कोर्काई और पूमपुहार अंडरवॉटर सर्वे रिपोर्ट फरवरी 2027 तक, प्राचीन तमिल समुद्री इतिहास के नए रहस्य खुलेंगे
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के पुरातत्व विभाग ने कोर्काई और पूमपुहार में किए गए पानी के नीचे के सर्वे की रिपोर्ट फरवरी 2027 तक राज्य सरकार को सौंपने की तैयारी पूरी कर ली है। इन रिपोर्टों के आधार पर संगम-युगीन प्राचीन बंदरगाहों और हिंद महासागरीय व्यापार के नए साक्ष्य सामने आने की उम्मीद है। अधिकारियों के अनुसार, यह खोज तमिल समुद्री सभ्यता की वैश्विक पहचान को नई ऊँचाई दे सकती है।
सर्वे में क्या शामिल है
रिपोर्ट में कोर्काई-अजगनकुलम तट के पास किए गए सोनार सर्वे का विस्तृत विश्लेषण और मयिलादुथुराई जिले के पूमपुहार में जारी अंडरवॉटर खोज के तीसरे चरण के परिणाम शामिल होंगे। कोर्काई में सर्वे लगभग दो वर्ष पूर्व इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी के सहयोग से संपन्न हुआ था, जिसमें मल्टी-बीम इको साउंडर्स, साइड-स्कैन सोनार सिस्टम और सब-बॉटम प्रोफाइलर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया था।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि साइड-स्कैन सोनार सर्वे का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है। अब रिपोर्ट की समीक्षा और अनुमोदन के बाद पुरातत्वविद समुद्र तल पर मिली संभावित संरचनाओं और कलाकृतियों की पुष्टि हेतु डाइविंग ऑपरेशन आरंभ करेंगे।
डाइविंग क्यों ज़रूरी है
अधिकारियों ने बताया कि केवल सोनार छवियों के आधार पर यह तय करना संभव नहीं है कि समुद्र तल पर मिली संरचनाएँ किसी प्राचीन बंदरगाह के अवशेष हैं या नहीं। इसके लिए डाइविंग के माध्यम से प्रत्यक्ष जाँच आवश्यक है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि उन संरचनाओं में जहाज का मलबा, इमारतों के अवशेष या अन्य पुरातात्विक वस्तुएँ हैं या नहीं।
गौरतलब है कि पूरे प्रोजेक्ट का अभी केवल लगभग 10 प्रतिशत कार्य पूरा हुआ है। शुरुआती सर्वे में पूमपुहार में अधिक पुरातात्विक संभावनाएँ नजर आने के बाद उसे प्राथमिकता के आधार पर खोज के लिए चुना गया था।
पूमपुहार में पिछली खोजें
पूमपुहार में पूर्व में की गई खोजों में मिट्टी के बर्तन और जहाज के मलबे मिले थे, परंतु उनका फोटोग्राफिक दस्तावेज़ीकरण बेहद सीमित रहा। नए ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य समुद्र तल पर मिली वस्तुओं का बेहतर फोटोग्राफिक और दृश्य अभिलेखीकरण करना है, जिससे भावी शोध के लिए ठोस आधार तैयार हो सके।
कोर्काई का ऐतिहासिक महत्त्व
कोर्काई संगम युग के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बंदरगाहों में से एक था और पांड्य साम्राज्य का एक प्रमुख समुद्री केंद्र। इसके रोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध थे और यह मोती निकालने के व्यवसाय के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था। 1968-69 में यहाँ की गई खुदाई में कलाकृतियाँ, शंख काटने की कार्यशालाएँ, मोती वाले सीप को प्रोसेस करने की सुविधाएँ, बुनाई और शिकार से जुड़े टेराकोटा लैंप तथा हड्डी के नुकीले औजार मिले थे।
विशेषज्ञों की राय और आगे की राह
पुरातत्वविदों का मानना है कि अंडरवॉटर जाँच से इन खोजों को और बल मिलेगा तथा प्राचीन तमिल समुद्री व्यापार, नौवहन और हिंद महासागर में व्यापारिक संबंधों के बारे में नई जानकारियाँ सामने आ सकती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब दुनियाभर में समुद्री पुरातत्व को लेकर रुचि बढ़ रही है और भारत अपनी प्राचीन सभ्यताओं की समुद्री विरासत को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में सक्रिय है। रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद डाइविंग ऑपरेशन और गहरे अन्वेषण का रास्ता खुलेगा।