केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा साहूकर निलंबित: बेटियों की भर्ती में कथित अनियमितता, राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट जाँच की सिफारिश की
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 13 जुलाई 2026 को कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) के अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस. साहूकर को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। यह कार्रवाई उनकी दो बेटियों के 'इंडस्ट्रियल एक्सटेंशन ऑफिसर' पद पर कथित गैरकानूनी चयन और फर्जी आय प्रमाण पत्र के ज़रिये आरक्षण लाभ लेने के आरोपों के बाद की गई है। राज्यपाल सचिवालय ने साथ ही भारत के राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि संविधान के अनुच्छेद 317(1) के तहत यह मामला सर्वोच्च न्यायालय को जाँच के लिए भेजा जाए।
मुख्य आरोप और घटनाक्रम
राज्यपाल सचिवालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, शिवशंकरप्पा एस. साहूकर पर आरोप है कि जब उनकी दो बेटियाँ केपीएससी की चयन प्रक्रिया में शामिल हुईं, तब उन्होंने न तो स्वयं को उस प्रक्रिया से अलग किया और न ही हितों के संभावित टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) की कोई औपचारिक घोषणा की।
इसके अलावा, जाँच में यह भी सामने आया कि अध्यक्ष की एक बेटी सुमा एस. साहूकर ने परिवार की वार्षिक आय मात्र ₹40,000 दर्शाते हुए आय एवं जाति प्रमाण पत्र प्राप्त किया। इस दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण और 'क्रीमी लेयर' से छूट का लाभ मिला, जबकि राज्यपाल सचिवालय का दावा है कि परिवार की वास्तविक आय निर्धारित सीमा से अधिक है।
सरकारी नियम और उल्लंघन का आरोप
राज्यपाल सचिवालय ने स्पष्ट किया कि 30 अप्रैल 2002 के एक सरकारी आदेश के अनुसार, केपीएससी अध्यक्ष के बच्चे पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ लेने के पात्र ही नहीं हैं। सचिवालय का कहना है कि यह आवश्यक जानकारी जानबूझकर छिपाई गई और अनुचित लाभ उठाया गया। विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि अध्यक्ष की प्रशासनिक चूक या जानबूझकर की गई अनदेखी के बिना ऐसा संभव नहीं था।
इस संदर्भ में विधान सौधा पुलिस ने सुमा एस. साहूकर के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) भी दर्ज की है।
राज्यपाल की कार्रवाई और संवैधानिक प्रक्रिया
राज्यपाल सचिवालय ने बताया कि अध्यक्ष द्वारा जमा किए गए आय एवं संपत्ति रिटर्न और अन्य अभिलेख उनके विरुद्ध स्पष्ट संकेत देते हैं। मौजूदा तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह आचरण 'गलत व्यवहार' की श्रेणी में रखा गया है।
इसी के आधार पर राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने भारत के राष्ट्रपति से सिफारिश की है कि संविधान के अनुच्छेद 317(1) के तहत यह मामला सर्वोच्च न्यायालय को जाँच के लिए भेजा जाए। साथ ही, केपीएससी की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखने के उद्देश्य से राष्ट्रपति कार्यालय से अगले आदेश तक अध्यक्ष को निलंबित रखने का निर्देश दिया गया है।
अंतरिम व्यवस्था
राज्यपाल के आदेश के अनुसार, निलंबन की अवधि में आयोग के अगले सबसे वरिष्ठ सदस्य केपीएससी अध्यक्ष का कार्यभार संभालेंगे। यह व्यवस्था अगले आदेश तक लागू रहेगी।
आगे क्या होगा
यह मामला अब संवैधानिक और न्यायिक दोनों स्तरों पर आगे बढ़ेगा — एक ओर राष्ट्रपति कार्यालय राज्यपाल की सिफारिश पर निर्णय लेगा, दूसरी ओर पुलिस एफआईआर की जाँच जारी है। आलोचकों का कहना है कि यह मामला सार्वजनिक भर्ती संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यापक बहस को नई धार देता है। गौरतलब है कि केपीएससी राज्य की सरकारी सेवाओं में चयन का सर्वोच्च निकाय है, और इसके अध्यक्ष पर इस तरह के आरोप संस्था की साख पर सीधा असर डालते हैं।