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लोनावला चिक्की को मिला जीआई टैग: ब्रिटिशकालीन परंपरा को मिली आधिकारिक पहचान

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लोनावला चिक्की को मिला जीआई टैग: ब्रिटिशकालीन परंपरा को मिली आधिकारिक पहचान

सारांश

लोनावला चिक्की को जीआई टैग मिलना महज़ एक प्रमाणपत्र नहीं — यह ब्रिटिशकाल से चली आ रही एक पाक विरासत की आधिकारिक स्वीकृति है। चार साल की मेहनत के बाद मिली इस मान्यता से स्थानीय कारोबार, कारीगर और पर्यटन उद्योग तीनों को नई उड़ान मिलने की उम्मीद है।

मुख्य बातें

लोनावला चिक्की को 18 जुलाई 2026 को आधिकारिक जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग प्रदान किया गया।
जीआई टैग हासिल करने की प्रक्रिया में अभय कुमार पारेख ने चार वर्षों तक अथक परिश्रम किया; प्रोफेसर गणेश का मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा।
चिक्की का इतिहास ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ा है — मुंबई-पुणे रेलवे निर्माण के दौरान मज़दूरों के लिए गुड़-मूंगफली से बनाया गया था।
नेशनल चिक्की का कारोबार करीब 100 वर्षों से संचालित है; जीआई टैग से निर्यात और ब्रांड विस्तार की संभावना बढ़ी।
इस मान्यता से स्थानीय कारीगरों, छोटे उद्यमियों और लोनावला के पर्यटन उद्योग को नई गति मिलने की उम्मीद है।

लोनावला चिक्की को 18 जुलाई 2026 को भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्रदान किया गया, जिससे सह्याद्रि की वादियों में बसे इस पर्यटन नगर की सदियों पुरानी पाक परंपरा को आधिकारिक संरक्षण मिल गया है। इस मान्यता से न केवल इस ऐतिहासिक खाद्य उत्पाद की विशिष्टता सुरक्षित होगी, बल्कि स्थानीय कारोबारियों, कारीगरों और लोनावला के पर्यटन उद्योग को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

जीआई टैग का महत्व और पृष्ठभूमि

भौगोलिक संकेत (GI) टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति के आधार पर विशिष्ट पहचान देता है और नकली उत्पादों से सुरक्षा प्रदान करता है। लोनावला चिक्की को यह दर्जा मिलने के बाद केवल इस क्षेत्र में परंपरागत विधि से बनी चिक्की ही 'लोनावला चिक्की' के नाम से बाज़ार में बेची जा सकेगी। गौरतलब है कि यह टैग हासिल करने की प्रक्रिया में अभय कुमार पारेख ने पिछले चार वर्षों तक अथक परिश्रम किया।

ऐतिहासिक जड़ें: ब्रिटिशकाल से आज तक

लोनावला चिक्की का इतिहास ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ा माना जाता है। उस दौर में मुंबई-पुणे रेलवे लाइन के निर्माण कार्य में लगे मज़दूरों के लिए गुड़ और मूंगफली से यह पौष्टिक खाद्य पदार्थ तैयार किया गया था। धीरे-धीरे इसका स्वाद स्थानीय लोगों की पसंद बन गया और कालांतर में यह पूरे देश में — और फिर विदेशों तक — लोकप्रिय हो गया। भुशी डैम, टाइगर पॉइंट, राजमाची पॉइंट, लोहगढ़विसापुर किले और कार्ला-भाजा की प्राचीन गुफाओं की तरह ही लोनावला चिक्की इस पर्यटन नगरी की एक अलग पहचान बन चुकी है।

कारोबारियों की प्रतिक्रिया

चिक्की व्यवसायी अंकित पारेख ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि 'जीआई टैग मिलने से लोनावला चिक्की को एक मज़बूत पहचान और बड़ा मंच मिला है। अब इस पहचान का उपयोग कर भारत के साथ-साथ विदेशों में भी कारोबार का विस्तार किया जा सकेगा।' उन्होंने बताया कि उनका नेशनल चिक्की का कारोबार करीब 100 वर्षों से चल रहा है और जीआई टैग से उनकी पारंपरिक कारीगरी व वर्षों पुराने कौशल को नई पहचान मिलेगी।

