13 जुलाई 2026
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केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा साहूकर निलंबित: बेटियों की भर्ती में कथित अनियमितता, राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट जाँच की सिफारिश की

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केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा साहूकर निलंबित: बेटियों की भर्ती में कथित अनियमितता, राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट जाँच की सिफारिश की

सारांश

कर्नाटक लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष शिवशंकरप्पा साहूकर पर आरोप है कि उनकी दो बेटियों ने फर्जी आय प्रमाण पत्र से ओबीसी आरक्षण का लाभ उठाकर सरकारी पद हासिल किए — और वे खुद इस चयन प्रक्रिया से अलग नहीं हुए। राज्यपाल ने उन्हें निलंबित कर सुप्रीम कोर्ट जाँच की सिफारिश की है।

मुख्य बातें

राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 13 जुलाई 2026 को केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस.
साहूकर को निलंबित किया।
आरोप है कि साहूकर की दो बेटियों का 'इंडस्ट्रियल एक्सटेंशन ऑफिसर' पद पर कथित गैरकानूनी चयन हुआ और अध्यक्ष ने हितों के टकराव की घोषणा नहीं की।
साहूकर ने परिवार की वार्षिक आय ₹40,000 दर्शाकर फर्जी आय प्रमाण पत्र से ओबीसी आरक्षण और 'क्रीमी लेयर' छूट का लाभ लेने का आरोप है।
30 अप्रैल 2002 के सरकारी आदेश के अनुसार केपीएससी अध्यक्ष के बच्चे पिछड़ा वर्ग आरक्षण के पात्र नहीं हैं।
राज्यपाल ने राष्ट्रपति से संविधान के अनुच्छेद 317(1) के तहत मामला सर्वोच्च न्यायालय को भेजने की सिफारिश की है।
विधान सौधा पुलिस ने सुमा एस.
साहूकर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 13 जुलाई 2026 को कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) के अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस. साहूकर को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। यह कार्रवाई उनकी दो बेटियों के 'इंडस्ट्रियल एक्सटेंशन ऑफिसर' पद पर कथित गैरकानूनी चयन और फर्जी आय प्रमाण पत्र के ज़रिये आरक्षण लाभ लेने के आरोपों के बाद की गई है। राज्यपाल सचिवालय ने साथ ही भारत के राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि संविधान के अनुच्छेद 317(1) के तहत यह मामला सर्वोच्च न्यायालय को जाँच के लिए भेजा जाए।

मुख्य आरोप और घटनाक्रम

राज्यपाल सचिवालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, शिवशंकरप्पा एस. साहूकर पर आरोप है कि जब उनकी दो बेटियाँ केपीएससी की चयन प्रक्रिया में शामिल हुईं, तब उन्होंने न तो स्वयं को उस प्रक्रिया से अलग किया और न ही हितों के संभावित टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) की कोई औपचारिक घोषणा की।

इसके अलावा, जाँच में यह भी सामने आया कि अध्यक्ष की एक बेटी सुमा एस. साहूकर ने परिवार की वार्षिक आय मात्र ₹40,000 दर्शाते हुए आय एवं जाति प्रमाण पत्र प्राप्त किया। इस दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण और 'क्रीमी लेयर' से छूट का लाभ मिला, जबकि राज्यपाल सचिवालय का दावा है कि परिवार की वास्तविक आय निर्धारित सीमा से अधिक है।

सरकारी नियम और उल्लंघन का आरोप

राज्यपाल सचिवालय ने स्पष्ट किया कि 30 अप्रैल 2002 के एक सरकारी आदेश के अनुसार, केपीएससी अध्यक्ष के बच्चे पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ लेने के पात्र ही नहीं हैं। सचिवालय का कहना है कि यह आवश्यक जानकारी जानबूझकर छिपाई गई और अनुचित लाभ उठाया गया। विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि अध्यक्ष की प्रशासनिक चूक या जानबूझकर की गई अनदेखी के बिना ऐसा संभव नहीं था।

इस संदर्भ में विधान सौधा पुलिस ने सुमा एस. साहूकर के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) भी दर्ज की है।

राज्यपाल की कार्रवाई और संवैधानिक प्रक्रिया

राज्यपाल सचिवालय ने बताया कि अध्यक्ष द्वारा जमा किए गए आय एवं संपत्ति रिटर्न और अन्य अभिलेख उनके विरुद्ध स्पष्ट संकेत देते हैं। मौजूदा तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह आचरण 'गलत व्यवहार' की श्रेणी में रखा गया है।

