफेद उल्लू और किस्मत का मोड़
रे की पुस्तक 'माई इयर्स विद अपू' में वर्णित एक रोचक किस्से के अनुसार, एक दिन जब उन्होंने खिड़की का दरवाजा खोला तो बाहर एक दुर्लभ सफेद उल्लू बैठा था। उस वक्त सफेद उल्लू का दिखना अत्यंत दुर्लभ माना जाता था। चूँकि उल्लू माँ लक्ष्मी का प्रतीक है, गाँव की भीड़ उसे देखने उमड़ पड़ी और लोगों में ईर्ष्या होने लगी। वह उल्लू लगातार कई दिनों तक उसी जगह बैठा रहा।
इसी दौरान पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय ने रे को मिलने के लिए बुलाया और फिल्म के लिए लोन स्वीकृत किया। इसके बाद 'पाथेर पांचाली' की शूटिंग दोबारा शुरू हुई। लोगों ने इस सुखद संयोग का श्रेय उस सफेद उल्लू को दिया।
ऐतिहासिक रिलीज और अंतरराष्ट्रीय पहचान
3 मई, 1955 को न्यूयॉर्क के म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट में 'पाथेर पांचाली' का विश्व प्रीमियर हुआ। उसी वर्ष अगस्त में यह फिल्म भारत में रिलीज हुई — यानी शूटिंग शुरू होने के करीब 3 साल बाद। फिल्म ने 1956 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में 'सर्वश्रेष्ठ मानवीय दस्तावेज' पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते।
भारतीय सिनेमा पर स्थायी छाप
'पाथेर पांचाली' ने न केवल सत्यजीत रे के शानदार करियर की नींव रखी, बल्कि भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया। यह वह दौर था जब भारतीय फिल्में अंतरराष्ट्रीय फेस्टिवलों में शायद ही जगह पाती थीं — रे ने यह धारणा हमेशा के लिए बदल दी। आज भी यह फिल्म सर्वकालिक महान सिनेमाई कृतियों में गिनी जाती है और दुनिया भर के फिल्म विद्यार्थियों के लिए एक अनिवार्य पाठ है।