चार साल की मेहनत का फल

अंकित पारेख ने बताया कि जीआई टैग हासिल करने की इस पूरी प्रक्रिया में उनके पिता अभय कुमार पारेख ने चार वर्षों तक लगातार प्रयास किए। उन्होंने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रोफेसर गणेश का विशेष आभार व्यक्त किया और कहा कि उनके मार्गदर्शन के बिना यह सफलता संभव नहीं थी।

आगे की राह: पर्यटन और निर्यात को मिलेगी रफ़्तार

जीआई टैग मिलने के बाद लोनावला चिक्की की ब्रांड वैल्यू और विश्वसनीयता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। स्थानीय उद्योग जगत को उम्मीद है कि इस मान्यता से निर्यात के नए द्वार खुलेंगे और लोनावला आने वाले पर्यटकों की संख्या में भी इज़ाफ़ा होगा। यह मान्यता उन तमाम कारीगरों और छोटे उद्यमियों के लिए भी प्रेरणादायक है जो दशकों से इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है — यह सुनिश्चित करना कि यह मान्यता केवल बड़े स्थापित कारोबारियों तक सीमित न रहे, बल्कि उन छोटे कारीगरों तक भी पहुँचे जो दशकों से इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। भारत में दार्जिलिंग चाय और बनारसी साड़ी जैसे जीआई उत्पादों का अनुभव बताता है कि टैग मिलने के बाद भी अनधिकृत उत्पादन और नकल की समस्या बनी रहती है। बिना कड़े प्रवर्तन तंत्र और छोटे उत्पादकों को पंजीकरण में सहायता के, यह उपलब्धि कागज़ी गौरव तक सिमट सकती है।
RashtraPress
19 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लोनावला चिक्की को जीआई टैग क्यों मिला और इसका क्या अर्थ है?
लोनावला चिक्की को उसकी विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति और पारंपरिक निर्माण विधि के आधार पर जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग दिया गया है। इसका अर्थ है कि अब केवल लोनावला क्षेत्र में परंपरागत तरीके से बनी चिक्की ही इस नाम से बाज़ार में बेची जा सकेगी, जिससे नकली उत्पादों से सुरक्षा मिलेगी।
लोनावला चिक्की का इतिहास क्या है?
लोनावला चिक्की का इतिहास ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ा माना जाता है, जब मुंबई-पुणे रेलवे लाइन निर्माण के दौरान मज़दूरों के लिए गुड़ और मूंगफली से यह पौष्टिक खाद्य पदार्थ तैयार किया गया था। धीरे-धीरे यह पूरे देश और विदेशों में लोकप्रिय हो गया।
जीआई टैग दिलाने में किसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
चिक्की व्यवसायी अंकित पारेख के पिता अभय कुमार पारेख ने इस प्रक्रिया में चार वर्षों तक अथक परिश्रम किया। प्रोफेसर गणेश के मार्गदर्शन और प्रयासों को भी इस सफलता में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित किया गया है।
जीआई टैग से लोनावला के स्थानीय कारोबार पर क्या असर पड़ेगा?
जीआई टैग से लोनावला चिक्की की ब्रांड वैल्यू और विश्वसनीयता बढ़ेगी, जिससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कारोबार विस्तार की संभावना है। स्थानीय कारीगरों और छोटे उद्यमियों को भी इस मान्यता से नई पहचान और बाज़ार तक बेहतर पहुँच मिलने की उम्मीद है।
क्या लोनावला चिक्की पहले से ही प्रसिद्ध थी?
हाँ, लोनावला चिक्की पहले से ही देश-विदेश में प्रसिद्ध है और लोनावला आने वाले लगभग हर पर्यटक की खरीदारी सूची में शामिल रहती है। जीआई टैग इस लोकप्रियता को आधिकारिक संरक्षण और वैश्विक मंच प्रदान करता है।
राष्ट्र प्रेस
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