इसी के आधार पर राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने भारत के राष्ट्रपति से सिफारिश की है कि संविधान के अनुच्छेद 317(1) के तहत यह मामला सर्वोच्च न्यायालय को जाँच के लिए भेजा जाए। साथ ही, केपीएससी की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखने के उद्देश्य से राष्ट्रपति कार्यालय से अगले आदेश तक अध्यक्ष को निलंबित रखने का निर्देश दिया गया है।

अंतरिम व्यवस्था

राज्यपाल के आदेश के अनुसार, निलंबन की अवधि में आयोग के अगले सबसे वरिष्ठ सदस्य केपीएससी अध्यक्ष का कार्यभार संभालेंगे। यह व्यवस्था अगले आदेश तक लागू रहेगी।

आगे क्या होगा

यह मामला अब संवैधानिक और न्यायिक दोनों स्तरों पर आगे बढ़ेगा — एक ओर राष्ट्रपति कार्यालय राज्यपाल की सिफारिश पर निर्णय लेगा, दूसरी ओर पुलिस एफआईआर की जाँच जारी है। आलोचकों का कहना है कि यह मामला सार्वजनिक भर्ती संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यापक बहस को नई धार देता है। गौरतलब है कि केपीएससी राज्य की सरकारी सेवाओं में चयन का सर्वोच्च निकाय है, और इसके अध्यक्ष पर इस तरह के आरोप संस्था की साख पर सीधा असर डालते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस ढाँचागत खामी का है जो भर्ती संस्थाओं के प्रमुखों को अपने परिजनों की नियुक्ति प्रक्रिया में अघोषित रूप से बने रहने देती है। अनुच्छेद 317(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट जाँच की सिफारिश असाधारण कदम है — यह दर्शाता है कि राज्यपाल सचिवालय को आंतरिक जाँच तंत्र पर भरोसा नहीं था। असली सवाल यह है कि ₹40,000 की कथित फर्जी आय घोषणा इतने लंबे समय तक प्रशासनिक निगरानी से कैसे बची रही — और क्या यह अकेला मामला है या प्रणालीगत विफलता का लक्षण।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा साहूकर को क्यों निलंबित किया गया?
उन पर आरोप है कि उनकी दो बेटियों का 'इंडस्ट्रियल एक्सटेंशन ऑफिसर' पद पर कथित गैरकानूनी चयन हुआ और उन्होंने इस प्रक्रिया में हितों के टकराव की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की। इसके अलावा, एक बेटी पर फर्जी आय प्रमाण पत्र से ओबीसी आरक्षण का लाभ लेने का आरोप है।
फर्जी आय प्रमाण पत्र का मामला क्या है?
आरोप है कि साहूकर की बेटी सुमा एस. साहूकर ने परिवार की वार्षिक आय ₹40,000 दर्शाकर आय एवं जाति प्रमाण पत्र प्राप्त किया, जिससे उन्हें ओबीसी आरक्षण और 'क्रीमी लेयर' से छूट का लाभ मिला। राज्यपाल सचिवालय का कहना है कि परिवार की वास्तविक आय निर्धारित सीमा से अधिक थी।
संविधान के अनुच्छेद 317(1) के तहत क्या होगा?
इस अनुच्छेद के तहत राज्यपाल राष्ट्रपति से सिफारिश कर सकते हैं कि लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य के विरुद्ध आरोपों की जाँच सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी जाए। यदि राष्ट्रपति यह अनुरोध स्वीकार करते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट मामले की स्वतंत्र जाँच करेगा।
क्या केपीएससी अध्यक्ष के बच्चे ओबीसी आरक्षण के पात्र हैं?
नहीं। 30 अप्रैल 2002 के सरकारी आदेश के अनुसार, केपीएससी अध्यक्ष के बच्चे पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ लेने के पात्र नहीं हैं। राज्यपाल सचिवालय का आरोप है कि यह तथ्य जानबूझकर छिपाया गया।
निलंबन के बाद केपीएससी का कामकाज कैसे चलेगा?
राज्यपाल के आदेश के अनुसार, आयोग के अगले सबसे वरिष्ठ सदस्य अगले आदेश तक केपीएससी अध्यक्ष का कार्यभार संभालेंगे। इस दौरान विधान सौधा पुलिस की एफआईआर जाँच और संभावित सुप्रीम कोर्ट जाँच समानांतर चलती रहेगी।
राष्ट्र प्रेस
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